‘नौजवान भारत सभा’ का घोषणापत्र व संविधान

‘नौजवान भारत सभा’ का घोषणापत्र व संविधान

‘नौजवान भारत सभा’ नामक एक क्रान्तिकारी नौजवान संगठन का घोषणापत्र और संविधान हम इस देश के क्रान्तिकारी और प्रगतिशील नौजवानों के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं। इस संगठन का उद्देश्य देश के बिखरे हुए युवा आन्दोलन को एक सही दिशा की समझ के आधार पर एकजुट करना और उसे व्यापक जनसमुदाय के साम्राज्यवाद-पूँजीवाद विरोधी संघर्ष के एक अविभाज्य अंग के रूप में आगे बढ़ाना है।
‘नौजवान भारत सभा’ का गठन 2005 में किया गया था व उसी समय मसौदा घोषणापत्र और मसौदा संविधान देश के युवाओं के सामने पेश किया गया था। 2005 के बाद से सम्मेलन किये जाने तक संयोजन समिति के नेतृत्व में संगठन काम कर रहा था। गत 26-27-28 सितम्बर 2014 को राजधानी दिल्ली में शहीद-ए-आज़म भगतसिंह की 107वीं जयन्ती के अवसर पर संगठन का प्रथम राष्ट्रीय सम्मेलन सम्पन्न हुआ। उक्त सम्मेलन में देश भर से चुनकर आये 150 प्रतिनिधियों ने हिस्सेदारी की। सम्मेलन के पहले दो दिन प्रतिनिधि सत्रों का आयोजन हुआ तथा तीसरा दिन खुले सत्र के रूप में रखा गया था। देश-विदेश से विभन्न संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों के द्वारा भेजे गये बधाई सन्देशों को पढ़ा गया। प्रतिनिधि सत्रों के दौरान पहले दिन संयोजन समिति की ओर से पिछले 10 सालों के कार्य की रिपोर्ट पेश की गयी। फिर संगठन के घोषणापत्र और संविधान को प्रस्तावित किया गया, इसके विभिन्न पहलुओं पर बहस-मुबाहिसा हुआ तथा उसके बाद घोषणापत्र और संविधान को पारित किया गया। अगले दिन चुनाव के माध्यम से 17 सदस्यीय केन्द्रीय परिषद् के रूप में संगठन के केन्द्रीय नेतृत्व को चुना गया और फिर केन्द्रीय परिषद् के द्वारा 7 सदस्यों का चुनाव केन्द्रीय कार्यकारिणी के रूप में हुआ, तथा कार्यकारिणी ने 4 पदाधिकारियों का चुनाव किया। सम्मेलन के दौरान विभिन्न विषयों पर कुल 13 प्रस्ताव पेश किये गये तथा इन्हें सर्वसम्मति से पारित किया गया। इसके अलावा सदन से भी नौभास के सदस्यों ने कई विषयों पर अपने वक्तव्य रखे। इस प्रकार संगठन ने अपना प्रथम राष्ट्रीय सम्मेलन सफलतापूर्वक सम्पन्न किया।
अब चूंकि संगठन का सम्मेलन सम्पन्न हो चुका है इसलिए संगठन केन्द्रीय परिषद् के नेतृत्व में अपने पारित घोषणापत्र और संविधान के आधार पर अपनी कार्रवाइयों को अंजाम देगा।
-केन्द्रीय परिषद्
नौजवान भारत सभा
मार्च, 2015

नौजवान भारत सभा घोषणापत्र (मेनिफ़ेस्टो)

“जब गतिरोध की स्थिति लोगों को अपने शिकंजे में जकड़ लेती है तो किसी भी प्रकार की तब्दीली से वे हिचकिचाते हैं। इस जड़ता और निष्क्रियता को तोड़ने के लिए एक क्रान्तिकारी स्पिरिट पैदा करने की ज़रूरत होती है, अन्यथा पतन और बर्बादी का वातावरण छा जाता है। लोगों को गुमराह करने वाली प्रतिक्रियावादी शक्तियाँ जनता को ग़लत रास्ते पर ले जाने में सफल हो जाती हैं। इससे इंसान की प्रगति रुक जाती है और उसमें गतिरोध आ जाता है। इस परिस्थिति को बदलने के लिए यह ज़रूरी है कि क्रान्ति की स्पिरिट ताजा की जाये, ताकि इंसानियत की रूह में हरक़त पैदा हो।”

-शहीद भगतसिंह

आज हम भी एक ऐसे ही दौर में जी रहे हैं, जब गतिरोध की स्थिति ने लोगों को अपने शिकंजे में जकड़ लिया है। यह एक अभूतपूर्व दौर है, जब समाज की सभी नियंत्रणकारी चोटियों पर रूढ़िवादी और प्रतिक्रियावादी ताकतें मजबूती से जमी हुई हैं। क्रान्ति की लहर पर प्रतिक्रान्ति की लहर लगातार हावी बनी हुई है।

nbs 1ऐसे कठिन ऐतिहासिक समय में नौजवान भारत सभा, इंसानियत की रूह में एक बार फिर हरक़त पैदा करने के लिए और क्रान्ति की स्पिरिट ताजा करने के लिए देश के सभी बहादुर, स्वाभिमानी, जागरूक, इंसाफ़पसन्द और प्रगतिशील नौजवानों का आह्वान करती है। हमारा यह सम्बोधन उन नौजवानों के लिए नहीं है जो किस्मत और हालात का रोना रोते हुए, शोषकों-शासकों की परजीवी जमात के हर किस्म के अन्याय-अत्याचार की मार झेलने के लिए पीठ झुकाये खड़े हैं। हम उन नौजवानों से कतई मुख़ातिब नहीं हैं जिनका “स्‍वर्ग” इसी जालिम व्यवस्था के भीतर सुरक्षित है, या जो अपना “स्‍वर्ग” हासिल कर लेने के लिए ख़ून के दलदलों और अन्याय की खड्ड-खाइयों को आँखें मूँदकर पार कर जाने के लिए तैयार हैं। हम आम जनता के उन बहादुर बेटे-बेटियों का आह्वान कर रहे हैं, जिन्हें ख़ून और आँसू के सागर में ऐश्वर्य के टापुओं और विलासिता की मीनारों का अस्तित्व स्वीकार नहीं है, जो हथियारों की ढेरी पर बैठे पूँजीवादी लुटेरों की जीत को अन्तिम नहीं मानते और जो ‘इतिहास के अन्त’ में विश्वास नहीं रखते। हम उन सभी का आह्वान करते हैं जो सच्चे अर्थों में युवा हैं, जो आँगन की मुर्गी की तरह फुदकने के बजाय तूफानों में गर्वीले गरुड़ की तरह उड़ान भरने का साहस रखते हैं, जिन्होंने सपने देखने की आदत नहीं छोड़ी है तथा जो नये सिरे से मुक्ति की परियोजना बनाने और उसे अमली जामा पहनाने के लिए तैयार हैं।

घोषणापत्र की पीडीएफ फाइल इस लिंक से डाउनलोड करें

नौजवान भारत सभा का नाम अपने आप में एक महान क्रान्तिकारी विरासत को पुनर्जागृत करने और आगे बढ़ाने के संकल्प का प्रतीक है। महान युवा विचारक क्रान्तिकारी भगतसिंह ने औपनिवेशिक गुलामी के विरुद्ध भारत के क्रान्तिकारी आन्दोलन को नया वैचारिक आधार देने और नये सिरे से संगठित करने के लिए अपने साथियों के साथ मिलकर जब एक नयी शुरुआत की तो उनका पहला महत्वपूर्ण कदम था, 1926 में नौजवान भारत सभा के झण्डे तले नवयुवकों को संगठित करना। इसके दो वर्षों बाद भगतसिंह और उनके साथियों ने ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ नामक नये क्रान्तिकारी संगठन की स्थापना की और स्पष्ट शब्दों में यह घोषणा की कि औपनिवेशिक सत्ता को उखाड़ फेंकने के बाद भारत की आम जनता को पूँजीवाद के ख़ात्मे और समाजवाद की स्थापना के लिए संघर्ष करना होगा। केवल तभी, भारतीय जनता की मुक्ति वास्तविक और मुकम्मिल हो सकेगी। आज यह सच्चाई दिन के उजाले की तरह साफ हो चुकी है कि देशी-विदेशी पूँजी की जकड़बन्दी को तोड़कर ही बहुसंख्यक मेहनतकश आबादी और आम मध्यवर्गीय जमातें अपनी वास्तविक मुक्ति हासिल कर सकती हैं। हमारे सामने बस एक ही विकल्प है और वह है – पूँजी की सत्ता के विरुद्ध एक नये जन-मुक्ति संघर्ष की शुरुआत। भगतसिंह और उनके साथियों की महान क्रान्तिकारी विरासत से प्रेरणा और शिक्षा लेते हुए हम एक बार फिर नौजवान भारत सभा के ही परचम तले सभी प्रगतिशील और बहादुर युवा स्त्रियों और पुरुषों को संगठित करते हुए एक नयी शुरुआत का संकल्प लेते हैं। इस नौजवान संगठन को एक नयी क्रान्ति के युवा सिपाहियों की भरती और शिक्षण-प्रशिक्षण का केन्द्र बनाना हमारा सर्वोपरि उद्देश्य है।

शहीदे-आज़म भगतसिंह ने देश की राजनीतिक आजादी हासिल होने से काफ़ी पहले ही, पिछली शताब्दी के तीसरे दशक में, यह स्पष्ट कर दिया था कि कांग्रेस उन देशी मुनाफ़ाख़ोरों की पार्टी है जो साम्राज्यवादियों से सौदेबाजी करके अपने लिए सत्ता हासिल करना चाहते हैं, जबकि क्रान्तिकारियों के लिए आजादी का मतलब गोरी चमड़ी की जगह काली चमड़ी का शासन कायम हो जाना मात्र या लॉर्ड रीडिंग और लॉर्ड इर्विन की जगह पुरुषोत्तम दास ठाकुर दास का सत्तासीन हो जाना मात्र नहीं है। उन्होंने आजादी की परिभाषा 92 प्रतिशत लोगों की आजादी के रूप में, विदेशी प्रभुत्व के साथ ही देशी-विदेशी – हर किस्म की पूँजी द्वारा जनता के शोषण के ख़ात्मे के रूप में की थी और मेहनतकश आम जनता की सत्ता की स्थापना तथा एक समानतापूर्ण सामाजिक ढाँचे के निर्माण को क्रान्ति का लक्ष्य बताया था। उन्होंने 1930 में ही यह भविष्यवाणी कर दी थी कि कांग्रेस की लड़ाई का अन्त किसी न किसी समझौते के रूप में होगा और जेल की कालकोठरी से सन्देश भेजकर युवाओं का आह्वान किया था कि उन्हें क्रान्ति का सन्देश लेकर कल-कारखानों और खेतों-खलिहानों तक जाना होगा। आज हमारे चारों ओर अन्याय-अनाचार-भ्रष्टाचार-लूट-बर्बरता और निराशा का जो घुटन और सड़ाँध भरा अँधेरा छाया हुआ है, उसमें भगतसिंह का सन्देश आम जनता के तमाम बहादुर मुक्तिकामी बेटे-बेटियों के लिए क्षितिज पर अनवरत जलती एक मशाल के समान है, भविष्य की राह रौशन करते एक प्रकाश-स्तम्भ के समान है।

आजादी और जनतंत्र के सारे छल-छद्म आज उजागर हो चुके हैं। जिस आजादी को मशहूर शायर फ़ैज ने ‘दाग़-दाग़ उजाला’ कहा था, वह आज भादो की काली अमावस बन चुकी है। आम जनता के सपने तार-तार हो चुके हैं। भगतसिंह की भविष्यवाणी तो दशकों पहले शब्दशः सही साबित हो गयी थी। अब इस देश के नौजवानों के सामने खड़ा है एक जलता हुआ ऐतिहासिक प्रश्नचिन्ह – शासक वर्ग के छलावों, भ्रमों-भटकावों, कुछ प्रारम्भिक प्रयासों की तात्कालिक विफलता या पराजय मात्र से घबरा जाने या मायूस हो जाने की प्रवृत्ति तथा व्यक्तिवाद और स्वार्थपरता की प्रवृत्तियों से मुक्त होकर, आखिर कब हम भगतसिंह के आह्वान पर ध्यान देंगे? गतिरोध में फँसा इतिहास गर्म युवा रक्त के ईंधन से ही फिर से गतिमान हो सकता है। आम जनता के विचारसम्पन्न, साहसी और हर क़ुर्बानी के लिए तैयार बेटे-बेटियों को आगे आना ही होगा और क्रान्ति का सन्देश कश्मीर से कन्याकुमारी तक, असम से कच्छ की खाड़ी तक – घर-घर तक और जन-जन तक पहुँचाना होगा। उन्हें न सिर्फ एकजुट होकर अपने हर न्यायसंगत अधिकार के लिए लड़ना होगा, बल्कि समाज में जारी न्याय और अधिकार के हर संघर्ष में शामिल होना होगा। अपनी हड्डियाँ गलाकर और रसातल के अँधेरे नर्क में जीते हुए समाज की बुनियाद का निर्माण करने वाले मेहनतकशों की उन्हें न सिर्फ तहेदिल से सेवा करनी होगी, बल्कि उनके जीवन और संघर्षों के साथ घुलमिल जाना होगा। उन्हें हर प्रकार की सामाजिक रूढ़ियों, नियतिवाद, अन्धविश्वास और जाति-धर्म के आत्मघाती झगड़ों से मुक्ति के लिए संघर्ष करना होगा और एक वैचारिक-सांस्कृतिक क्रान्ति की लहर पैदा करनी होगी ताकि दिमागी ग़ुलामी के बन्धनों को तोड़कर आम जनता फौलादी एका बनाये और पूँजी की मानवद्रोही सत्ता के विरुद्ध फैसलाकुन लड़ाई के लिए तैयार हो सके।

