लाला लाजपत राय के नाम खुला ख़त

लाला लाजपत राय के नाम खुला ख़त

लाला लाजपत राय को देश के बुज़ुर्ग नेता मानते हुए भी क्रान्तिकारी उनके विचारों से असहमत थे। लाला जी और भगतसिंह व उनके साथियों के बीच बहस में जो तर्क प्रस्तुत किये गये, उसका परिचय देने के लिए ‘किरती’ पत्रिका से कुछ लेख यहाँ दिये जा रहे हैं।

नवम्बर, 1927 में लाला जी के नाम एक खुला पत्र छापा गया। जनवरी, 1928 में ‘लाला लाजपत राय और कुमारी एग्निस स्मेडली’ शीर्षक से दूसरा लेख छपा। एग्निस स्मेडली यूरोप की प्रसिद्ध लेखिका थीं, जिनकी भारत व चीन के स्वतन्त्रता-आन्दोलन में गहरी दिलचस्पी थी। लाला जी ने अपने अख़बार में मिस स्मेडली की पुस्तक से कुछ अंश छापकर उनका छपना बन्द कर दिया। उसी सन्दर्भ में यह लेख है। तीसरा लेख अगस्त, 1928 में ‘लाला लाजपत राय और नौजवान आन्दोलन’ शीर्षक से छपा। – स.

किरतीकी सम्पादकीय टिप्पणी

(जिन सज्जनों को लाला लाजपत राय से राजनीतिक जीवन में अच्छी तरह वास्ता पड़ा है, वे लाला जी की नेतागिरी की कोरी इच्छा और देश के लिए सिवाय टर्र-टर्र करने तथा और कुछ न करने को अच्छी तरह जानते हैं। विदेशों में बसे भाइयों, विशेषतः अमेरिका व कनाडा निवासी सिखों का विश्वास 1914 में ही लाला जी से उठ गया था, जब आप कनाडा-अमेरिका गये थे और आपको उन हिन्दुस्तानी भाइयों ने अपने गाढ़े पसीने की कमाई का काफ़ी रुपया हिन्दुस्तान में आज़ादी के लक्ष्य के लिए दिया था और उन भाइयों के अनुसार लाला जी ने वह रुपया अपनी मर्जी से ख़र्च किया था और बहुत-सा रुपया स्वयं ही हड़प गये थे।

लाला जी की आजकल की मनमरजी और टेढ़ी चालों से हिन्दुस्तान के लोगों व राजनीतिक क्षेत्रों में उनका विश्वास उठ गया है। हमारे पास 22 सज्जनों की ओर से छपा ‘लाला जी के नाम ख़त’ प्रकाशित होने के लिए आया है, जिसका अनुवाद प्रस्तुत है। – सम्पादक, ‘किरती’)

लाहौर, 18 सितम्बर, 1927

प्रिय लाला लाजपत राय जी,

असेम्बली चुनाव के दिनों जब जनसभाएँ की जाती थीं, तब आपने एक बार दस हज़ार हिन्दुओं की सभा के समक्ष अपने बारे में सिपाही होने की घोषणा की थी।

इसके उत्तर में कि आप एक मर चुके नेता हैं, आपने कहा था कि बेशक हिन्दुओं के हाथों से एक नेता निकल रहा है, लेकिन नेता की जगह उन्हें एक सिपाही मिल गया है। आपकी घोषणा सुनकर हमें भी बहुत प्रसन्नता हुई, क्योंकि हम भी ऐसे नेताओं से जोकि राजनीतिक समस्याओं के सम्बन्ध में तो बहुत लम्बी-चौड़ी बातें किया करते थे, तंग आये हुए थे। पिछले भले दिनों में आप तर्कशील भाषणों में यह कहते नहीं थकते थे कि “मैं या तख़्त लूँगा या तख़्ता।” लाहौर के 16 युवकों ने जो घोषणा ‘पंजाब के नौजवानों से अपील’ शीर्षक के अन्तर्गत की थी, उसके उत्तर में आपने उन पर आरोप लगाया था कि उन्होंने आप पर एक धब्बा लगाकर आपको इस राजनीतिक क्षेत्र से निकालने की कोशिश की है।

