क्रान्तिकारी जनजागरूकता-जनएकजुटता सप्ताह – अशफ़ाक उल्ला खाँ अमर रहें! गणेशशंकर विद्यार्थी अमर रहें!! यतीन्द्रनाथ दास अमर रहें!!!

अशफाकुल्ला खान, गणेशशंकर विद्यार्थी और यतीन्द्रनाथ दास के जन्मदिवस क्रमशः 22, 26 व 27 अक्टूबर पर पूर्वी उत्तर प्रदेश में क्रान्तिकारी जनजागरूकता-जनएकजुटता सप्ताह के अवसर पर निकाला गया पर्चा
अशफ़ाक उल्ला खाँ अमर रहें! गणेशशंकर विद्यार्थी अमर रहें!! यतीन्द्रनाथ दास अमर रहें!!!

साथियो,

22 अक्टूबर (1900 ई0) को महान क्रान्तिकारी अशफाकउल्ला खाँ का जन्मदिवस है, 26 अक्टूबर (1890 ई0) को कलम के सिपाही महान पत्रकार गणेशशंकर विद्यार्थी का जन्मदिवस है, जबकि 27 अक्टूबर (1904 ई0) को लगातार 63 दिन लम्बी भूख हड़ताल में शहीद होने वाले एच.एस.आर.ए. के महान क्रान्तिकारी यतीन्द्रनाथ दास का जन्मदिवस है। हमारे दौर की नयी पीढ़ी के बहुत सारे युवकों को ये सारे नाम अनजाने से लग सकते हैं। बहुत सारे युवक अगर इन नामों से परिचित भी होंगे, तो वो उनके प्रति श्रद्धा रखते होंगे कि इन लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ चल रही लड़ाई में हिस्सा लिया और शहादतें दीं। लेकिन उन शहीदों को आज याद करने की क्या जरुरत है, यह नहीं सोच पाते होंगे।

इसकी एक वजह है कि खास तौर पर यह है कि 1990-91 में उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों के लागू होने के बाद सूचना-तन्त्र में बहुत उन्नति होने के बावजूद हकीकत ये है कि इन सब पर मुट्ठी भर अमीरजादों, नेताओं, नौकरशाहों, उद्योगपतियों का कब्जा है। इसी वजह से जो सूचनाएं विज्ञापन, फिल्म, गाने आदि युवाओं तक पहुँचाये जा रहे हैं, वो युवाओं के दिमागों को कुन्द कर रही हैं। ‘अपना काम बनता, भाड़ में जाये जनता’, ‘खाओ-पीओ मौज करो’, ‘बाप बड़ा न भईया, सबसे बड़ा रुपैया’, ‘टशन में रहना’ आदि युवाओं में बहुत प्रचलित जुमले हैं। जिन माध्यमों से युवाओं को समाज की समस्याओं से जोड़ा जा सकता था, उन्हीं माध्यमों से युवाओं को समाज की समस्याओं के प्रति उदासीन बनाया जा रहा है। फिल्मों, गानों, विज्ञापनों में नशे व अपराध को महिमामंडित (ग्लोरीफाई) किया जा रहा है। साम्प्रदायिक मुद्दों पर चैनलों का रवैया तनाव घटाने नहीं बल्कि बढ़ाने वाला है। अंधराष्ट्रवाद, नकली देशभक्ति पर ढेर सारी ऊल-जुलूल चर्चा चैनलों पर आम बात हो गयी है। अश्लीलता व फूहड़ता की तो जैसे बाढ़ आ गयी है। तमाम लाफ्टर शो इतने घटिया, मानवद्रोही और स्त्री विरोधी हैं कि उनको देखकर उबकाई आती है। जबकि दूसरी ओर करोड़ों-करोड़ आम जनता के दुःख-तकलीफ को नकली विकास के चमचमाते परदे के पीछे छिपाया जा रहा है। आये दिन बेरोजगारी में तंग आकर नौजवान अवसाद के शिकार हो रहे हैं, आत्महत्या कर रहे हैं, लेकिन यह कोई राष्ट्रीय मुद्दा नहीं बनाया जाता। शिक्षा बिकाऊ माल में तब्दील की जा रही है, लेकिन युवकों को इन समस्याओं से बेखबर बनाया जा रहा है।