बर्तानवी ग़ुलामी की बेड़ियों का टूटना मजदूरों-किसानों और आम मध्यवर्ग के लोगों के अनथक संघर्षों और अकूत कुर्बानियों के चलते ही सम्भव हो पाया था, लेकिन छल-कपट से और जनसंघर्षों के क्रान्तिकारी नेतृत्व की कमज़ोरियों का फ़ायदा उठाकर देशी पूँजीपतियों के नुमाइन्दे 1947 में उत्पादन, राजकाज और समाज के पूरे ढाँचे पर काबिज़ हो गये। अपने निहित स्वार्थों की ख़ातिर उन्होंने साम्प्रदायिक आधार पर जनता को बाँटकर और दंगों की विनाशकारी आग भड़काकर देश को विभाजन के कगार तक पहुँचाने की अंग्रेज़ उपनिवेशवादियों की साजिश में सहयोगी भूमिका निभायी। जनता के सपनों और आजादी का सौदा करके भारतीय पूँजीपतियों की प्रतिनिधि कांग्रेस पार्टी ने ऐतिहासिक विश्वासघात किया। देश को खण्डित, अधूरी और विकलांग राजनीतिक आजादी मिली जिसका पूरा फ़ायदा ऊपर की उस बीस फ़ीसदी मुफ्तख़ोर, परजीवी, अमीर आबादी को ही मिला, जो देशी पूँजीपतियों और साम्राज्यवादियों का टुकड़ख़ोर चाकर बनने के लिए तैयार थी। सत्तासीन भारतीय पूँजीपतियों ने विश्व पूँजीवाद के दायरे में साम्राज्यवादियों के ‘जूनियर पार्टनर’ की तरह रहते हुए क्रमिक पूँजीवादी विकास का रास्ता चुना जिसमें विदेशी लुटेरों का लूटने का हक़ बना रहा और जनता की नस-नस से ख़ून निचोड़ा जाता रहा। पूँजीवादी भूमि-सुधार के नाम पर पुराने रजवाड़ों-जागीरदारों-ज़मीन्दारों को अपनी जमीन और सम्पत्ति बचाने तथा नयी उत्पादन-प्रणाली में पूँजीपतियों की जमात में शामिल हो जाने या पूँजीवादी भूस्वामी बन जाने का पूरा अवसर दिया गया। पहले के धनी काश्तकार और कुछ मँझोले काश्तकार भी जमीन का मालिक बनने के बाद मज़दूरों का शोषण करने वाले तथा बाजार में पैदावार बेचकर मुनाफ़ा कमाने वाले पूँजीवादी फ़ार्मर और कुलक बन गये। तथाकथित हरित क्रान्ति और श्वेत क्रान्ति के नाम पर पूँजीवादी खेती के तौर-तरीकों को तथा कृषि में वित्तीय पूँजी की पैठ को बढ़ावा दिया गया। गाँवों में विकसित हुए नये पूँजीपति भी वित्तीय और औद्योगिक तंत्र के स्वामी पूँजीपतियों के साथ छुटभइया की हैसियत से लूट और सत्ता के भागीदार बने। इसके साथ ही व्यापारियों, ठेकेदारों, उच्च मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों, अफसरों, नेताओं, दलालों और काले धन वालों की लम्बी-चौड़ी परजीवी जमातें भी खूब फलती-फूलती रहीं। सारी सम्पदा पैदा करने वाली जनता को पूँजीवादी विकास का सिर्फ़ जूठन ही नसीब हुआ और वह भी सिर्फ़ इसलिए कि वह खेतों-कारख़ानों में ख़ून-पसीना निचोड़कर मिट्टी के मोल अपनी श्रमशक्ति बेचकर मुनाफ़ाख़ोरों की पूँजी बढ़ाते रहने वाले उजरती ग़ुलाम के रूप में ज़िन्दा रह सके।

राजनीतिक आजादी मिलने के बाद, “समाजवाद” का लुभावना मुलम्मा चढ़ाकर, जनता को निचोड़कर पब्लिक सेक्टर उद्योगों का विशाल ढाँचा खड़ा किया गया, जिनमें मजदूरों को चूसकर अफ़सरशाही-नेताशाही को ऐशो-आराम के सरंजाम मुहैया कराये गये और पूँजी का अम्बार इकट्ठा किया गया। तकरीबन चालीस साल बीतते-बीतते शासक वर्गों के लिए पब्लिक सेक्टर खड़ा करने का बुनियादी मकसद पूरा हो चुका था, अब वह पूँजीवाद के आगे की राह की एक बाधा बन चुका था और जनता की नज़रों में नकली समाजवाद की असलियत भी उजागर हो चुकी थी। तब जनता के ख़ून-पसीने से खड़े किये गये राजकीय उद्योगों को देशी-विदेशी पूँजीपतियों को औने-पौने दामों पर बेचने, यूँ कहें कि लगभग मुफ्त में सौंपने के सिलसिले की शुरुआत हुई। पिछली शताब्दी के अन्तिम दशक में निजीकरण-उदारीकरण की नीतियों या ‘नयी आर्थिक नीतियों’ के नाम पर यह सिलसिला खुले तौर पर शुरू हुआ और लगातार, अपनी रफ्तार तेज़ करता हुआ आज वह आगे बढ़ रहा है। सरकारी उपक्रमों को पूँजीपति घरानों के हवाले करने के साथ ही राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के दरवाजों को विदेशी लूट के लिए पूरी तरह से खोल दिया गया।

पिछली शताब्दी के नवें दशक से लकर अब तक की अवधि यही दर्शाती है कि साम्राज्यवाद के नये दौर में, भारत की मेहतनकश जनता की गर्दन पर देशी-विदेशी पूँजी का लौह-शिकंजा और अधिक मजबूती से कस गया है। पूँजीवाद द्वारा रोज़-ब-रोज़ ढायी जा रही विपदाओं की भयंकरता और उनकी बढ़ोत्तरी की रफ्तार कई गुना अधिक बढ़ गयी है। हर वर्ष करोड़ों छोटे किसान अपनी जगह-जमीन से उजड़कर दर-बदर हो रहे हैं और करोड़ों मज़दूर बेलगाम छँटनी-तालाबन्दी के शिकार हो रहे हैं। लम्बे संघर्षों से अर्जित मज़दूरों के अधिकार एक-एक करके छीने जा रहे हैं। बड़े उद्योगों में भी ज़्यादातर काम दिहाड़ी और ठेका मज़दूरों से कराये जा रहे हैं जिनके लिए काम के घण्टों और न्यूनतम मज़दूरी सम्बन्धी कानूनों का कोई मतलब नहीं रह गया है और जो इंसानी ज़िन्दगी की न्यूनतम शर्तों तक से वंचित हैं।

राजनीतिक आजादी की आधी शताब्दी से भी अधिक लम्बे कालखण्ड के तथाकथित विकास का कुल बैलेंस शीट यह है कि देश की ऊपर की दस फ़ीसदी आबादी के पास कुल परिसम्पत्ति का 85 प्रतिशत इकट्ठा हो गया है जबकि नीचे की 60 प्रतिशत आबादी के पास मात्र दो प्रतिशत है। देश में 0.01 प्रतिशत लोग ऐसे हैं जिनकी आमदनी पूरे देश की औसत आमदनी से दो सौ गुना अधिक हो चुकी है। सबसे ऊपर के बाईस पूँजीपति घरानों की परिसम्पत्तियों में दूने-चौगुने की नहीं, बल्कि 1,000 गुने से भी अधिक की वृद्धि हुई है। इन घरानों में वे बहुराष्ट्रीय निगम शामिल नहीं हैं जिनके शुद्ध मुनाफ़े में दोगुना-चौगुना नहीं बल्कि औसतन सैकड़ों गुना की वृद्धि हुई है। विदेशी कर्ज़ का बोझ, सालाना कुछ घटती-बढ़ती के बावजूद, गत कई वर्षों से सौ अरब डालर के ऊपर ही बना हुआ है। घरेलू और विदेशी देनदारियाँ मिलाकर केन्द्र सरकार के कर्ज़ का कुल बोझ सकल घरेलू उत्पाद के साठ फीसदी से ऊपर जा रहा है। सरकार की पूरी आमदनी कर्जों की किस्तों, वेतन-भत्तों और आन्तरिक एवं बाह्य सुरक्षा के मदों में स्वाहा हो जाती है। हर तरह के सरकारी घाटे की भरपाई का रास्ता बस एक ही रह गया है-व्यापक मेहनतकश आबादी को और अधिक निचोड़ना और उसकी ज़िन्दगी को नर्क से भी बदतर बनाते चले जाना। सरकार ने जो फ़र्जी और इंसान की तरह जीने के हक़ का मजाक उड़ाने वाली ग़रीबी रेखा तय की है उसके भी नीचे जीने वालों की संख्या आज आबादी का करीब 30 प्रतिशत है, जबकि अनेक अर्थशास्त्रियों का मानना है कि देश की आधी से अधिक आबादी दिनो-रात हाड़ गलाकर भी जीने की न्यूनतम ज़रूरतों को पूरा नहीं पाती। काम करने योग्य 30 करोड़ से भी कुछ अधिक आबादी के पास या तो कोई रोजी-रोजगार नहीं है, या फिर कोई नियमित रोजगार नहीं है। हाँ, यह विकास ज़रूर हो रहा है कि देश में भाँति-भाँति की कारों-मोटरसाइकिलों-ए.सी.-फ्रिज-टी.वी.-मोबाइल-वाशिंग मशीनों आदि के नये-नये ब्राण्डों से बाजार अँटे पड़े हैं, विलासिता के द्वीपों को जोड़ने के लिए प्रशस्त राजमार्ग बन रहे हैं। देश में काले धन की समानान्तर अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत हो चुकी है कि इसका आकार बढ़ता हुआ सकल घरेलू उत्पाद के 75 प्रतिशत के आसपास पहुँच रहा है।

देश की ऊपर की तीन प्रतिशत आबादी और नीचे की चालीस प्रतिशत आबादी की आमदनी के बीच का अन्तर आज साठ गुना हो चुका है। मुट्ठीभर अमीरों की ज़िन्दगी का स्तर पश्चिमी देशों के अमीरों की बराबरी पर पहुँच रहा है, जबकि आम ग़रीब आबादी के खाने-पीने और इस्तेमाल की अन्य चीजों और दवा-इलाज की कीमतें उसकी पहुँच से ज़्यादा से ज़्यादा दूर होती चली जा रही हैं। प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक के ख़र्चों में बेहिसाब बढ़ोत्तरी हुई है और बेटे को इंजीनियर-डाक्टर बनाने का सपना तो अब आम मध्यवर्गीय नागरिक तक नहीं देख सकता। उच्च शिक्षा और व्यावसायिक शिक्षा के परिसरों तक आम घरों के युवाओं की पहुँच अब लगभग असम्भव होती जा रही है।

देश के पूँजीवादी जनतंत्र की असलियत तो काफ़ी पहले ही उजागर हो चुकी थी, अब इसका सबसे गन्दा और नंगा-निरंकुश रूप हमारे सामने है। लाल-पीले-हरे-नीले और दुरंगे-तिरंगे झण्डों वाली सभी चुनावी पार्टियाँ जनविरोधी आर्थिक नीतियों पर पूरी तरह से एकमत हैं। उनके बीच तमाम झगड़े और कुत्ताघसीटी सिर्फ इस बात को लेकर है कि शासक वर्गों का मुख्य नुमाइन्दा बनकर कुर्सी पर कौन बैठे! वे इसलिए भी लड़ रहे हैं कि संकटकाल में सत्ताधारी आपस में कुत्तों की तरह लड़ते हैं। उनकी आपसी लड़ाई का एक बुनियादी कारण यह भी है कि लुटेरों में कभी भी स्थायी एकता नहीं होती। हमारे देश की पूँजीवादी राजनीति आज रसातल की उन गहराइयों तक जा पहुँची है जहाँ नेताओं और अपराधियों के गिरोहों के बीच कोई फ़र्क नहीं रह गया है। प्रशासन तंत्र की जो स्थिति है उसमें नौकरशाहों और ठगों-रहजनों के बीच कोई फ़र्क नहीं रह गया है।

संसदीय जनतंत्र की नंगई अब दिन के उजाले की तरह सामने है। अरबों-खरबों के खर्च से होने वाले चुनाव सिर्फ यह तय करते हैं कि अगले पाँच वर्षों तक सरकार के रूप में फ्शासक वर्गों की मैनेजिंग कमेटी” का काम किस पार्टी या गठबन्धन के लोग सम्हालेंगे। हालात ने जनता की निगाहों के सामने इस सच्चाई को भी उजागर कर दिया है कि विराट फ़ौजी मशीनरी का काम देश की सुरक्षा नहीं बल्कि जनज्वारों से सत्ताधारियों की हिफ़ाजत करना है। इसी तरह पुलिस तंत्र का काम कानून-व्यवस्था बनाये रखने के नाम पर जनता को आतंकित बनाये रखना और पूँजीपतियों की तिजोरियों की चौकीदारी करना है। देश में सालाना खरबों रुपये तथाकथित जनप्रतिनिधियों और संसद के हंगामों पर ख़र्च होते हैं, खरबों रुपये सेना पर ख़र्च होते हैं, खरबों रुपये नौकरशाही तंत्र पर और खरबों रुपये पुलिसिया तंत्र पर खर्च होते हैं। यह सारा ख़र्च जनता ही अपना पेट काटकर चुकाती है। जो पूँजीवादी लुटेरों के वफ़ादार कुत्ते हैं, वे चौकीदारी करने, भौंकने और काट खाने की पूरी कीमत वसूल करते हैं। और पूँजीपति यह कीमत खुद नहीं देते, बल्कि जनतंत्र के नाम पर उसी जनता से वसूलते हैं, जिसकी हड्डियों से वे अपना मुनाफ़ा निचोड़ते हैं।

पिछले 24 वर्षों से जारी नवउदारवादी नीतियों ने भाजपा और संघ परिवार की कट्टरपंथी राजनीति के फलने-फूलने के लिए अनुकूल ज़मीन तैयार की है। पूँजीवादी व्यवस्था के गम्भीर आर्थिक संकट ने आज उसे इस मुकाम पर पहुँचा दिया है जहाँ एक फासिस्ट सत्ता उसकी ज़रूरत बन गयी है जो डण्डे के ज़ोर पर मेहनतकश अवाम को निचोड़कर और विरोध की हर आवाज़ को कुचलकर पूँजीपतियों के मुनाफ़े को बेरोकटोक बना सके। दरअसल भारतीय पूँजीवादी व्यवस्था के सामने आज जो एकमात्र विकल्प बचा है, उसी पर वह अमल कर रही है। बुनियादी नीतियों पर आम सहमति के कारण, चुनावी पार्टियाँ कुछ गै़र मुद्दों पर आपस में गत्ते की तलवारें भाँजती रहती हैं, या जाति-धर्म के झगड़े भड़काकर, जनता को बाँटकर अपनी चुनावी गोट लाल करती रहती हैं। मज़दूर हितों की दुहाई देने वाली तमाम नकली वामपंथी पार्टियाँ भी विरोध के हवाई गोले छोड़ते हुए सत्ता-प्रपंच में पूरी तरह से भागीदार बनी हुई हैं। आर्थिक उदारीकरण की लहर तथा पूँजीवादी जनवाद के क्षरण और पतन ने राजनीतिक-सामाजिक पटल पर पहले से ही मौजूद धार्मिक कट्टरपन्थी फासिस्ट ताक़तों को व्यापक शक्ति एवं आधार देने का काम किया है, जो दंगों और नरसंहारों के द्वारा देश को ख़ून के दलदल में तब्दील करती रही हैं और आज एक बार फिर नफ़रत की आग सुलगाने में लगी हुई हैं ताकि जब देश की जनता भयंकर शोषणकारी नीतियों के विरुद्ध सड़कों पर उतरने लगे तो उसकी एकता को तोड़ा जा सके! बुर्जुआ राज्य ज़्यादा से ज़्यादा निरंकुश होता जा रहा है और धार्मिक फासिस्टों के सत्ता में आने के साथ ही समाज में बचे-खुचे बुर्जुआ जनवादी ‘स्पेस’ को ख़त्म किया जा रहा है। धार्मिक कट्टरपन्थी राज्य तंत्र और समाज के हर स्तर पर अपनी घुसपैठ और प्रभाव बढ़ा रहे हैं और इनकी ज़हरीली राजनीति पूरे देश को एक भयंकर रक्तपातपूर्ण कलह की ओर तेजी से धकेल रही है। मेहनतकशों की वर्गीय चेतना को कुन्द करके ये क्रान्तिकारियों के सामने भी एक बड़ी चुनौती पेश कर रहे हैं। फासीवाद के उभार और इसके हर रूप के ख़िलाफ़ संघर्ष एक क्रान्तिकारी नौजवान संगठन के लिए एक अहम कार्यभार है। नौजवानों को इनके विरुद्ध बड़े पैमाने पर वैचारिक-सांस्कृतिक संघर्ष चलाने के साथ ही सड़कों पर इनके साथ आमने-सामने के मुक़ाबले के लिए भी तैयारी करनी होगी।