यह आरोप देखने से ही कड़वा लगता था। हम आपको फिर मैदान-ए-जंग में लाना चाहते हैं और आप में यह शतरंजी चालें खेलने की जो चाह पैदा हो गयी है उसे ख़त्म करना चाहते हैं। आपने कहा था कि ये तो बोल्शेविक हैं इसलिए अपना नेता लेनिन को मानते हैं। बोल्शेविक होना कोई गुनाह नहीं है और आज हिन्दुस्तान को लेनिन की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। क्या आपने उन नौजवानों को सी.आई.डी. की ‘मेहरबान’ नज़रों में लाने का कमीना प्रयत्न नहीं किया? आपकी इस बुरी इच्छा को फल लग गया है, इसलिए आप स्वयं को इस सफलता की बधाई दे सकते हैं। आपने लंगे मण्डी में इन नौजवानों पर मात्र इसलिए कीचड़ उछाला क्योंकि उन्होंने जनता को वास्तविक स्थितियों से परिचित कराने का साहस दिखाया। आपकी चुनाव सम्बन्धी लड़ाई का यह आरम्भिक दिन था। मदनमोहन मालवीय जी को इसका शुभारम्भ करने के लिए आमन्त्रित किया गया था। आपको संक्षिप्त-सा अध्यक्षीय भाषण करना था, लेकिन आप अपना संयम खो बैठे। पण्डित मालवीय को लम्बा भाषण करने का समय ही न मिला, जिसकी कि वह तैयारी करके आये थे। आपने दो घण्टे, बल्कि इससे भी अधिक ‘पंजाब के नौजवानों से अपील’ कर कड़कती आवाज़ में (उनका) विरोध किया। आपने इन नौजवानों को दिल खोलकर कोसा और आरोप लगाये। आपने सारे भाषण में ही तर्कशीलता को बिल्कुल दरकिनार कर दिया। हम आप पर निम्नलिखित आरोप लगाते हैं –

  1. राजनीतिक ढुलमुलपन।
  2. राष्ट्रीय शिक्षा के साथ विश्वासघात।
  3. स्वराज्य पार्टी के साथ विश्वासघात।
  4. हिन्दू-मुस्लिम-तनाव को बढ़ाना।
  5. 5. उदारवादी बन जाना।

इन आरोपों में से एक का भी आपने कोई तर्क-सम्मत खण्डन नहीं किया। जब चुनावों का जोश शान्त हो गया तब हमने बहुत चिन्तापूर्वक सुना कि आपके शरीर को फिर कोई रोग लग गया है। अफ़सोस, अस्वस्थता हमारे नेताओं का एक हिस्सा बन गयी है। वे अस्वस्थता की तभी शिकायत करने लग जाते हैं जब उन्हें मालूम होता है कि कोई न कोई हमसे गाँव की प्रगति और जन-एकता के वायदे को पूरा करने के सम्बन्ध में कुछ न कुछ कहेगा। ये वायदे ऐसे हैं जो हज़ारों बार किये तो गये, पर पूरे कभी नहीं उतरे।

चिकित्सा विज्ञान क्या यही कहता है कि बुरे स्वास्थ्य का रोगी केवल यूरोप के ही स्वास्थ्य-लाभ-केन्द्र पर ठीक होगा? रोग की रोकथाम के लिए जो राय डॉक्टर दें उसे मानने से कौन इन्कार कर सकता है? हिन्दुस्तान एक बदक़िस्मत देश है जो जंगल और दलदल से भरा है। यहाँ कोई पहाड़ी स्थान नहीं है और न ही कोई स्वास्थ्य-लाभ-केन्द्र है। इन नेताओं का कश्मीर केवल इटली के उत्तर में है। ‘मरी’, मसूरी और नैनीताल भी यूरोप में ही मिलते हैं। आप जानते हैं कि अपने देश की सेवा के लिए जीना बहुत ज़रूरी है। इसलिए जीवन बहुमूल्य है। यह भी कहा जाता है कि सिपाही के लिए कोई आराम नहीं। वह मरने के लिए जीता है, ताकि वह दुख झेलते, देश की सेवा में रहते हुए ही मरे। और दुखी देश के लिए मरने के वास्ते कमर कसकर युद्ध में मरे, उसकी, बड़ी इच्छा होती है।

लेकिन यूरोप जाने से पहले आप जब हिन्दुस्तान की ही हवाख़ोरी कर रहे थे और हिन्दुस्तान की ही ज़मीन पर चल रहे थे, तब आपके और आपके साथियों द्वारा बोये काँटे उग पड़े। आपने ‘हिन्दुओ, मारो!’ का प्रचार किया था और हिन्दू ही मारे गये!