vidyarthi-yatindranath-ashfaqऐसे दौर में हम समझते हैं कि इन क्रान्तिकारियों की प्रासंगिकता बहुत ज़्यादा बढ़ गयी है। उनके विचारों को धूल व राख के नीचे से निकालकर आम जनता तक पहुँचाना बेहद ज़रूरी हो गया है। देश के युवा अगर इन क्रान्तिकारियों के विचारों को जानें व समझें और वर्तमान हालात से तुलना करें तो वो समझ सकते हैं कि इन शहीदों की विरासत से प्रेरणा लेकर एक नए क्रान्तिकारी आन्दोलन की शुरुआत करने का वक्त आ गया है। आज जनता को चुनावी पार्टियों के नेता जाति, धर्म, क्षेत्र के नाम पर आपस में लड़ा रहे हैं। जैसे ही चुनाव आता है, वैसे ही मन्दिर-मस्जिद, गाय माता, धर्मान्तरण आदि के नाम पर दंगे भड़काकर सभी पार्टियों के नेता अपनी-2 चुनावी गोटी बिछाने लगते हैं, तो रामप्रसाद बिस्मिल के अभिन्न दोस्त अशफाकउल्ला खाँ बरबस ही याद आ जाते हैं। 1927 में फाँसी पर लटकाए जाने के सिर्फ तीन दिन पहले देशवासियों के नाम लिखे खत में राजनीतिक घटनाक्रम और साम्प्रदायिक गोलबन्दी पर गहरा दुःख व्यक्त करते हुए उन्होंने ‘तबलीग’ व ‘शुद्धि’ दोनों ही आन्दोलनों की निंदा की और देशवासियों को आगाह किया कि इस तरह के बँटवारे आजादी की लड़ाई को कमजोर कर रहे हैं। उन्होंने लिखा, “सात करोड़ मुसलमानों को शुद्ध करना नामुमकिन है और इसी तरह यह सोचना भी फिजूल है कि पच्चीस करोड़ हिन्दुओं से इस्लाम कुबूल करवाया जा सकता है। मगर हाँ, यह आसान है कि हम सब गुलामी की जंजीरें अपनी गर्दन में डाले रहें।” अशफाकउल्ला खाँ जिस संगठन से जुड़े थे उसका नाम ‘हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ था, जिसमें रामप्रसाद बिस्मिल, चन्द्रशेखर आज़ाद आदि शामिल थे और एच.आर.ए. की वही विरासत आगे बढ़कर भगतसिंह तक गयी जब इसका नाम बदलकर ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ किया गया। इन क्रान्तिकारियों का संगठन शुरू से ही जाति-पाँत के भेद को नहीं मानता था, धर्मनिरपेक्षता में उनका पक्का यकीन था। ये क्रान्तिकारी एक ऐसा समाज बनाना चाहते थे जिसमें गोरों के जाने बाद भूरे साहबों को जनता को लूटने का अवसर न मिले। अब आज की स्थिति पर गौर करें तो अभी ताजा वैश्विक भूख सूचकांक के मुताबिक भारत की स्थिति नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका समेत अफ्रीका के घोर गरीब देशों से भी बदतर है। इस सूचकांक में भारत के स्थिति 2008 के 43वें पायदान से खिसककर 2016 में 97वें स्थान पर आ गयी है। पिछले डेढ़ दशकों में देश में दौलत की जितनी वृद्धि हुयी उसका 81 फीसदी हिस्सा ऊपर की 10 फीसदी आबादी के कब्जे में है। आँकड़ों के हिसाब से विश्व का हर तीसरा गरीब आदमी भारत में है। यूनीसेफ के आंकड़ों से चलें तो विश्व का हर तीसरा कुपोषित बच्चा भारत में है। देश के पांच वर्ष से कम आयु के 42 फीसदी बच्चे कम वजन के हैं। एन.एस.एस. की रिपोर्ट बताती है कि शहरों के सबसे सम्पन्न दस फीसदी लोगों की औसत संपत्ति जहाँ 14.6 करोड़ रुपये है तो वहीं सबसे गरीब दस फीसदी लोगों की संपत्ति 291 रूपये है। 30 करोड़ युवा बेरोजगार हैं।