मोटे तौर पर, यही है राजनीतिक आजादी मिलने से लेकर आज तक हमारे समाज का सफ़रनामा! भारतीय पूँजीवाद के कमजोर विकलांग-बीमार टट्टू ने पूँजीवादी सामाजिक-राजनीतिक ढाँचे की छकड़ा गाड़ी को घसीटते-घसीटते एक बन्द गली के छोर पर ला खड़ा किया है। यहाँ से आगे जाने के लिए इस छकड़ा गाड़ी को कबाड़घर पहुँचाना होगा और सामने खड़ी दीवार को एक नयी सामाजिक जनक्रान्ति के विस्फोट से तबाह कर देना होगा। इतिहास ने एक बार फिर यह चुनौतीपूर्ण दायित्व नौजवानों के कन्धों पर डाला है कि वे नयी सदी की नयी क्रान्ति के ध्वजवाहक बनें। साम्राज्यवाद-पूँजीवाद विरोधी नयी क्रान्ति आज इतिहास के एजेण्डे पर सर्वोपरि है और भारत उन सम्भावनासम्पन्न देशों की कतार में अग्रणी है जहाँ एक प्रचण्ड वेगवाही तूफ़ान की परिस्थितियाँ तेजी से तैयार हो रही हैं। नौजवान भारत सभा देश के युवाओं का आह्वान करती है कि वे नये मुक्ति संघर्ष की तैयारी के लिए आगे आयें, क्रान्ति के सन्देश को जन-जन तक पहुँचायें, संगठित होकर न्याय और अधिकार के लिए संघर्ष करें, अपने संघर्षों से समाज में उत्प्रेरण की लहर पैदा करें और उन्हें व्यापक मेहनतकश अवाम के संघर्षों का अंग बनायें।

हमारा कार्यक्रम

(1) देशी-विदेशी पूँजी की बर्बर लूट की बुनियाद पर खड़े मौजूदा सामाजिक-आर्थिक ढाँचे को नष्ट करके समता, न्याय और मानवीय गरिमा की बुनियाद पर एक नये सामाजिक-आर्थिक ढाँचे का निर्माण नौजवान भारत सभा का अन्तिम लक्ष्य है और इस ऐतिहासिक महासमर की तैयारी में देश की क्रान्तिकारी युवा ऊर्जा को सन्नद्ध कर देना हमारा अटल संकल्प है। यह इतिहास से हमारा क़रार और भविष्य से हमारा वायदा है कि हम शहीद भगतसिंह के आह्वान पर अमल करते हुए क्रान्ति का सन्देश लेकर कल-कारखानों और खेतों-खलिहानों तक जायेंगे और व्यापक मेहनतकश अवाम को एक ऐसी व्यवस्था कायम करने के संघर्ष में लामबन्द करेंगे जिसमें उत्पादन, राजकाज और समाज को चलाने के नियम और नीतियाँ स्वयं उत्पादन करने वाले लोग बनायेंगे, जिसमें जीने का अधिकार सिर्फ़ काम करने वालों को होगा, जिसमें मुफ्तख़ोरी, मुनाफ़ाख़ोरी और बौद्धिक काम करने वालों के विशेषाधिकारों के लिए कोई स्थान नहीं होगा। केवल ऐसी ही व्यवस्था पूँजी के नागपाश से मुक्त करके हमारे समाज को प्रगति की अनछुई ऊँचाइयों तक पहुँचा सकेगी।

(2) हम भलीभाँति समझते हैं कि इस अन्तिम लक्ष्य तक पहुँचने का रास्ता अत्यधिक लम्बा और बीहड़ है, लेकिन रास्ते की चुनौतियाँ दृढ़प्रतिज्ञ यात्रियों को यात्रा शुरू करने से नहीं रोक सकतीं। हज़ारों मील लम्बे सफर की शुरुआत भी एक कदम उठाने से ही होती है। और फिर यह भी याद रखना होगा कि हम शून्य से शुरुआत नहीं कर रहे हैं। हमारे पीछे संघर्षों और शहादतों की एक समृद्ध विरासत है और वर्तमान समय में भी पूरे देश के अलग-अलग हिस्सों में युवाओं के क्रान्तिकारी संघर्ष जारी हैं। जरूरत इस बात की है कि अतीत के सकारात्मक-नकारात्मक अनुभवों का निचोड़ निकाला जाये, वर्तमान परिस्थिति और नये बदलावों का अध्ययन किया जाये, उनके आधार पर संघर्ष की नीति-रणनीति में जरूरी बदलाव किये जायें और फिर क्रान्तिकारी युवाओं के बिखरे हुए संघर्षों को एक सही-सटीक कार्यक्रम के आधार पर एकजुट कर दिया जाये। अपने कार्यक्रम को अमल में लाते हुए नौजवान भारत सभा देश के क्रान्तिकारी युवा आन्दोलन की एकजुटता के लिए अपनी कोशिशें लगातार जारी रखेगी।

(3) नौजवानों को पूँजी की सत्ता को ध्वस्त करने की फ़ैसलाकुन लड़ाई के अन्तिम लक्ष्य को पलभर के लिए भी भूलना नहीं चाहिए, लेकिन उसकी तैयारी की लम्बी प्रक्रिया में उन्हें रोज़मर्रा के जीवन में जनजीवन की बहुतेरी छोटी-बड़ी समस्याओं को लेकर, अपनी न्यायसंगत माँगों एवं अधिकारों को लेकर आन्दोलनों में उतरना होगा, रोज-रोज की ज़िन्दगी में आम हो चुके अन्यायों-अत्याचारों के ख़िलाफ़ आवाज बुलन्द करनी होगी, इस व्यवस्था की चौहद्दी के भीतर छोटे-बड़े सुधारों के लिए भी लड़ना होगा। इस प्रक्रिया में क्रान्तिकारी नौजवानों को आम जनता का विश्वास जीतने का, व्यवहार में अपने को सिद्ध करने का तथा आगे की बड़ी लड़ाइयों के लिए अपनी ताकत तोलने और पूर्वाभ्यास का अवसर मिलेगा। याद रहे कि सुधारों के लिए लड़ना हर हाल में सुधारवाद नहीं होता। यदि क्रान्तिकारी परिवर्तन का लक्ष्य और सुनिश्चित कार्ययोजना हमारे पास हों तो व्यापक आबादी से एकजुटता बनाने, उसकी चेतना को जुझारू बनाने तथा उसे जागृत, गोलबन्द और संगठित करने के उद्देश्य से हम सुधारों और अधिकारों की जिन छोटी-छोटी लड़ाइयों से शुरुआत करते हैं, वे एक लम्बे क्रान्तिकारी संघर्ष की कड़ी बन जाती हैं। यदि सुधारों को ही लक्ष्य बना लिया जाये तो वह इसी व्यवस्था में पैबन्द लगाने जैसा होता है जिसे हम सुधारवाद कह सकते हैं। लेकिन हमें यह भी याद रखना होगा कि सुधारों और अधिकारों की छोटी-छोटी रोजमर्रा की लड़ाइयों में व्यापक आम आबादी को जागृत और संगठित किये बिना, यदि कुछ युवा व्यक्तिगत शौर्य और शहादत के सहारे क्रान्ति का सपना देखते हैं तो यह मध्यमवर्गीय क्रान्तिकारिता की जल्दबाज मानसिकता होगी जिसे हम दुस्साहसवाद भी कहते हैं। याद रहे कि क्रान्ति हमेशा आम जनता करती है, मुट्ठीभर बहादुर लोग नहीं। क्रान्ति का हर शार्टकट हमें क्रान्ति से दूर ही ले जाता है। हमें सुधारवाद और दुस्साहसवाद के दो छोरों के भटकावों से बचते हुए भारत के नौजवान आन्दोलन को क्रान्तिकारी जनदिशा के आधार पर आगे बढ़ाना होगा।

(4) पूँजीवाद के इस बर्बर मानवद्रोही दौर ने व्यापक आम नौजवान आबादी के सामने जो सबसे ज्वलन्त एवं फौरी सवाल ला खड़े किये हैं, वे हैं लगातार महँगी और पहुँच से दूर होती शिक्षा तथा रोजगार के अवसरों में लगातार कमी। स्थिति अब असहनीय और विस्फोटक होती जा रही है। हर वर्ष कल-कारख़ानों और दफ्तरों से लाखों मज़दूरों और लाखों मध्यवर्गीय लोगों की छँटनी तथा लाखों छोटे किसानों के जगह-जमीन से उजड़ने के चलते हालात और अधिक बदतर हो रहे हैं और मुनाफ़ाख़ोरों को सस्ती से सस्ती दरों पर श्रमशक्ति निचोड़ने का मौका मिल रहा है। इसलिए पूँजीवादी व्यवस्था के विरुद्ध क्रान्तिकारी नौजवान आन्दोलन का जो नारा सर्वप्रमुख होगा वह है – सबके लिए समान शिक्षा और सबको रोजगार के समान अवसर’। बेरोजगारी पूँजीवादी उत्पादन-प्रणाली की एक अनिवार्य उपज है। वर्ग-विभाजित समाज में शिक्षा ऊपर से नीचे तक असमान होती है और यह असमानता लगातार बढ़ती जाती है। जिस शिक्षा से रोजगार की गुंजाइश अधिक होती है, वह मुट्ठीभर धनिकों की औलादों की बपौती हो जाती है और घटती सीटों – बढ़ती फीसों’ का आम चलन ग़रीब और औसत मध्यवर्गीय युवाओं को उच्च शिक्षा के कैम्पसों से बाहर धकेल देता है। इसलिए असमान एवं महँगी शिक्षा और बेरोजगारी के विरुद्ध संघर्ष का नारा वस्तुतः पूँजीवादी व्यवस्था के एक आम नियम और एक आम प्रवृत्ति पर चोट करता है। यह क्रान्तिकारी नौजवान आन्दोलन का सर्वोपरि रणनीतिक नारा है। समान शिक्षा और सबको रोजगार के समान अवसर का संघर्ष अनगिनत छोटे-छोटे संघर्षों की कड़ियों से निर्मित होगा और कई मंजिलों से गुजरकर व्यापक एवं उन्नत बनेगा। मुफ्त एवं समान प्राथमिक शिक्षा की माँग तथा शिक्षा को मुनाफ़े का धन्धा बनाने पर रोक के लिए आन्दोलन संगठित करना तथा इस माँग को लेकर आम नागरिकों को भी लामबन्द करना नौजवान आन्दोलन का एक अहम कार्यभार है तथा समान शिक्षा और सबको रोजगार के लिए संघर्ष की एक कड़ी है। सरकार जब तक हर काम करने योग्य व्यक्ति को काम न दे सके, तब तक भरण-पोषण योग्य बेरोजगारी भत्ता तो अवश्य ही दे-इस माँग को लेकर उठाया जाने वाला संघर्ष शिक्षा और रोजगार के मसले पर जारी दीर्घकालिक संघर्ष की सर्वाधिक महत्वपूर्ण कड़ी है। इनके अतिरिक्त नौजवानों को उच्च शिक्षा में सीटों की घटोत्तरी और फीसों की बढ़ोत्तरी के हर कदम का डटकर विरोध करना होगा। इसी प्रकार मेडिकल, तकनीकी और प्रबन्धन आदि विशिष्ट पेशेवर पाठ्यक्रमों में डोनेशन की व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष भी नौजवान आन्दोलन का एक मुद्दा है, जिसे आगे बढ़ाने में वह क्रान्तिकारी छात्र संगठनों के साथ बढ़-चढ़कर भागीदारी करेगा। शिक्षा क्षेत्र में अन्धाधुन्ध जारी निजीकरण-उदारीकरण की नीतियाँ – यानी शिक्षा प्रतिष्ठानों को देशी-विदेशी पूँजीपतियों को प्रत्यक्ष या परोक्ष ढंग से सौंपते जाने की नीतियाँ शिक्षा को आम लोगों की पहुँच से ज़्यादा से ज़्यादा दूर करने तथा बेरोजगारी बढ़ाने में आज सबसे अहम भूमिका निभा रही हैं। इसलिए समान शिक्षा और सबको रोजगार के समान अवसर के लक्ष्य के लिए सक्रिय नौजवान आन्दोलन को इन नीतियों का वास्तविक चरित्र उजागर करना होगा और इनके विरुद्ध संघर्ष करते हुए नौजवानों के सामने और पूरे समाज के सामने वैकल्पिक जनपक्षधर नीतियों का खाका पेश करना होगा। बढ़ती आबादी को बेरोजगारी का कारण बताने वाले प्रतिक्रियावादी माल्थसवादी सिद्धान्त के नये-नये संस्करणों का सुविचारित तर्कपूर्ण खण्डन करते हुए हमें इस सच्चाई को लगातार स्पष्ट करना होगा कि बेरोजगारी का बुनियादी कारण मुनाफ़े के लिए उत्पादन की प्रणाली है, न कि बढ़ती आबादी। जब विकास के इतने अधिक काम पड़े हों, प्राकृतिक स्रोत-संसाधन भी हों और काम करने वाले लोग भी, तो रोजगार की कमी होनी ही नहीं चाहिए। उत्पादन यदि बाजार के लिए नहीं बल्कि मानवीय ज़रूरतों के लिए हो तो सभी काम करने वालों की सभी आवश्यकताएँ पूरी की जा सकती हैं। नौजवान भारत सभा शिक्षा और रोजगार के मसले पर संघर्ष करते हुए बेरोजगारी और आबादी विषयक भ्रामक प्रचारों के विरुद्ध व्यापक शिक्षा एवं प्रचार का अभियान चलायेगी ताकि बेरोजगारी के मूल कारण – पूँजीवाद के विरुद्ध नौजवानों को लामबन्द किया जा सके।