आप जैसे ही अन्य सज्जनों ने ‘मुसलमानो, मारो!’ का प्रचार किया था। जब मुसलमानों के मारे जाने का समय आया तो उनके नेताओं ने यह कमज़ोरी दर्शायी और वह सिपाही वाला काम न कर सके। इस तरह उन्हें भी काफ़ी मार पड़ी। लेकिन हमारा सिपाही उस समय बुज़दिली दर्शाने में बहादुर निकला। जब हिन्दू मारे जाने लगे तो आपने प्रथम श्रेणी के गद्दों पर बैठकर यूरोप चले जाना ही श्रेयस्कर समझा। आपने लाहौर के हिन्दुओं की इस संकट में मदद करने से असमर्थता प्रकट की। चुनाव के दिनों में आप आमतौर पर हिन्दुओं की मुसलमानों के हाथों रक्षा करने की डींगें हाँका करते थे।

लेकिन अफ़सोस है कि यह सबकुछ आपका चुनावी सफलता तक ही सीमित था। इसके साक्ष्य में हम केवल यह कहना ही पर्याप्त समझते हैं कि आपने यूरोप से वापस लौटकर भी लाहौर के ग़रीब और दुखी हिन्दुओं की सहायता के लिए लाहौर पहुँचने तक का भी कष्ट नहीं उठाया। हमें मालूम नहीं कि आपने सीमा से पागल पठानों के निकाले हुए हिन्दुओं की रक्षा के लिए कौन-से तरीक़े इस्तेमाल किये? इसके विपरीत आप सीधे ही शिमला असेम्बली में भाग लेने और अपने साथियों पर भाषण का असर दर्शाने के लिए चले गये। संकट के समय अलग-थलग रहना आपकी बहादुरी का बड़ा हिस्सा है।

अनेक युवतियों के सिर से पति का साया उठ गया और उनकी सारी उम्र दुखों भरी और एकान्तमय रह गयी। कई कुँआरी कन्याएँ अपना सतीत्व भंग होने के कारण अपने भीतर ही भीतर आँसुओं से रो रही हैं। कई मासूमों का क़त्ल किया गया। तीस लाख ज़िन्दगियाँ भयावह नरक में से गुज़र रही हैं। गवर्नर, पंजाब तो अपनी पहाड़ी आरामगाह छोड़कर इन लोगों के बोये हुए काँटे काटने के लिए लाहौर आ जाता है, लेकिन हमारा सिपाही लाला लाजपत राय इतना बीमार है कि वह अपनी ड्यूटी पर नहीं पहुँच सकता और कह देता है कि लाहौर में गर्मी बहुत है तथा रेलवे की सीटें पहले ही बुक हो चुकी हैं। रोने दो इन विधवा हो चुकी स्त्रियों को, यतीम हो चुके बच्चों को, हमें इनसे क्या लेना! मुसीबतें अजब-अजब लोगों को एकजुट कर देती हैं। जनता के सामने जिनके बारे में हम यह आरोप लगाते थे कि ये लोग आम जनता के विश्वास योग्य नहीं हैं, तो क्या अब उन्हीं के दरवाज़े पर माँगने में हमें सुकून मिलता है? होशियार रहो कि आदमी अपने साथियों से ही पहचाना जाता है। यह कोई विस्मयकारी बात नहीं है कि आप एक उदारवादी गिने जाने लगे हैं जबकि आप जी-हजूरियों और पिछलग्गुओं के साथ बाँह में बाँह डाले साथ चल रहे हैं।

(हस्ताक्षरकर्ता)