प्रधान से लेकर सांसद-विधायक तक जनता के हितों से विश्वासघात कर चुके हैं। अमीरों के पैसों से चुनाव लड़ रहे है और उन्हीं की सेवा कर रहे हैं। जितनी चुनावी पार्टियाँ हैं, इनका न कोई उसूल है, न कोई आदर्श! कुर्सी की लड़ाई में वो एक दल से दूसरे, दूसरे से तीसरे में आते-जाते रहते हैं। यू.पी. विधानसभा चुनावों से पहले का मौजूदा परिदृश्य इसी का प्रत्यक्ष उदाहरण है। सच्चाई यही है कि कोर्ट-कचहरियाँ, पुलिस-प्रशासन, नेता-नौकरशाही सभी जनता के हितों के पूरी तरह खिलाफ खड़े हैं। ऐसे दौर में ‘प्रताप’ के संस्थापक व सम्पादक, महान पत्रकार गणेशशंकर विद्यार्थी (जो कि साम्प्रदायिक दंगों को रोकते हुए शहीद हुए थे) की ये बात युवा दिलों के लिए एक चुनौती पेश करती है। मात्र 14 वर्ष की आयु में ‘सरस्वती’ के सितम्बर 1911 के अंक में उन्होंने लिखा, ‘यदि आप आत्मोत्सर्गी बनाने के अभिलाशी हों तो आपकों अवसर की राह देखने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि आत्मोत्सर्ग करने का अवसर प्रत्येक मनुष्य के जीवन में पल-पल में आया करता है। देश-काल और कर्तव्य पर विचार करिए और स्वार्थ रहित होकर साहस को न छोड़ते हुए कर्तव्य पारायण बनने का प्रयत्न करिए।’ इसी तरह पत्रकारिता की बुरी स्थिति पर उन्होंने 1930 में लिखा कि ‘जिन लोगों ने पत्रकार कला को अपना काम बना रखा है, उनमें से बहुत कम ऐसे लोग हैं जो अपनी चिंताओं को इस बात पर विचार करने का कष्ट उठाने का अवसर देते हैं कि हमें सच्चाई की लाज रखनी चाहिए। केवल अपनी मक्खन-रोटी के लिए दिन भर में कई रंग बदलना ठीक नहीं है। देश में भी दुर्भाग्य से समाचारपत्रों और पत्रकारों के लिए यही मार्ग बनता जा रहा है।’

यतीन्द्रनाथ दास की कुर्बानी को भला कौन भुला सकता है? जेल में अंग्रेजों द्वारा खराब व्यवहार के खिलाफ भगतसिंह द्वारा शुरू की गयी भूख-हड़ताल में वो शामिल हुए तो मौत भी उन्हें हरा न पाई और 63वें दिन वे शहीद हो गए। जब उनकी शवयात्रा निकली तो सुभाष चन्द्र बोस खुद उनको कन्धा देने आये थे व लगभग 6 लाख लोग उनकी शवयात्रा में शामिल हुए थे।

साथियो, इन शहीदों को याद करना हमारे लिए आज मौजूदा लूट व अन्याय पर टिकी व्यवस्था के खिलाफ एक नए क्रान्तिकारी आन्दोलन को शुरू करने का ऐलान है। युवाओं को तमाम भ्रष्ट चुनावी पार्टियों व धार्मिक कट्टरपन्थी संगठनों का झन्डा धूल में फेंक देना चाहिए और ‘समान शिक्षा-सबको रोजगार’ का झन्डा अपने हाथ में उठा लेना चाहिए। पानी, बिजली, स्वास्थ्य आदि के मुद्दे पर आम जनता को गोलबन्द करना चाहिए। बेहतर विचारों, बेहतर आदर्शों को खुद आत्मसात करना चाहिए व देश के एक-एक इंसान तक पहुँचाने की मुहिम में जुट जाना चाहिए। अपने शहीदों के समता व न्याय पर टिके समाज के सपने को पूरा करने के लिए मैदान में उतर जाने के लिए यह परचा तमाम युवाओं को एक आमंत्रण है। क्या आप तैयार हैं?

“राष्ट्र महलों में नहीं रहता, प्रकृत राष्ट्र के निवास-स्थल वे अगणित झोपड़े हैं जो गाँवों और पुरवों में फैले हुए आकाश के दैदीप्यमान सूर्य और शीतल चन्द्र और तारागण से प्रकृति का सन्देश लेते हैं और इसलिए राष्ट्र का मंगल और उसकी जड़ मजबूत उस समय तक नहीं हो सकती जब तक इन अगणित लहलहाते पौधों की जड़ों में जीवन का मजबूती का जल नहीं सींचा जाता। भारतीय राष्ट्र के निर्माण के लिए उसके गाँवों और पुरवों में जीवन की ज्योति की आवश्यकता है।”   -गणेशशंकर विद्यार्थी

‘‘अगर हिन्दुस्तान आज़ाद होता है और हमारे अपने देश वासी गोरे हाकिमों से सत्ता की बागडोर अपने हाथ में लेते हैं, और तब भी अगर अमीर और गरीब के बीच, जमींदार व असामी के बीच गैर बराबरी बनी रहेगी, तो मै ख़ुदा से यही मनाऊँगा कि वह तब तक मुझे ऐसी आज़ादी न दे जब तक उसकी कायनात में बराबरी न कायम हो जाय। अगर मुझे इन विचारों के लिए कम्युनिस्ट कहा जाता है तो मुझे कोई फिक्र नहीं।’’     -अशफ़ाक उल्ला खाँ

दिशा छात्र संगठन                नौजवान भारत सभा

सम्पर्क-8858288593, 9506859878 facebook.com/dishachhatrasangathan, naubhas.in

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