(5) सामाजिक रूढ़ियों के विरुद्ध अनवरत, समझौताहीन संघर्ष किसी भी देश के नौजवान आन्दोलन की एक बुनियादी एवं अनिवार्य जिम्मेदारी है। जातिगत एवं धार्मिक-सामाजिक रूढ़ियाँ और अन्धविश्वास आम जनता के लिए दिमाग़ी ग़ुलामी की बेड़ियाँ हैं। दिमाग़ी ग़ुलामी की इन बेड़ियों को तोड़ने के लिए यदि हम आगे कदम नहीं बढ़ायेंगे तो पूँजीवाद की सामाजिक-आर्थिक ग़ुलामी के ख़िलाफ़ जनता का मुक्ति-संघर्ष भी आगे नहीं बढ़ सकेगा। जाति और धर्म के आधार पर जनता का बँटवारा हमेशा से मुट्ठीभर हुक़ूमती जमातों के हाथ मजबूत करता रहा है। अंग्रेजों ने भी इसका भरपूर लाभ उठाया था और वोटबैंक की राजनीति करने वाली पूँजीवादी पार्टियाँ भी आज और बड़े पैमाने पर तथा शातिराना ढंग से यह खेल खेल रही हैं। तरह-तरह के धार्मिक अन्धविश्वास जनता को वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि, तर्कशक्ति और सही इतिहास-बोध से लैस नहीं होने देते। वे जनता को भाग्यवादी बनाकर उसकी विराट इतिहास-निर्मात्री शक्ति को निष्क्रिय बना देते हैं। यही कारण है कि जो पूँजीवाद भौतिक चीजों के उत्पादन में विज्ञान का इस्तेमाल करता है, वही सिनेमा, टी.वी., रेडियो, इण्टरनेट आदि उन्नत संचार-माध्यमों से तरह-तरह की रूढ़ियों और अन्धविश्वासों का प्रचार करता है और इस तरह वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि को कुन्द करने के लिए विज्ञान से जन्मी तकनीकों एवं यंत्रों का योजनाबद्ध ढंग से इस्तेमाल करता है। नौजवान भारत सभा धार्मिक अन्धविश्वास तथा धार्मिक एवं जातिगत रूढ़ियों-मान्यताओं के विरुद्ध लगातार मुहिम चलायेगी। यह जनता को भाग्यवाद की जकड़न से मुक्ति दिलाने के लिए और धार्मिक-जातिगत आधार पर खड़ी अलगाव की दीवारों को गिराने के लिए अनवरत प्रयासरत रहेगी। यह पूँजीवादी संचार-माध्यमों द्वारा रूढ़ियों एवं अन्धविश्वास के प्रचार की साजिशों का हर सम्भव तरीके से भण्डाफोड़ करेगी। विभिन्न सामाजिक आयोजनों के अतिरिक्त नौजवान भारत सभा के कार्यकर्ता अपने जीवन और आचरण से अन्धविश्वास और जातिवाद का विरोध करते हुए वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि की नजीर पेश करने की हर मुमकिन कोशिश करेंगे।

(6) क्रान्ति की तलवार विचारों की सान पर तेज़ होती है’ – भगतसिंह का यह कथन हमारे लिए एक मार्गदर्शक सूत्रवाक्य है। नौजवान भारत सभा पुस्तकालयों, अध्ययन मण्डलों, प्रचार अभियानों, पर्चों-पैम्‍फ़लेटों, पत्रिकाओं-पुस्तकों और विभिन्न सांस्कृतिक उपक्रमों के माध्यम से नौजवानों के बीच एक नये क्रान्तिकारी प्रबोधन की मुहिम पैदा करेगी, उन्हें वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि और इतिहास-बोध से लैस करेगी, पूँजीवादी उत्पादन, राजकाज और समाज के ढाँचे को समझने में उन्हें सक्षम बनायेगी तथा यह समझदारी देगी कि इस व्यवस्था को नष्ट करके इसका क्रान्तिकारी विकल्प किस प्रकार निर्मित किया जा सकता है। नौजवान भारत सभा पूँजीवादी जीवन-मूल्यों और संस्कृति की मानवद्रोही वास्तविकता को उजागर करते हुए समाजवादी जीवन-मूल्यों और संस्कृति का लगातार प्रचार-प्रसार करेगी। एक वैचारिक-सांस्कृतिक क्रान्ति की लहर पैदा किये बिना किसी आमूलगामी सामाजिक क्रान्ति की कल्पना तक नहीं की जा सकती। नौजवान भारत सभा क्रान्तियों के इतिहास और क्रान्तिकारी विचारों की विरासत से नौजवानों को परिचित करायेगी और फिर इस विचार-सम्पदा को लेकर आम मेहनतकश आबादी तक जाने के लिए उनका आह्वान करेगी। आज के बच्चे ही कल के युवा हैं। इसलिए नौजवान भारत सभा बच्चों के मोर्चे पर काम करना भी अपनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मानती है। वर्तमान शिक्षा-प्रणाली, सिनेमा-टी.वी. और बाज़ारू बाल-साहित्य आज बाल मानस को वैज्ञानिक दृष्टि देने के बजाय उसे रोगी और कुन्द बना रहे हैं। अपने सांस्कृतिक-सामाजिक आयोजनों, बाल-पुस्तकालयों, बाल-सभाओं के गठन, कार्यशालाओं और बाल-शिक्षा के कार्यक्रमों के जरिए नौजवान भारत सभा बच्चों को रूढ़ियों-अन्धविश्वासों से मुक्त करने और उन्हें वैज्ञानिक जीवनदृष्टि देने के लिए प्रयास करेगी।

(7) नौजवान भारत सभा सभी पूँजीवादी पार्टियों और मेहनतकशों का नकली रहनुमा बनी हुई संसदीय वामपन्थी पार्टियों के जनविरोधी चरित्र को उजागर करती रहेगी, नौजवानों को इनका पिछलग्गू बनने से आगाह करती रहेगी और आम जनता को चेतावनी देती रहेगी कि वह इनके झाँसे में न आये। नौजवान भारत सभा पूँजीवादी संसदीय जनतंत्र की कलई खोलते हुए आम मेहनतकश और मध्यवर्गीय आबादी के बीच प्रचारात्मक कार्रवाइयों के द्वारा लगातार यह बतायेगी कि यह जनतंत्र वास्तव में एक दमनकारी धनतंत्र है – यह ऊपर की बीस फ़ीसदी लुटेरी और परजीवी आबादी के लिए जनतंत्र है और शेष अस्सी फ़ीसदी आम आबादी के लिए निर्मम स्वेच्छाचारी निरंकुशतंत्र है। पूँजीवादी चुनावी राजनीति के सारे छल-छद्म को उजागर करते हुए नौजवान भारत सभा धार्मिक कट्टरपन्थी ताकतों की फासिस्ट राजनीति के विरुद्ध हर स्तर पर संघर्ष करेगी जिन्होंने पूँजीवादी व्यवस्था के ढाँचागत संकट के दौर में विनाशकारी शक्ल अख्तियार कर ली है, जो जनता के बीच मौजूद धार्मिक रूढ़ियों का लाभ उठाकर नरसंहारों का ताण्डव रचती रहती हैं और फिर लाशों की आँच पर चुनावी रोटियाँ सेंकती रहती हैं। अन्य चुनावी पार्टियाँ जो इनके विरोध का दम भरती हैं, वे भी वोटबैंक की राजनीति के लिए जाति-धर्म का इस्तेमाल करती हैं और प्रकारान्तर से साम्प्रदायिक फासीवाद को खाद-पानी देने का काम करती हैं। नौजवान भारत सभा व्यापक जनसमुदाय को इस सच्चाई से अवगत कराने की हरचन्द कोशिश करेगी कि साम्प्रदायिक फासीवादी ताकतों को किसी भी पूँजीवादी पार्टी या चुनावी वामपन्थियों द्वारा चुनावी राजनीति के अखाड़े में शिकस्त देकर समाप्त नहीं किया जा सकता। केवल व्यापक जनता की जुझारू एकजुटता और क्रान्तिकारी जनसंघर्षों की प्रक्रिया ही इन्हें वास्तव में पीछे धकेल सकती है और फिर कब्र तक पहुँचा सकती है। नौजवान भारत सभा ‘सर्वधर्म समभाव’ के छद्म को उजागर करते हुए वास्तविक धर्म-निरपेक्षता के मूल्यों का प्रचार-प्रसार करेगी तथा जनता के बीच यह स्पष्ट करेगी कि धार्मिक आस्था या अनीश्वरवादी मान्यता को हर नागरिक का निजी मामला मानते हुए धर्म का राजनीतिक-सामाजिक जीवन से पूर्ण पृथक्करण ही वास्तविक धर्मनिरपेक्षता है।

(8) कोई भी नौजवान क्रान्तिकारी है या नहीं, इसकी एकमात्र कसौटी यही हो सकती है कि वह आम मेहनतकश जनता के साथ पूरी तरह से घुल-मिल जाता है अथवा नहीं, उसके जीवन और संघर्षों के साथ पूरी तरह से जुड़ जाता है अथवा नहीं। नौजवान भारत सभा के कार्यकर्ता सादा और श्रमसाध्य जीवन बिताते हुए व्यापक मेहनतकश आबादी के साथ एकजुटता कायम करेंगे और देश के नौजवानों के सामने प्रेरणादायी उदाहरण प्रस्तुत करेंगे। वे अपने निजी जीवन और राजनीतिक व्यस्तताओं से समय निकालकर उत्पादक कार्रवाइयों में भागीदारी की यथासम्भव कोशिश करेंगे, मेहनतकश जनसमुदाय के बीच विभिन्न शैक्षणिक-सांस्कृतिक गतिविधियों के द्वारा उनकी चेतना का स्तर ऊपर उठाने की लगातार कोशिश करेंगे तथा उनके रोजमर्रा के जीवन और संघर्षों में सक्रिय भागीदारी करेंगे। वे आम जनता को सिखाने से पहले उससे सीखेंगे और जनता की सेवा करो’ सूत्रवाक्य पर सच्चे दिल से अमल करेंगे। आम जनता और उत्पादक कार्रवाइयों के बीच जाकर नौजवान भारत सभा के सिपाही उस समाज का बारीकी से अध्ययन करेंगे जिसे बदलना उनका लक्ष्य है क्योंकि चीजों को बदलने के लिए उन्हें जानना जरूरी होता है और चीजों को बदलने की प्रक्रिया में ही खुद को बदलना होता है।

(9) किसी भी व्यवस्था में शासक वर्ग की संस्कृति ही पूरे समाज पर प्रभावी होती है तथा सामाजिक संस्थाओं और शिक्षातंत्र पर भी शासक वर्ग का ही वैचारिक-राजनीतिक वर्चस्व कायम होता है। पूरे सामाजिक-आर्थिक ढाँचे को तभी बदला जा सकता है जब शासक वर्ग की राज्यसत्ता का ध्वंस करके मेहनतकश जनता अपनी राज्यसत्ता स्थापित कर ले। विभिन्न शैक्षिक-सांस्कृतिक उपक्रमों और सामाजिक रचनात्मक कार्यों के जरिए समाज को बदल डालने की सोच एक सुधारवादी दृष्टिकोण है जिसका प्रचार पूँजीवादी बुद्धिजीवी हमेशा से करते रहे हैं। नौजवान भारत सभा इस सुधारवादी नजरिए को पूरी तरह से ख़ारिज करती है, लेकिन राजनीतिक संघर्ष के लिए आम जनता को तैयार करने की प्रक्रिया में सामाजिक-सांस्कृतिक-शैक्षिक रचनात्मक कार्यों की भूमिका को तथा इन क्षेत्रों में वैकल्पिक संस्थाएँ खड़ी करने के उपक्रमों को वह अपरिहार्य मानती है। इन प्रयासों के माध्यम से युवा समुदाय व्यापक जनता के साथ एकजुटता कायम करता है, उसका विश्वास जीतता है, जन-पहलकदमी को जागृत करता है तथा जनता के सामने भावी समाज की शिक्षा, संस्कृति और सामाजिक संस्थाओं का एक सामान्य चित्र उपस्थित करता है। नौजवान भारत सभा शहरों और गाँवों की ग़रीब मेहनतकश आबादी के बीच बाल शिक्षा की संस्थाएँ खड़ी करेगी, विभिन्न सांस्कृतिक आयोजन करेगी, सांस्कृतिक अभियान चलायेगी, मेहनतकशों की सांस्कृतिक टोलियाँ संगठित करेगी, सहयोगी डॉक्टरों और मेडिकल छात्रों की सहायता से स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिविरों तथा जन स्वास्थ्य शिक्षा अभियानों का आयोजन करेगी, प्रौढ़-शिक्षा के लिए रात्रि-पाठशालाओं का आयोजन करेगी, पुस्तकालयों की स्थापना करेगी, शराबख़ोरी, दहेजप्रथा, जाति-पाँति, छुआछूत और सभी सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध व्यापक प्रचार-अभियान चलायेगी, समय-समय पर सफाई अभियान चलायेगी तथा तरह-तरह के रचनात्मक कार्यक्रम आयोजित करेगी।

(10) नौजवान भारत सभा स्त्री-पुरुष असमानता, स्त्रियों के उत्पीड़न, उनकी घरेलू ग़ुलामी और पुरुष स्वामित्ववाद की संस्कृति के विरुद्ध लगातार, पुरजोर ढंग से प्रचार-अभियान चलायेगी क्योंकि स्त्रियों की आधी आबादी की पहलकदमी जागृत किये बिना, सामाजिक जीवन में उसकी सक्रिय भागीदारी के बिना कोई भी जन-मुक्ति-संघर्ष जीत के मुकाम तक नहीं पहुँच सकता। स्त्रियों की मुक्ति के लिए संघर्ष किये बिना पूँजीवाद के विरुद्ध संघर्ष को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता और पूँजीवाद की बेड़ियों से समाज को मुक्त किये बिना स्त्रियों की मुक्ति भी पूरी तरह से सम्भव नहीं। नौजवान भारत सभा अपनी सभी सरगर्मियों में युवा स्त्रियों की ज़्यादा से ज़्यादा भागीदारी के लिए हरचन्द कोशिश करेगी। वह स्त्रियों का उत्पीड़न करने वाली सभी धार्मिक कुरीतियों-जातिगत रूढ़ियों, पुरातनपन्थी सामाजिक रीति-रिवाजों और दहेज प्रथा जैसी बर्बर संस्थाओं का पुरजोर विरोध करने के लिए युवाओं को लामबन्द करेगी, कानून-व्यवस्था के स्त्री-उत्पीड़क चरित्र के विरुद्ध लगातार आवाज बुलन्द करेगी और स्त्री-उत्पीड़न की घटनाओं के विरुद्ध डटकर मोर्चा लेगी।