  1. केदारनाथ सहगल: सदस्य, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी, अध्यक्ष पंजाब राजनीतिक पीड़ित कॉन्‍फ्रेंस।
  2. मेलाराम वफ़ा: सम्पादक, वन्देमातरम और नेशनल कॉलेज के भूतपूर्व प्रोफ़ेसर।
  3. प्रेम प्रकाश देवीश्वर: महासचिव, पंजाब सनातन धर्म राजनीतिक कॉन्‍फ्रेंस।
  4. अब्दुल मजीद: सचिव, पंजाब प्रेस कर्मचारी यूनियन।
  5. भगवानचरण क़ौमी, बी.ए.: सचिव, क़ौमी ग्रेजुएट यूनियन।
  6. नरेन्द्रनाथ क़ौमी, बी.ए.: पूर्व सहायक सम्पादक, ‘भीष्म’।
  7. धर्मचन्द्र क़ौमी, बी.ए.।
  8. गनपतराय क़ौमी, बी.ए.।
  9. बाबू सिंह क़ौमी, बी.ए.।
  10. जी.आर. दरवेशी: सम्पादक, ‘मेहनतकश’।
  11. कर्मचन्द: सम्पादक, ‘लाहौर’।
  12. मोहम्मद युसूफ क़ौमी, बी.ए.: सहायक सम्पादक ‘अकाली’।
  13. सीताराम मास्टर: राजनीतिक कार्यकर्ता, पंजाब।
  14. हरदयाल: हिन्दी साहित्य भवन।
  15. धर्मेन्द्र क़ौमी, बी.ए.।
  16. सुरेन्द्रनाथ।
  17. एन. कालमऊल्ला।
  18. पिण्डीदास सोढी: पूर्व सम्पादक, ‘भीष्म’, लाहौर।
  19. धर्मेन्द्र ठाकुर: पूर्व उपदेशक, हिन्दू सभा।
  20. डॉ. इन्द्रलाल कपूर।
  21. लद्दाराम: पूर्व सम्पादक, ‘स्वराज्य’, इलाहाबाद।
  22. वेदराज भल्ला क़ौमी, बी.ए.।

शहीद भगतसिंह व उनके साथियों के बाकी दस्तावेजों को यूनिकोड फॉर्मेट में आप इस लिंक से पढ़ सकते हैं। 


Bhagat-Singh-sampoorna-uplabhdha-dastavejये लेख राहुल फाउण्डेशन द्वारा प्रकाशित ‘भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़’ से लिया गया है। पुस्तक का परिचय वहीं से साभार – अपने देश और पूरी दुनिया के क्रान्तिकारी साहित्य की ऐतिहासिक विरासत को प्रस्तुत करने के क्रम में राहुल फाउण्डेशन ने भगतसिंह और उनके साथियों के महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ों को बड़े पैमाने पर जागरूक नागरिकों और प्रगतिकामी युवाओं तक पहुँचाया है और इसी सोच के तहत, अब भगतसिंह और उनके साथियों के अब तक उपलब्ध सभी दस्तावेज़ों को पहली बार एक साथ प्रकाशित किया गया है।
इक्कीसवीं शताब्दी में भगतसिंह को याद करना और उनके विचारों को जन-जन तक पहुँचाने का उपक्रम एक विस्मृत क्रान्तिकारी परम्परा का पुन:स्मरण मात्र ही नहीं है। भगतसिंह का चिन्तन परम्परा और परिवर्तन के द्वन्द्व का जीवन्त रूप है और आज, जब नयी क्रान्तिकारी शक्तियों को एक बार फिर नयी समाजवादी क्रान्ति की रणनीति और आम रणकौशल विकसित करना है तो भगतसिंह की विचार-प्रक्रिया और उसके निष्कर्षों से कुछ बहुमूल्य चीज़ें सीखने को मिलेंगी।
इन विचारों से देश की व्यापक जनता को, विशेषकर उन करोड़ों जागरूक, विद्रोही, सम्भावनासम्पन्न युवाओं को परिचित कराना आवश्यक है जिनके कन्धे पर भविष्य-निर्माण का कठिन ऐतिहासिक दायित्व है। इसी उदेश्य से भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़ों का यह संकलन प्रस्तुत है।
आयरिश क्रान्तिकारी डान ब्रीन की पुस्तक के भगतसिंह द्वारा किये गये अनुवाद और उनकी जेल नोटबुक के साथ ही, भगतसिंह और उनके साथियों और सभी 108 उपलब्ध दस्तावेज़ों को पहली बार एक साथ प्रकाशित किया गया है। इसके बावजूद ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ?’ जैसे कर्इ महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ों और जेल नोटबुक का जिस तरह आठवें-नवें दशक में पता चला, उसे देखते हुए, अभी भी कुछ सामग्री यहाँ-वहाँ पड़ी होगी, यह मानने के पर्याप्त कारण मौजूद हैं। इसीलिए इस संकलन को ‘सम्पूर्ण दस्तावेज़’ के बजाय ‘सम्पूर्ण उपलब्ध’ दस्तावेज़ नाम दिया गया है।

व्यापक जनता तक पहूँचाने के लिए राहुल फाउण्डेशन ने इस पुस्तक का मुल्य बेहद कम रखा है (250 रू.)। अगर आप ये पुस्तक खरीदना चाहते हैं तो इस लिंक पर जायें या फिर नीचे दिये गये फोन/ईमेल पर सम्‍पर्क करें।

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