(11) नौजवान भारत सभा अंग्रेजी भाषा की औपनिवेशिक विरासत के विरुद्ध तथा अंग्रेजियत की जनविरोधी कुलीन संस्कृति के विरुद्ध सतत् संघर्ष करेगी। वह शिक्षा, शासन और न्यायपालिका के काम भारतीय भाषाओं के माध्यम से करने के लिए तथा सभी भारतीय भाषाओं को समान दर्जा देने के लिए संघर्ष करेगी।

(12) नौजवान भारत सभा देश की विभिन्न राष्ट्रीयताओं के दमन-उत्पीड़न का विरोध करती है, उनके न्यायसंगत संघर्षों का समर्थन करती है तथा उनके आत्मनिर्णय के जनवादी अधिकार को पूरी तरह से न्यायोचित मानती है। साथ ही, वह भाषाई या क्षेत्रीय आधार पर जनता को और उसके संघर्षों को विभाजित करने की हर साजिश का पुरजोर विरोध करती है तथा नौजवानों का आह्वान करती है कि वे अपनी देशव्यापी एकजुटता को फ़ौलादी बनाने के साथ ही व्यापक मेहनतकश जनता को भी भाषाई या क्षेत्रीय संकीर्ण बँटवारे की मानसिकता से मुक्त करने के लिए हरसम्भव कोशिश करें।

(13) ज़िन्दगी से बेइन्तहा प्यार करने वाले लोग ही बेहतर ज़िन्दगी का सपना देख सकते हैं और फिर उसे साकार करने के लिए हर तरह की क़ुर्बानी दे सकते हैं। सामाजिक क्रान्ति के युवा सेनानियों के लिए ज़रूरी है कि वे शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ हों, लौह-अनुशासन और अटूट एकजुटता के साथ-साथ स्फूर्ति, जीवन्तता, पहलकदमी और सर्जनात्मक ऊर्जा से लबरेज हों। इस उद्देश्य से नौजवान भारत सभा नौजवानों के लिए नियमित रूप से खेलकूद और शारीरिक शिक्षा के कार्यक्रमों का आयोजन करेगी, वालण्टियर दस्ते संगठित करेगी, उत्पादक कार्रवाइयों, शिल्प और कला में प्रशिक्षण के लिए शिविरों और कार्यशालाओं का आयोजन करेगी, समय-समय पर पर्यटन-यात्राओं के कार्यक्रम बनायेगी तथा राजनीतिक चेतना के साथ-साथ युवा कार्यकर्ताओं के सांस्कृतिक स्तरोन्नयन के लिए विभिन्न कार्यक्रम हाथ में लेगी।

(14) नौजवान भारत सभा देश के किसी कोने में साम्राज्यवाद और देशी पूँजीवादी व्यवस्था के विरुद्ध उठ खड़े हुए आम जनता के हर संघर्ष को समर्थन देगी और उसे हर सम्भव सहायता देगी। मेहनतकशों और आम मध्यवर्गीय जनता के हर न्यायपूर्ण संघर्ष को समर्थन और उसमें भागीदारी नौजवान भारत सभा अपना कर्तव्य और दायित्व मानती है। नागरिक आजादी और जनवादी अधिकारों के प्रत्येक आन्दोलन के साथ नौजवान भारत सभा अपनी जुझारू एकजुटता जाहिर करती है और उन्हें सक्रिय सहयोग का वचन देती है।

(15)नौजवानों को राजनीति से दूर रहना चाहिए’,उन्हें देश की चिन्ता छोड़ अपने कैरियर पर ध्यान देना चाहिए’ – ऐसे विचारों को नौजवान भारत सभा सिरे से ख़ारिज करती है। आम जनता के बहादुर नौजवान बेटे-बेटियाँ ही किसी देश और समाज के भाग्य-विधाता और भविष्य-निर्माता हुआ करते हैं – यह एक इतिहाससिद्ध सच्चाई है। युवाओं के बीच गैरराजनीतिकरण और समाजविमुख आत्मग्रस्तता के सड़े विचारों की फेरी लगाने वाले बुद्धिजीवी वस्तुतः हुकूमती जमातों के भाड़े के टट्टू होते हैं जो युवा समुदाय को एक बेहतर भविष्य के लिए संगठित संघर्ष से अलग कर देना चाहते हैं।

(16) नौजवान भारत सभा गैर-सरकारी संगठनों (एन.जी.ओ.) या स्वयंसेवी संगठनों की राजनीति का पुरजोर विरोध करती है, इनकी ख़तरनाक साजिश के ख़िलाफ़ देश के नौजवानों को आगाह करती है और इनके विरुद्ध व्यापक जनता को जागृत करने के लिए उनका आह्वान करती है। मुख्यतः साम्राज्यवादियों के अनुदानों और साथ ही देशी पूँजीपतियों के ट्रस्टों व सरकार के पैसों से चलने वाले ये संगठन (i) पूँजीवादी व्यवस्था (और समग्रता में, विश्व पूँजीवाद के) के प्रभावी ‘सेफ्टीवॉल्व’ के रूप में काम करते हैं तथा सुधारवादी पैबन्दसाजी के नये-नये शातिराना तौर-तरीके अपनाते हैं, (ii) भूमण्डलीकरण की नीतियों के प्रभावों को प्रचण्ड जनविस्फोटों की अनिवार्य परिणति तक पहुँचने के रास्ते में ‘स्पीड ब्रेकर’ का काम करते हैं, (iii) क्रान्ति की कतारों में भरती की सम्भावना से लैस रैडिकल युवाओं को सामाजिक कार्यों की आड़ में भरमा-बहकाकर सुधारवाद के दलदल में धँसा देते हैं, “वेतनभोगी सामाजिक कार्यकर्ता” बनाकर भ्रष्ट कर देते हैं और व्यवस्था में समायोजित कर लेते हैं, (iv) “गैर-पार्टी सक्रियतावाद” के सड़े विचारों की फेरी लगाते हुए नौजवानों की और पूरी जनता की चेतना का गैरराजनीतिकरण करते हैं, (v) सामाजिक समूहों, संस्तरों, अस्मिताओं, जातिभेद, लिंगभेद या क्षेत्रीय आधारों पर कायम विभेदों पर अतिरिक्त बल देते हुए समाज के आधारभूत वर्ग-विभाजन को दृष्टिओझल करते हैं, जनता की वर्ग चेतना को कुन्द करते हैं, जन संघर्षों को विखण्डित करते हैं और वर्ग संघर्ष के अग्रवर्ती विकास को रोकने की कोशिशों से पूँजीवाद की सेवा करते हैं, (vi) ये संगठन भूमण्डलीकरण की नीतियों को “मानवीय” चेहरा देने की कोशिश करते हुए, प्रकारान्तर से पिछड़े देशों में अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय पूँजी की पैठ को व्यापक एवं गहरा बनाने में साम्राज्यवादी अन्तरराष्ट्रीय संस्थाओं की अनिवार्य पूरक भूमिका निभाते हैं। ‘एन.जी.ओ.-सुधारवाद’ वस्तुतः विश्व पूँजीवाद का एक ट्रोजन हॉर्स है, यह पूँजीवादी व्यवस्था की एक नयी सुरक्षापंक्ति है, यह एक ख़तरनाक साम्राज्यवादी कुचक्र है। भेड़ की खाल पहने इस भेड़िए की असलियत उजागर करना, इनके विरुद्ध नौजवानों को और पूरी जनता को आगाह करना नौजवान भारत सभा अपना एक नितान्त आवश्यक कर्तव्य मानती है।

(17) नौजवान भारत सभा उन विभाजनकारी और विघटनकारी शक्तियों के विरुद्ध अडिग समझौताहीन संघर्ष की घोषणा करती है, जो नौजवानों को जाति या धर्म या क्षेत्र के आधार पर बाँटकर, अथवा इस या उस पूँजीवादी या नकली वामपंथी पार्टी का दुमछल्ला बनाकर नौजवान आन्दोलन को कमजोर कर देने या उसमें फूट डालने की कोशिशें करते रहते हैं। वह उन धुर प्रतिक्रियावादी ताकतों के विरुद्ध भी सतत् संघर्ष की घोषणा करती है जो धर्मान्धता और उग्र अन्धराष्ट्रवाद का जुनून उभाड़कर निराश-दिग्भ्रमित नौजवानों को फासिस्टों की कतारों में शामिल करने की साजिशें रचती रहती हैं।

(18) नौजवान भारत सभा न केवल पूरे देश के नौजवान आन्दोलन की एकजुटता की उत्कट पक्षधर है, बल्कि वह पूरी दुनिया के क्रान्तिकारी, प्रगतिशील, इन्साफ़पसन्द नौजवानों के सभी संघर्षों का समर्थन करती है। वह क्रान्तिकारी युवाओं की जुझारू अन्तरराष्ट्रीय एकजुटता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की घोषणा करती है।

(19) दुनिया के किसी भी देश में जारी जनता के साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष को नौजवान भारत सभा अपना समर्थन देती है। जहाँ कहीं भी मेहनतकश अवाम अपने अधिकारों के लिए पूँजीवाद के विरुद्ध संघर्ष कर रहा हो, नौजवान भारत सभा उसके प्रति अपने समर्थन और एकजुटता की घोषणा करती है। नौजवान भारत सभा पूरी दुनिया में जारी साम्राज्यवादी लूट का विरोध करने के साथ-साथ किसी भी देश पर साम्राज्यवादी हमले का, साम्राज्यवादी घुसपैठ और तख़्तापलट के षड्यंत्रों का और सभी साम्राज्यवादी युद्धों का भी पुरजोर विरोध करती है। वह नस्लवाद, रंगभेद और जियनवाद जैसी निकृष्ट जनविरोधी प्रवृत्तियों का भी पुरजोर विरोध करती है।

फाँसी से तीन दिन पहले भगतसिंह, राजगुरू और सुखदेव ने पंजाब के गवर्नर को भेजे गये अपने पत्र में लिखा था कि उनका संघर्ष पूँजीवाद के विरुद्ध लगातार जारी युद्ध का ही एक अंग है और यह तब तक जारी रहेगा जब तक शक्तिशाली व्यक्ति, चाहे वे अंग्रेज पूँजीपति हों या भारतीय, भारतीय जनता और श्रमिकों की आय के साधनों पर अपना एकाधिकार जमाये रखेंगे और उनका ख़ून चूसना जारी रखेंगे। पत्र में उन्होंने यह घोषण की थी: “यह आपकी इच्छा है कि आप जिस परिस्थिति को चाहे चुन लें, परन्तु यह युद्ध चलता रहेगा। इसमें छोटी-छोटी बातों पर ध्यान नहीं दिया जायेगा। बहुत सम्भव है कि यह युद्ध भयानक स्वरूप धारण कर ले। यह उस समय तक समाप्त नहीं होगा जबतक कि समाज का वर्तमान ढाँचा समाप्त नहीं हो जाता, प्रत्येक व्यवस्था में परिवर्तन या क्रान्ति नहीं हो जाती और सृष्टि में एक नवीन युग का सूत्रपात नहीं हो जाता।” पत्र में यह दृढ़ विश्वास प्रकट किया गया था कि: फ्निकट भविष्य में यह युद्ध अन्तिम रूप में लड़ा जायेगा और तब यह निर्णायक युद्ध होगा।”

जब हम आज के विश्व पूँजीवाद की स्थिति का ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में अध्ययन करते हैं और इसके ढाँचागत आर्थिक संकटों का जायजा लेते हैं तो भगतसिंह और उनके साथियों का उपरोक्त आकलन एकदम सही-सटीक प्रतीत होता है। विश्व-इतिहास के विकास की आम दिशा इंगित कर रही है कि हम पूँजीवाद के युग के अवसान की सदी में प्रविष्ट हो चुके हैं। यह सदी पूँजी की सत्ता के विरुद्ध फ़ैसलाकुन युद्ध की सदी है। हालाँकि पिछली सदी में ऐतिहासिक विश्व-महासमर के प्रथम चक्र में इतिहास की प्रगतिशील शक्तियों की हार के बाद प्रतिक्रिया की उन्मत्त शक्तियों की आक्रामकता आज विश्व स्तर पर अपने चरम पर है, लेकिन एशिया, लातिन अमेरिका और अफ्रीका के विभिन्न देशों से आगत के संकेत भी मिलने लगे हैं। अब यह तो समय बतायेगा कि किस देश के नौजवान आने वाले दिनों के ऐतिहासिक तूफ़ान को एक निश्चित दिशा देकर सामाजिक क्रान्ति में बदल डालने के काम को पहले शुरू करेंगे। इस महान कार्य में जुट जाने के लिए नौजवान भारत सभा भारत के सभी साहसी, स्वाभिमानी और प्रगतिशील नौजवानों का आह्वान करती है। नौजवान भारत सभा आम जनता के सभी बहादुर बेटे-बेटियों का आह्वान करती है-

उठो! जागो!! आगे बढ़ो!!!

एक हो जाओ! संगठित हो जाओ!! संघर्षों को आगे बढ़ाओ!!

अतीत की क्रान्तियों की विरासत से सीखो! वर्तमान का अध्ययन करो!! नये भविष्य के स्वप्न देखो!!! मुक्ति की नयी परियोजना गढ़ो और उस पर अमल करो!!!!

ज़रूरत है निरन्तर संघर्ष करने, कष्ट सहने और कुर्बानी भरा जीवन बिताने की। अपना व्यक्तिवाद पहले खत्म करो। व्यक्तिगत सुख के सपने उतारकर एक ओर रख दो और फिर काम शुरू करो। इंच-इंच कर आप आगे बढ़ेंगे। इसके लिए हिम्मत, दृढ़ता और बहुत मज़बूत इरादे की ज़रूरत है। कितने ही भारी कष्ट व कठिनाइयाँ क्यों न हों, आपकी हिम्मत न काँपे। कोई भी पराजय या धोखा आपका दिल न तोड़ सके। कितने भी कष्ट क्यों न आयें, आपका क्रान्तिकारी जोश ठण्डा न पड़े। कष्ट सहने और कुर्बानी करने के सिद्धान्त से आप सफलता हासिल करेंगे और ये व्यक्तिगत सफलताएँ क्रान्ति की अमूल्य सम्पत्ति होंगी।

-शहीद भगतसिंह (क्रान्तिकारी कार्यक्रम का मसविदा)

 

नौजवान भारत सभा संविधान (कांस्टीट्यूशन)

अनुच्छेद – 1

संगठन का नाम

संगठन का नाम नौजवान भारत सभा होगा। हिन्दी में इसका संक्षिप्त रूप नौभास और अंग्रेजी में एनबीएस (NBS) होगा।

अनुच्छेद – 2

झण्डा और प्रतीक

संगठन के झण्डे की लम्बाई और चौड़ाई का अनुपात 3: 2 होगा। झण्डा ऊर्ध्वाधर रूप से (Vertically) नीले और लाल रंग में विभाजित होगा। बायीं ओर का 1/3 भाग नीला होगा और दायीं ओर का 2/3 भाग लाल होगा। नीले रंग वाले भाग में ऊपर बायें कोने में लाल रंग के तीन पंचकोणीय सितारे होंगे और उनके नीचे सफेद रंग में तनी हुई मुट्ठी होगी।

झण्डे का नीला रंग युवा ऊर्जा और स्वप्नदर्शी सर्जनात्मकता का प्रतीक है, जबकि लाल रंग युवाओं के क्रान्तिकारी संघर्षों के जुझारूपन एवं क़ुर्बानी की भावना का प्रतीक है। तीन लाल सितारे नौजवानों के क्रान्तिकारी आदर्श, फौलादी एकजुटता और वैचारिक दृष्टि एवं दिशा के प्रतीक हैं। साथ ही, ये तीन लाल सितारे पूँजीवाद और साम्राज्यवाद के विरुद्ध शहरी एवं ग्रामीण सर्वहारा वर्ग, अन्य ग़रीब मेहनतकश एवं अर्द्धसर्वहारा वर्ग तथा शहरी एवं ग्रामीण मध्यवर्गों के नौजवानों की वर्गीय लामबन्दी के भी प्रतीक हैं। सितारों के पाँच कोण पूरी दुनिया के पाँचों महाद्वीपों के क्रान्तिकारी नौजवानों की जुझारू एकजुटता के प्रतीक हैं। तनी हुई मुट्ठी नौजवानों के अडिग संकल्प का प्रतीक है। मुट्ठी का सफेद रंग क्रान्तिकारी नौजवानों की सत्यनिष्ठा, सादगी और ईमानदारी का प्रतीक है।

अनुच्छेद – 3

लक्ष्य एवं उद्देश्य

(i) साम्राज्यवाद और पूँजीवाद के विरुद्ध संघर्ष और समाजवादी क्रान्ति के लिए युवा समुदाय (युवकों और युवतियों) को जागृत, गोलबन्द और संगठित करना।

(ii) युवा समुदाय को व्यापक मेहनतकश आबादी के जीवन और संघर्षों से जोड़ना, उनकी सेवा में सन्नद्ध करना, अपनी माँगों व अधिकारों को लेकर विभिन्न शोषित वर्गों द्वारा किये जाने वाले आन्दोलनों एवं संघर्षों को समर्थन देना और उनमें सक्रिय भागीदारी करना।

(iii) ‘सबके लिए समान शिक्षा और सबको रोजगार के समान अवसर’ – इस माँग को लेकर पूँजीवादी व्यवस्था के विरुद्ध देशव्यापी नौजवान आन्दोलन संगठित करना। इस लम्बी प्रक्रिया के दौरान, संघर्ष के फौरी मुद्दे के तौर पर भरण-पोषण योग्य बेरोजगारी भत्ते की माँग उठाना। शिक्षा संस्थानों में ‘सीटें घटाने और फीसें बढ़ाने’ तथा शिक्षा के कुलीनीकरण की साजिशाना कोशिशों का विरोध करना। शिक्षा और रोजगार के सवाल पर देशव्यापी, क्रान्तिकारी छात्र-युवा आन्दोलन संगठित करने के लिए लगातार काम करना। वर्तमान जनविरोधी, अवैज्ञानिक पूँजीवादी शिक्षा-प्रणाली का विरोध करना, वैज्ञानिक, समाजवादी शिक्षा-प्रणाली के लिए संघर्ष करना तथा इस उद्देश्य से सक्रिय छात्र संगठनों का सक्रिय सहयोग करना।

(iv) सभी प्रकार की सामाजिक-धार्मिक रूढ़ियों, अन्धविश्वास, धार्मिक कट्टरता, खर्चीले आडम्बरपूर्ण कर्मकाण्डों, जातिगत भेदभाव की संस्कृति, दलित-उत्पीड़न एवं उनके प्रति अपमानजनक व्यवहार, अल्पसंख्यकों के दमन, स्त्री-उत्पीड़न और पुरुष-वर्चस्ववाद की मानसिकता एवं संस्कृति का लगातार प्रखर विरोध करना और उनके विरुद्ध समझौताहीन संघर्ष चलाना। जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्रीयता, नस्ल और लिंग के आधार पर बरते जाने वाले भेदभाव और शोषण-उत्पीड़न के विरुद्ध संघर्ष करना।

(v) सच्ची धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों का प्रचार-प्रसार करते हुए इनके लिए संघर्ष करना, सामाजिक-राजनीतिक संस्थाओं व गतिविधियों से धर्म के पूर्ण पृथक्करण के लिए संघर्ष करना, नागरिकों की अलग-अलग निजी आस्थाओं की समान आजादी के लिए संघर्ष करना।

(vi) नागरिक आजादी और जनवादी अधिकारों के लिए संघर्ष करना तथा हर ऐसे संघर्ष को यथाशक्ति, सच्चे दिल से समर्थन देना। पूँजीवादी जनवाद के छल-छद्म और झूठ-फ़रेब के विरुद्ध जनता के बीच और खासकर युवाओं के बीच लगातार भण्डाफोड़ और शिक्षा का काम जारी रखना।

(vii) सभी पूँजीवादी पार्टियों और संसदीय वामपन्थी पार्टियों के जनविरोधी चरित्र को नौजवानों और समूची जनता के सामने लगातार उजागर करना। हर तरह के सुधारवाद, और ख़ास तौर पर ‘एन.जी.ओ. सुधारवाद’ की असलियत उजागर करना। एन.जी.ओ. की ख़तरनाक साजिशों से नौजवानों को सावधान करना और उनके विरुद्ध संगठित करना। धार्मिक कट्टरपन्थी फासिस्टों के विरुद्ध युवाओं को जुझारू तौर पर लामबन्द करना।

(viii) व्यापक जन-समुदाय को जागृत और संगठित करने की लम्बी प्रक्रिया से गुज़रे बगैर, थोड़े से लोगों के शौर्य, शहादतों और शस्त्रबल से तुरत-फुरत क्रान्ति को अंजाम दे देने की मध्यमवर्गीय दुस्साहसवादी मानसिकता और ‘वीरपूजा’ की मानसिकता से नौजवानों को मुक्त करने के लिए उन्हें वैचारिक-राजनीतिक रूप से शिक्षित करना और क्रान्तिकारी जनदिशा को लागू करना।

(ix) युवा समुदाय को वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि और सही इतिहास-बोध से लैस करना, उनके सांस्कृतिक स्तरोन्नयन और वैचारिक-राजनीतिक शिक्षण-प्रशिक्षण के लिए हर सम्भव प्रयास करना। जनता के बीच क्रान्तिकारी सांस्कृतिक अभियान और राजनीतिक प्रचार-अभियानों के लिए नौजवानों के दस्ते तैयार करना। मानसिक श्रम एवं शारीरिक श्रम के बीच के अन्तर से जन्मी मानसिकता और संस्कृति के विरुद्ध युवा समुदाय को शिक्षित करना और विभिन्न उपक्रमों के माध्यम से उन्हें उत्पादक श्रम से जोड़ने की कोशिश करना। नौजवानों के बीच और पूरे समाज में श्रम की संस्कृति का प्रचार-प्रसार करना। नौजवानों को सादा और श्रमसाध्य जीवन बिताने तथा मेहनतकश जनता के बीच क्रान्ति का सन्देश लेकर जाने के लिए तैयार करना। उनमें अनुशासन और सामूहिकता के साथ-साथ स्फूर्ति, जीवन्ततता और सर्जनात्मकता पैदा करना।

(x) राष्ट्रीयताओं के उत्पीड़न का विरोध करना और अलग होने सहित उनके आत्मनिर्णय के अधिकार को स्वीकार करना।

(xi) शासक वर्गों द्वारा लगातार फैलाये जा रहे अन्धराष्ट्रवाद का तथा जनता में फूट डालने वाले क्षेत्रीय-राष्ट्रीय-भाषाई संकीर्णतावाद का विरोध करना।

(xii) देश के किसी भी हिस्से में न्यायोचित माँगों को लेकर चल रहे युवा आन्दोलन को समर्थन देना, समान लक्ष्यों को लेकर सक्रिय युवा संगठनों के साथ संयुक्त मोर्चा बनाने और एकता कायम करने के लिए तथा युवा आन्दोलन की देशव्यापी एकजुटता के लिए अपनी कोशिशें लगातार जारी रखना।

(xiii) पूरी दुनिया के क्रान्तिकारी युवा संगठनों एवं आन्दोलनों के साथ एकजुटता कायम करने की लगातार कोशिशें करना, उनके साथ दोस्ताना रिश्ते कायम करना और क्रान्तिकारी नौजवानों की अन्तरराष्ट्रीय एकजुटता पर बल देना।

(xiv) साम्राज्यवाद और पूँजीवाद के विरुद्ध दुनिया के किसी भी कोने में विभिन्न रूपों में जारी जनता के क्रान्तिकारी संघर्षों और आन्दोलनों को समर्थन देना।

अनुच्छेद – 4

बुनियादी कार्यक्रम

 (i) आम नौजवानों के जीवन और उनकी समस्याओं को ठोस रूप से समझने के लिए समय-समय पर जाँच-पड़ताल और सर्वेक्षण करना, अलग-अलग इलाकों में अध्ययन-दल भेजना। अपने कार्यक्रम और समकालीन वस्तुगत परिस्थितियों के अध्ययन के आधार पर नौजवानों की माँगों, समस्याओं और आवश्यकताओं को लेकर, परिस्थिति, शक्ति और चेतना के हिसाब से आन्दोलन संगठित करने की कोशिश करना।

(ii) जहाँ कहीं भी संगठन की इकाई मौजूद है, वहाँ नौजवानों के बीच सैद्धान्तिक प्रचार एवं शिक्षा, आन्दोलनात्मक प्रचार और न्यायोचित माँगों को लेकर आन्दोलन खड़ा करने की कोशिशें लगातार जारी रखना।

(iii) अपने लक्ष्य एवं उद्देश्य के अनुरूप, नौजवानों और व्यापक आम आबादी की समस्याओं और न्यायोचित माँगों को सम्बन्धित अधिकारियों और सरकार के सामने लगातार रखते रहना और स्थानीय से लेकर इलाकाई, और फिर बड़े से बड़े स्तर पर जुझारू नौजवान आन्दोलन और जुझारू जन-आन्दोलन खड़ा करने की कोशिश में लगातार जुटे रहना।

(iv) शिक्षा जगत से सम्बन्धित माँगों पर आन्दोलनरत छात्रों को सक्रिय समर्थन देना, रोजगार और शिक्षा की माँग पर क्रमशः ज़्यादा से ज़्यादा व्यापक और ज़्यादा से ज़्यादा जुझारू छात्र-युवा आन्दोलन खड़ा करने की दिशा में प्रयास जारी रखना।

(v) अपने कार्यक्षेत्र और प्रभावक्षेत्र में स्वतःस्फूर्त ढंग से, न्यायसंगत माँगों को लेकर उठ खड़े हुए युवाओं, छात्रों और आम जनता के किसी भी आन्दोलन का समर्थन करना और उसमें सक्रिय भागीदारी करते हुए सही दिशा में आगे बढ़ाने की हर सम्भव कोशिश करना। न्यायोचित माँगों को लेकर जारी आन्दोलनों में सक्रिय जनपक्षधर शक्तियों के साथ न्यूनतम आम सहमति के आधार पर संयुक्त मोर्चा बनाने की हर सम्भव कोशिश करना।

(vi) कार्यक्रम या नौजवान आन्दोलन की दिशा के बारे में मतभेद के बावजूद, सभी बिरादर क्रान्तिकारी नौजवान संगठनों के साथ और क्रान्तिकारी छात्र संगठनों के साथ संयुक्त मोर्चा और साझा कार्रवाइयों के लिए लगातार प्रयासरत रहना तथा क्रान्तिकारी संगठनों की देशव्यापी एकजुटता के लिए लगातार प्रयासरत रहना।

(vii) अपने कार्यक्षेत्र की जन समस्याओं को लेकर अपनी पहल पर आन्दोलन संगठित करना, उठ खड़े हुए आन्दोलनों में भागीदारी करना और जनता के विभिन्न वर्गों और तबकों का प्रतिनिधित्व करने वाली, आन्दोलनरत शक्तियों के साथ मुद्दों के आधार पर संयुक्त मोर्चा बनाने की कोशिश करना। क्रान्तिकारी जनसंगठनों के साथ परिस्थिति के अनुसार मुद्दों के आधार पर दीर्घकालिक या अल्पकालिक संयुक्त मोर्चा बनाने की कोशिश करना।

(viii) अपने उद्देश्य और कार्यक्रम का पर्चों, पुस्तिकाओं, नुक्कड़ सभाओं, घर-घर अभियानों और पदयात्राओं आदि के द्वारा व्यापक प्रचार करना, सदस्यता अभियान चलाना तथा जुझारू, समझदार और सक्रिय युवाओं को लेकर बुनियादी इकाइयाँ संगठित करना।

(ix) अपने उद्देश्य और कार्यक्रम को स्पष्ट करने तथा व्यापक से व्यापक स्तर पर नौजवानों की चेतना के क्रान्तिकारीकरण के लिए पर्चों-पुस्तिकाओं-पुस्तकों और पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन, पुस्तकालयों की स्थापना करना, अध्ययन-चक्र, अध्ययन-मण्डल, परिसंवाद, संगोष्ठी और प्रगतिशील बुद्धिजीवियों के व्याख्यानों का आयोजन करना।

(x) नौजवानों के सांस्कृतिक स्तरोन्नयन के लिए और नौजवान आन्दोलन के प्रचारात्मक कार्यों में संस्कृति के उपकरण को ज़्यादा से ज़्यादा प्रभावी बनाने के लिए सांस्कृतिक शिविरों, कार्यशालाओं आदि का आयोजन।

(xi) नौजवानों के बीच और पूरे समाज में क्रान्तिकारी प्रचार के लिए तथा सांस्कृतिक कार्यों को बल प्रदान करने के लिए सांस्कृतिक प्रचार यात्रएँ एवं सांस्कृतिक अभियान आयोजित करना, नाट्य टोलियाँ, गायन टोलियाँ और सांस्कृतिक प्रचार दस्ते संगठित करना तथा विभिन्न सांस्कृतिक आयोजन करना।

(xii) जनता के साथ घुलमिल जाने, उसकी सेवा करने, उससे सीखने तथा श्रम-संस्कृति को अपनाने के लिए नौजवानों को प्रेरित करने और क्रान्तिकारी युवा आन्दोलन को व्यापक मेहनतकश अवाम से जोड़ देने के उद्देश्य से शहरी मज़दूरों और गाँव के ग़रीबों के बीच रात्रि-पाठशालाओं, बाल शिक्षा कार्यक्रम, सफाई अभियान, स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिविर आदि का आयोजन। स्त्रियों की शिक्षा और सामाजिक-राजनीतिक कार्रवाइयों में उनकी भागीदारी बढ़ाने के उद्देश्य से विविध कार्यक्रम आयोजित करना।

(xiii) शराबबन्दी अभियान, दहेज-विरोधी अभियान, जाति-पाँति विरोधी अभियान, धार्मिक अन्धविश्वास एवं रूढ़ि विरोधी अभियान, नारी-उत्पीड़न विरोधी अभियान आदि को जुझारू सामाजिक आन्दोलन के रूप में संगठित करना। अपने जीवन से मिसाल पेश करके सामाजिक बुराइयों के प्रतिषेध के लिए युवाओं को प्रेरित करना, नारी उत्पीड़न की घटनाओं का संगठित प्रतिरोध करना, जात-पाँत तोड़क सामूहिक भोज और सामूहिक विवाह कार्यक्रमों आदि का आयोजन करना।

(xiv) नौजवानों के बीच स्फूर्ति, जागरूकता, जीवन्तता, अनुशासन, सामूहिकता, सामाजिकता, स्वास्थ्य-चेतना और सर्जनात्मकता को बढ़ावा देने के लिए खेलकूद कार्यक्रमों, शारीरिक शिक्षा एवं व्यायाम, भ्रमण-पर्यटन के कार्यक्रमों आदि का आयोजन करना। नौजवानों के वालण्टियर दस्ते संगठित करना।

(xv) बाढ़, सूखा, भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदाओं और महामारियों के समय अभियान चलाकर व्यापक जनसहयोग जुटाना और प्रभावित क्षेत्रों में वालण्टियरों की सहायता-टोलियाँ भेजना। साम्प्रदायिक और जातिगत दंगों में या दलित उत्पीड़न की घटनाओं में उत्पीड़ितों के पक्ष में तथा उनकी सुरक्षा के लिए डटकर खड़ा होना तथा सामान्य स्थिति बहाल करने में ताकत लगाना।

(xvi) क्षेत्रीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक विभिन्न प्रश्नों को लेकर युवाओं के सम्मेलन, संगोष्ठियाँ आदि आयोजित करना तथा विभिन्न मसलों पर प्रचार एवं संघर्ष के लिए कार्य योजना तैयार करना।

(xvii) राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय छात्र-युवा सम्मेलनों और अन्य आयोजनों में आवश्यकता एवं उपयोगितानुसार प्रतिनिधिमण्डल भेजना।

अनुच्छेद – 5

सदस्यता

धारा -1: सदस्यता की शर्तें

(i) पन्द्रह वर्ष से चालीस वर्ष के बीच की आयु का कोई भी भारतीय नौजवान (स्त्री अथवा पुरुष), चाहे वह किसी भी राष्ट्रीयता, धर्म, जाति या नस्ल का हो, चाहे उसकी मातृभाषा कुछ भी हो, यदि नौजवान भारत सभा के घोषणापत्र और संविधान को स्वीकार करता है, नियमित रूप से इसका वार्षिक सदस्यता शुल्क देता है, तथा संगठन के लक्ष्य एवं उद्देश्य की पूर्ति के लिए घोषित कार्यक्रम के अनुसार काम करता है, तो उसे संगठन की सदस्यता दी जा सकती है।

(ii) संगठन का वार्षिक सदस्यता शुल्क दस रुपये होगा।

(iii) सदस्यता सामान्यतः एक कैलेण्डर वर्ष के लिए होगी।

(iv) प्रत्येक सदस्य को ऐसे किसी संगठन या मंच का सदस्य बनने की स्वतंत्रता होगी, जिसके उद्देश्य व्यापक जनता के हित से और नौजवान भारत सभा के उद्देश्यों से टकराते न हों।

धारा – 2: सदस्यों के अधिकार

(i) प्रत्येक सदस्य को बिना किसी दबाव या शर्त के, सांगठनिक चुनावों में प्रतिनिधि चुनने या चुने जाने का अधिकार होगा।

(ii) प्रत्येक सदस्य को अपने पद या संगठन की सदस्यता से इस्तीफा देने का अधिकार होगा।

(iii) प्रत्येक सदस्य को स्‍थानीय नेतृत्व के सामने अपनी बात रखने का अधिकार होगा। उसे बीच की कमेटियों के माध्यम से अथवा सीधे केन्द्रीय नेतृत्व तक अपनी बात पहुँचाने का, अपने सुझाव देने या मतभेद रखने का अधिकार होगा।

धारा – 3: सदस्यों के कर्तव्य एवं दायित्व

(i) संगठन के घोषणापत्र के अनुसार, संगठन के उद्देश्यों एवं लक्ष्यों की पूर्ति के लिए काम करना, इनका व्यापक प्रचार-प्रसार करना, इसके कार्यक्रम को अमल में लाना तथा इसके आयोजनों एवं आन्दोलनों में हिस्सा लेना प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा।

(ii) केन्द्रीय सम्मेलन या उसके नीचे के स्तर के सम्मेलन तथा ऊपर की कमेटियों के निर्णयों को लागू करना प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा।

(iii) सम्बन्धित इकाई या कमेटी के बहुमत द्वारा पारित निर्णय को लागू करना प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा।

(iv) प्रत्येक सदस्य का यह दायित्व होगा कि वह संगठन के प्रकाशनों को पढ़े और उन्हें लोकप्रिय बनाये।

(v) प्रत्येक सदस्य का यह दायित्व होगा कि वह एक सच्चे क्रान्तिकारी कार्यकर्ता की तरह सादा, श्रमशील, अनुशासित और उच्च नैतिक आदर्शों वाला जीवन बिताये, जनता की सेवा करे ओर ऐसा कोई भी काम न करे जो संगठन के हितों और आदर्शों के विपरीत हो।

(vi) प्रत्येक सदस्य का दायित्व है कि वह ऐसी किसी राजनीतिक-सामाजिक- सांस्कृतिक गतिविधि में भाग न ले, जो संगठन के उद्देश्य एवं कार्यक्रम के विपरीत हो।

अनुच्छेद – 6

सांगठनिक नियम और संगठन का ढाँचा

धारा 1: सांगठनिक नियम

                (i) संगठन में हर स्तर पर व्यक्ति समूह के मातहत होगा।

                (ii) नीचे की कमेटी ऊपर की कमेटी के मातहत होगी।

                (iii) समूचा संगठन केन्द्रीय परिषद के मातहत होगा।

धारा 2: सांगठनिक ढाँचा

                (i) केन्द्रीय सम्मेलन

                (ii) केन्द्रीय परिषद्

                (iii) केन्द्रीय कार्यकारिणी

                (iv) राज्यों अथवा निश्चित एरिया के आधार पर संगठित इकाइयाँ और उनकी कमेटियाँ

(v) बुनियादी इकाइयाँ

अनुच्छेद – 7

संगठन की कार्य-प्रणाली और निकायों तथा पदाधिकारियों के अधिकार एवं कर्तव्य

धारा – 1: केन्द्रीय सम्मेलन

 (i) केन्द्रीय सम्मेलन संगठन का सर्वोच्च निकाय होगा।

 (ii) केन्द्रीय सम्मेलन सामान्यतः प्रत्येक तीन वर्ष में होगा।

 (iii) केन्द्रीय सम्मेलन का समय, स्थान और कार्यसूची का निर्धारण केन्द्रीय परिषद् करेगी।

 (iv) केन्द्रीय परिषद् द्वारा किसी विशेष परिस्थिति में आवश्यकता अनुभव करने पर, अथवा संगठन की किसी एक स्तर की साठ प्रतिशत या अधिक कमेटियों अथवा साठ प्रतिशत या अधिक बुनियादी इकाइयों अथवा साठ प्रतिशत सदस्यों की माँग पर, कभी भी संगठन का विशेष सम्मेलन बुलाया जा सकता है।

 (v) सामान्यतः केन्द्रीय परिषद् द्वारा केन्द्रीय सम्मेलन की अधिसूचना तीन माह पहले जारी की जायेगी। विशेष परिस्थितियों में यह अवधि 45 दिनों की हो सकती है। विशेष सम्मेलन की अधिसूचना केन्द्रीय परिषद् द्वारा कम से कम 30 दिनों पहले जारी की जायेगी।

 (vi) सम्मेलन के लिए प्रतिनिधियों का चुनाव सभी बुनियादी इकाइयों द्वारा किया जायेगा। प्रतिनिधि-चयन के समानुपातिक मानदण्ड (यानी कितने सदस्यों पर एक प्रतिनिधि चुना जाये) का निर्धारण केन्द्रीय परिषद् करेगी।

 (vii) केन्द्रीय परिषद् के सभी सदस्य सम्मेलन के पदेन प्रतिनिधि होंगे, जिन्हें मत डालने का अधिकार होगा।

 (viii) केन्द्रीय सम्मेलन की कार्यावधि सामान्यतः तीन दिनों की होगी। विशेष परिस्थिति में केन्द्रीय परिषद् इसे दो दिनों की भी कर सकती है। विशेष सम्मेलन की कार्यावधि आवश्यकतानुसार एक से तीन दिनों की हो सकती है।

 (ix) केन्द्रीय सम्मेलन विगत सम्मेलन के समय से लेकर उस समय तक की अवधि के कामों की समीक्षा करेगा, भविष्य के लिए नीतियाँ और कार्यक्रम तय करेगा, वित्तीय रिपोर्ट का परीक्षण एवं समीक्षा करेगा तथा अगले सम्मेलन तक के लिए वित्तीय नीतियाँ बनायेगा और बजट का निर्धारण करेगा, केन्द्रीय परिषद् का चुनाव करेगा तथा आवश्यकता अनुभव करने पर संविधान में संशोधन करेगा।

धारा – 2: केन्द्रीय परिषद्

                (i) केन्द्रीय परिषद् दो केन्द्रीय सम्मेलन के बीच की अवधि के दौरान संगठन का सर्वोच्च नीति-निर्धारक निकाय होगी।

                (ii) केन्द्रीय परिषद् की प्रत्येक छह माह पर बैठक हुआ करेगी।

                (iii) केन्द्रीय परिषद् के कुल सत्रह सदस्य होंगे। किसी सदस्य के निष्कासन, पदत्याग या निधन की स्थिति में इसे नये सदस्य के सहवरण (को-ऑप्शन) का अधिकार होगा।

                (iv) केन्द्रीय परिषद् की किसी भी बैठक के लिए न्यूनतम नौ सदस्यों का कोरम पूरा होना अनिवार्य होगा।

                (v) अगले चुनाव के 48 घण्टे के भीतर केन्द्रीय परिषद् द्वारा केन्द्रीय कार्यकारिणी का चुनाव अनिवार्य होगा।

धारा – 3: केन्द्रीय कार्यकारिणी

                (i) केन्द्रीय कार्यकारिणी दो केन्द्रीय सम्मेलनों के बीच संगठन का सर्वोच्च कार्यकारी निकाय होगी।

                (ii) केन्द्रीय कार्यकारिणी के कुल सात सदस्य होंगे, जिनका चुनाव केन्द्रीय परिषद् अपने सदस्यों के बीच से करेगी। केन्द्रीय परिषद् आवश्यकता समझने पर केन्द्रीय कार्यकारिणी के किसी भी सदस्य से त्यागपत्र ले सकती है।

                (iii) केन्द्रीय परिषद् की दो बैठकों के बीच, लिये गये निर्णयों पर अमल की जिम्मेदारी केन्द्रीय कार्यकारिणी की होगी। संगठनों के सभी केन्द्रीय प्रकाशनों की तथा आवश्यकतानुसार सम्पादक अथवा सम्पादक मण्डल की नियुक्ति की ज़िम्मेदारी केन्द्रीय कार्यकारिणी की होगी।

                (iv) केन्द्रीय कार्यकारिणी हर तीन माह पर नियमित रूप से अपनी बैठकें करेगी। आवश्यकता पड़ने पर एक सप्ताह की अधिसूचना पर वह अपनी विशेष बैठक बुला सकती है। आपात बैठक दो दिनों की अधिसूचना पर कभी भी बुलाई जा सकती है। बैठक के कोरम के लिए पाँच सदस्यों की उपस्थिति अनिवार्य होगी।

                (v) प्रत्येक केन्द्रीय सम्मेलन के बाद, नयी केन्द्रीय परिषद् द्वारा चुनी जाने के बाद 24 घण्टों के भीतर केन्द्रीय कार्यकारिणी अपने बीच से निम्नलिखित पदाधिकारियों का चुनाव करेगी:

                                                (v) अध्यक्ष

                                                (ब) उपाध्यक्ष

                                                (स) महासचिव

                                                (द) कोषाध्यक्ष

                (vi) आवश्यकतानुसार केन्द्रीय कार्यकारिणी विभिन्न उपकमेटियों का गठन कर सकती है तथा अपने बीच से या नीचे की कमेटी से किसी सदस्य को विशेष दायित्व सौंप सकती है। केन्द्रीय कार्यकारिणी को अपने किसी सदस्य के निधन, निष्कासन या पदत्याग की स्थिति में नये सदस्य के सहवरण का अधिकार होगा।

धारा- 4: पदाधिकारियों के उत्तरदायित्व

                (i) अध्यक्ष केन्द्रीय परिषद् और कार्यकारिणी की बैठकों की अध्यक्षता करेगा। उसकी अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष यह दायित्व निभायेगा। यदि वह भी अनुपस्थित हो तो यह दायित्व बैठक द्वारा चुना गया सदस्य निभायेगा।

                (ii) महासचिव मुख्यालय के कार्यों के लिए उत्तरदायी होगा तथा उसकी सभी सम्पत्ति और अभिलेखों का अभिरक्षक (कस्टोडियन) होगा। केन्द्रीय परिषद् और केन्द्रीय कार्यकारिणी की बैठकों के लिए वह कार्यसूची व रिपोर्टें तैयार करेगा तथा बैठकों में उन्हें प्रस्तुत करेगा। महासचिव प्रत्येक केन्द्रीय सम्मेलन में, केन्द्रीय परिषद् द्वारा पारित राजनीतिक-सांगठनिक रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा।

                (iii) अध्यक्ष और महासचिव संगठन का प्रतिनिधित्व करेंगे।

                (iv) कोषाध्यक्ष महासचिव की सहायता से केन्द्रीय कोष का संचालन करेगा, नीचे की कमेटियों के कोष एवं वित्त-सम्बन्धी नीतियों का निरीक्षण-परीक्षण करेगा तथा केन्द्रीय परिषद् व केन्द्रीय कार्यकारिणी की बैठकों में तथा केन्द्रीय सम्मेलन में वित्तीय रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा।

धारा 5: नीचे की कमेटियाँ, उनके सम्मेलन और बुनियादी इकाइयाँ

                (i) राज्यों अथवा सांगठनिक शक्ति एवं कामों की आवश्यकता के अनुसार निश्चित एरिया के आधार पर, सदस्यों या केन्द्रीय परिषद् द्वारा सुनिश्चित समानुपातिक आधार पर उनके द्वारा चुने गये प्रतिनिधियों का सम्मेलन आम तौर पर केन्द्रीय सम्मेलन के बाद हुआ करेगा।

                (ii) ये सम्मेलन अपने स्तर की कमेटी (जैसे राज्य कमेटी/एरिया कमेटी/जिला कमेटी) का चुनाव करेंगे। ये कमेटियाँ अपने स्तर से नीचे के संगठन को नेतृत्व देंगी, केन्द्रीय परिषद् के दिशा-निर्देशों पर केन्द्रीय कार्यकारिणी के नेतृत्व में, तथा अपने ऊपर की कमेटी के नेतृत्व में संगठन के कार्यक्रम और नीतियों को लागू करेंगी, अपने नीचे के निकायों के कामों की रिपोर्टों की समीक्षा करेंगी और उन्हें आवश्यक निर्देश देंगी और ऊपर की कमेटियों को अपने कामों की नियमित रिपोर्ट भेजेंगी। इन कमेटियों के सचिव के दायित्व वही होंगे जो केन्द्रीय स्तर पर अध्यक्ष और महासचिव के हैं। इनके कोषाध्यक्ष का दायित्व भी अपने स्तर पर वही होगा जो केन्द्रीय स्तर पर कोषाध्यक्ष का होगा। अधिकारों, दायित्वों और कार्यप्रणाली के मामले में नीचे की कमेटियों की केन्द्रीय कार्यकारिणी से आम सादृश्यता होगी। किसी भी तरह की संवैधानिक अड़चन पैदा होने पर या नियमों की अस्पष्टता की स्थिति में केन्द्रीय परिषद् के दिशा-निर्देश और निर्णय तथा केन्द्रीय परिषद् की अगली बैठक तक की अन्तरिम अवधि में कार्यकारिणी के दिशा-निर्देश और निर्णय अन्तिम माने जायेंगे।

                (iii) निश्चित एरिया के आधार पर गठित सबसे नीचे की कमेटी अपने कार्यक्षेत्र में कहीं भी न्यूनतम पाँच सदस्यों को लेकर संगठन की बुनियादी इकाई गठित कर सकती है। उक्त कमेटी के ठीक ऊपर की कमेटी की स्वीकृति के बाद ही उक्त बुनियादी इकाई को मान्यता प्राप्त इकाई का दर्जा हासिल हो सकेगा। बुनियादी इकाई अपने एक प्रभारी का चुनाव करेगी जो ऊपर की कमेटी को कामों की नियमित रिपोर्ट भेजेगा। कितनी संख्या और कामों के आधार पर किस बुनियादी इकाई को या कितनी बुनियादी इकाइयों को मिलाकर स्थानीय कमेटी चुनने का अधिकार दिया जाये, इसका निर्णय ठीक ऊपर की कमेटी करेगी।

                (iv) नये कार्यक्षेत्रों में प्रचार एवं संगठन की प्रारम्भिक कार्रवाइयों को अंजाम देने के लिए केन्द्रीय कार्यकारिणी आवश्यकतानुसार, सुनिश्चित एरिया के आधार पर कुछ नये और कुछ पुराने सदस्यों को लेकर तैयारी समिति का गठन कर सकती है जो तदर्थ कमेटी या तदर्थ बुनियादी इकाई के रूप में केन्द्रीय कार्यकारिणी या उसके द्वारा निर्दिष्ट कमेटी के मातहत तब तक काम करती रहेगी, जब तक कि उसके ऊपर की कमेटी या केन्द्रीय कार्यकारिणी उसे स्थायी मान्यता न दे दे।

                (v) केन्द्रीय कार्यकारिणी के नीचे हर स्तर की कमेटी और बुनियादी इकाई की बैठक के लिए 60 प्रतिशत सदस्यों की उपस्थिति अनिवार्य होगी।

अनुच्छेद – 8

सम्बद्ध सदस्यता

                (i) देश के किसी हिस्से में काम करने वाले किसी नौजवान संगठन के उद्देश्य एवं लक्ष्य यदि मूलतः और मुख्यतः नौजवान भारत सभा के उद्देश्य एवं लक्ष्य से मेल खाते हों, यदि उसके और नौजवान भारत सभा के बुनियादी कार्यक्रम के मूल बिन्दुओं में समानता हो और यदि उनके जुझारू क्रान्तिकारी चरित्र को दर्शाने वाली गतिविधियों की सन्तोषजनक जानकारी उपलब्ध हो, तो नौजवान भारत सभा की केन्द्रीय परिषद् उसे समुचित विचार-विमर्श के बाद संगठन की सम्बद्ध सदस्यता प्रदान कर सकती है, लेकिन आगामी केन्द्रीय सम्मेलन द्वारा केन्द्रीय परिषद् के इस निर्णय की पुष्टि अनिवार्य होगी।

                (ii) सम्बद्ध सदस्यता वाले नौजवान संगठन का अपना कार्यक्रम और संविधान होगा, लेकिन उसके केन्द्रीय सम्मेलन में नौजवान भारत सभा के केन्द्रीय प्रतिनिधिमण्डल की उपस्थिति और बहसों में भागीदारी सम्बद्ध सदस्यता की अनिवार्य शर्त होगी।

                (iii) नौजवान भारत सभा के केन्द्रीय सम्मेलन में सम्बद्ध संगठन के प्रतिनिधियों को उपस्थिति और विचार-विमर्श एवं बहस में भागीदारी का अधिकार होगा लेकिन मतदान का अधिकार नहीं होगा।

                (iv) दिशा एवं कार्यक्रम में कोई आधारभूत मतभेद पैदा होने या संगठन विशेष के क्रान्तिकारी चरित्र में क्षरण या विचलन पैदा होने पर उसकी सम्बद्ध सदस्यता को रद्द करने का केन्द्रीय परिषद् को पूरा अधिकार होगा।

                (v) सम्बद्ध सदस्यता की एक शर्त यह भी होगी कि उक्त संगठन अपने कामों की नियमित रिपोर्ट नौजवान भारत सभा की केन्द्रीय कार्यकारिणी को भेजे और संकीर्ण स्थानीयतावादी भटकावों से मुक्त होकर देशव्यापी नौजवान आन्दोलन के निर्माण और साझा कार्रवाइयों के प्रति एक स्वस्थ क्रान्तिकारी रुख अपनाये।

अनुच्छेद – 9

अनुशासनात्मक कार्रवाई

                (i) नौजवान भारत सभा का कोई सदस्य या कोई इकाई यदि संगठन के लक्ष्य एवं उद्देश्यों के प्रतिकूल आचरण करे, इसके कार्यक्रम पर अमल न करे या उसके प्रतिकूल आचरण करे, संगठन के संविधान या नेतृत्व के आदेशों-निर्देशों का उल्लंघन करे और अपने व्यवहार से संगठन की साख को क्षति पहुँचाये तो संगठन को उसके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई का अधिकार होगा, जिसके अन्तर्गत चेतावनी, निलम्बन, निष्कासन, अथवा इकाइयों के सन्दर्भ में, मान्यता रद्द करना शामिल होंगे।

                (ii) संविधान और कार्यक्रम के विरुद्ध आचरण करने वाले सदस्य के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई का अधिकार सम्बन्धित कमेटी या केन्द्रीय कार्यकारिणी द्वारा अधिकृत सम्बन्धित कमेटी को होगा। सम्बन्धित कमेटी को अपने हर ऐसे निर्णय की स्वीकृति के लिए अपने ठीक ऊपर की कमेटी को भेजना होगा।

                (iii) जिस इकाई के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई की गयी हो, उसे सम्बन्धित कमेटी के समक्ष अपना स्पष्टीकरण देने तथा ऊपर की कमेटी और फिर केन्द्रीय कार्यकारिणी तक अपील करने का अधिकार होगा।

                (iv) जिस सदस्य के विरुद्ध निलम्बन या निष्कासन की कार्रवाई की गयी हो, उसे सम्बन्धित कमेटी के सामने, फिर उच्चतर कमेटी के सामने और फिर केन्द्रीय कार्यकारिणी के सामने सीधे अपील करने का अधिकार होगा।

 (v) संगठन के लक्ष्य एवं हितों के विरुद्ध काम करने की स्थिति में केन्द्रीय कार्यकारिणी को नीचे की किसी कमेटी, किसी स्थानीय कमेटी या किसी बुनियादी इकाई की मान्यता रद्द कर देने का अधिकार होगा। स्थानीय कमेटी के ऊपर की कमेटी की मान्यता रद्द करने की स्थिति में केन्द्रीय कार्यकारिणी के लिए केन्द्रीय परिषद् से अपने निर्णय का अनुमोदन प्राप्त करना अनिवार्य होगा। केन्द्रीय कार्यकारिणी किसी कमेटी की मान्यता रद्द किये जाने की स्थिति में, उसके ठीक ऊपर की कमेटी या उसके भी ऊपर की कमेटी की सलाह लेकर उक्त कमेटी का पुनर्गठन कर सकती है।

अनुच्छेद – 10

संविधान-संशोधन

                (i) संविधान में परिवर्तन अथवा संशोधन का अधिकार केवल केन्द्रीय सम्मेलन को ही होगा।

                (ii) किसी भी इकाई द्वारा या उसके किसी सदस्य द्वारा संविधान में कोई संशोधन प्रस्तावित होने पर उसकी सूचना केन्द्रीय कार्यकारिणी को सम्मेलन से कम से कम तीन माह पहले देनी होगी। यदि केन्द्रीय कार्यकारिणी स्वयं कोई संशोधन प्रस्तुत करना चाहती है तो उसकी सूचना केन्द्रीय परिषद् को और अपने ठीक नीचे की कमेटी को कम से कम तीन माह पूर्व देगी।

                (iii) संविधान-संशोधन सम्बन्धी किसी भी महत्वपूर्ण प्रस्ताव का मसौदा राष्ट्रीय कार्यकारिणी द्वारा सम्मेलन से पूर्व सभी बुनियादी इकाइयों को विचारार्थ अवश्य भेजा जायेगा।

                (iv) केन्द्रीय सम्मेलन में पूर्व केन्द्रीय कार्यकारिणी के साथ ही प्रत्येक प्रतिनिधि को संविधान में कोई भी संशोधन प्रस्तावित करने का अधिकार होगा, लेकिन किसी भी संशोधन को तभी स्वीकृत माना जायेगा, जबकि सम्मेलन में उपस्थित प्रतिनिधियों के दो-तिहाई भाग द्वारा उसे पारित कर दिया जाये।

अनुच्छेद – 11

नियम-उपनियम

                (i) संविधान के फ्रेमवर्क के भीतर, समय-समय पर आवश्यक नियम-उपनियम बनाने का अधिकार केन्द्रीय कार्यकारिणी को होगा, लेकिन केन्द्रीय परिषद् की आगामी बैठक द्वारा उनका अनुमोदन आवश्यक होगा।

26-27-28 सितम्बर, 2014 को नई दिल्ली में हुए नौजवान भारत सभा के प्रथम राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान चुने गये विभिन्न निकायों के सदस्यः

नौभास के केन्द्रीय सम्मेलन में चुनी गयी केन्द्रीय परिषद्

  1. अंगद 2. योगेश 3. अपूर्व 4. श्वेता 5. अरविन्द 6. विराट 7. रमेश 8. छिन्दरपाल 9. सुशील 10. वारुणी 11. नितिन 12. नीशू 13. कुलविन्दर 14. मानव 15. प्रसेन 16. अक्षय 17. विशाल

केन्द्रीय परिषद् के द्वारा चुनी गयी केन्द्रीय कार्यकारिणी के सदस्य

  1. अपूर्व 2. छिन्दरपाल 3. अरविन्द 4. नीशू 5. श्वेता 6. अंगद 7. योगेश

केन्द्रीय कार्यकारिणी के द्वारा चुने गये संगठन के पदाधिकारी

अध्यक्षः अरविन्द

महासचिवः छिन्दरपाल

उपाध्यक्षः योगेश

कोषाध्यक्षः श्वेता

नौजवान भारत सभा का केन्द्रीय कार्यालयः-

पताः पत्ती लहणा, पक्खोवाल, लुधियाना, पिनः 141108, पंजाब।

सम्पर्क सूत्रः-

फोनः 09888401288 (महासचिव), 08010156365 (अध्यक्ष)

ईमेलः nbs.bharat@gmail.com

फ़ेसबुक पेजः www.facebook.com/naujavanbharatsabha

ब्लॉगः  www.naujavanbharatsabha.wordpress.com

भारतीय रिपब्लिक के नौजवानो, नहीं सिपाहियो, कतारबद्ध हो जाओ। आराम के साथ न खड़े रहो और न ही निरर्थक कदमताल किये जाओ। लम्बी दरिद्रता को, जो तुम्हें नाकारा कर रही है, सदा के लिए उतार फेंको। तुम्हारा बहुत ही नेक मिशन है। देश के हर कोने और हर दिशा में बिखर जाओ और भावी क्रान्ति के लिए, जिसका आना निश्चित है, लोगों को तैयार करो। फर्ज़ के बिगुल की आवाज़ सुनो। वैसे ही खाली ज़िन्दगी न गँवाओ। बढ़ो, तुम्हारी ज़िन्दगी का हर पल इस तरह के तरीके और तरतीब ढूँढ़ने में लगना चाहिए, कि कैसे अपनी पुरातन धरती की आँखों में ज्वाला जागे और एक लम्बी अँगड़ाई लेकर वह जाग उठे।

-शहीद भगतसिंह (हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन का घोषणापत्र)

 

One thought on “‘नौजवान भारत सभा’ का घोषणापत्र व संविधान

  1. sanjay

    youth be come united on one forum.

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