भगतसिंह – रूस के युगान्तकारी नाशवादी (निहिलिस्ट)

रूस के युगान्तकारी नाशवादी (निहिलिस्ट)

रूस में एक बहुत बड़े नाशवादी हुए हैं इवान तुर्गनेव। उन्होंने 1862 में एक उपन्यास लिखा ‘पिता और पुत्र’। इस उपन्यास के प्रकाशन पर बहुत शोर-शराबा हुआ, क्योंकि उसमें नवयुवकों के आधुनिक विचारों का चित्रण किया गया था। पहले-पहल तुर्गनेव ने ही नाशवाद शब्द इस्तेमाल किया था। नाशवाद का अर्थ है कुछ भी न मानने वाला (निहिल – कुछ भी नहीं); शाब्दिक अर्थ है – जो कुछ भी न माने। लेकिन वास्तव में ये लोग जनता के पुराने रस्मो-रिवाज़ और कुरीतियों के विरोधी थे। ये लोग देश की मानसिक ग़ुलामी से थक गये थे, इसलिए उन्होंने इसके विरुद्ध विद्रोह किया। इन्होंने सिर्फ़ कहा ही नहीं बल्कि व्यवहार में कर भी दिखाया। तुर्गनेव कहते हैं कि मेरे उपन्यास का नायक कोई काल्पनिक जीव नहीं है, वरन वह वास्तव में ही ऐसे विचारों का था और ऐसे विचारों का प्रचार साधारणतया होने लगा था। वे कहते हैं कि एक दिन धूप सेंकते हुए मुझे इस उपन्यास का विचार सूझा। और उसको थोड़ा-सा विस्तार देकर किताब लिख दी। उसका नायक बजारोव है। वह नास्तिक-सा है। पुरानी बातों का बहुत विरोधी है। उसे मुँह-जुबानी बहुत लम्बी-चौड़ी जी-हजूरी नहीं आती। बहुत मुँहफट है। और जो कहता है वह करता है। वह हर बात मुँह पर तुरन्त और स्पष्ट कह देता है। इसलिए कई बार वह बड़ा अक्खड़-सा लगता है। वह कविता का विरोधी है। संगीत तक को पसन्द नहीं करता। लेकिन वह स्वतन्त्रता-प्रेमी है। आम लोगों की स्वतन्त्रता का बड़ा समर्थक है। वह जो उन दिनों में इन्सानी फ़ितरत बनी हुई थी, उसके विरुद्ध लड़ने का यत्न करता है।

असली नाशवादी इस तस्वीर से थोड़ा भिन्न है, अर्थात उनमें थोड़ा-सा अन्तर है, क्योंकि उपन्यास का नायक थोड़ी-सी वास्तविकता के साथ काल्पनिकता से बनाया गया है। वास्तविक नाशवादी का चित्र कुछ और तरह का बनता है।

“The Nihilism of 1861 – a philosophical system especially dealing with what Mr. Herbert Spencer would call religious, governmental and social fetishism.

रूसी युगान्तकारी प्रिन्स क्रोपोटकिन ने 1861 में ऊपर लिखे शब्दों में नाशवादिता का ज़िक्र किया है, जिसका अर्थ है कि नाशवाद उस समय केवल एक दर्शन था जोकि धार्मिक अन्धविश्वास, सामाजिक अन्याय, संकीर्णता और सरकार की अन्धेरगर्दी के सन्दर्भ में था और इन चीज़ों के लिए जो अन्धविश्वास पैदा हो गया था उसके विरुद्ध प्रचार करता था। असल में उस समय की स्थितियों से तंग आकर वे नवयुवक मैदान में कूद पड़े थे। उनका कहना था कि हमें पिछली सभी बातों का पूरी तरह नाश कर देना है। आगे क्या होना चाहिए या क्या होगा, इसका ठीक-ठीक उत्तर न देते हुए भी वे विश्वास करते थे कि एक बड़ी सुन्दर दुनिया का निर्माण करेंगे। ‘Nihilism was destructive because it wanted a wholesale destruction but with a pleasure of building up.’ अर्थात नाशवाद विनाशकारी या ध्वंसात्मक विचार थे, क्योंकि वे पिछली या पुरानी बातों के विरोधी और उनका नाश चाहने वाले थे। परन्तु फिर भी उस विनाश के बाद बड़ी सुन्दर चीज़ों के निर्माण होने की आशा थी।

धीरे-धीरे इन बातों का प्रचार बढ़ता गया और आम नवयुवकों में भी यह विचार घर करने लगे। वे चाहते थे – ‘To liberate the people from the chains of tradition and autocracy of the Czar.’ अर्थात जनता को पुरानी चली आ रही रस्मों और ज़ारशाही से मुक्त कराया जाये।

उन दिनों उनका कार्यक्रम इन बातों का प्रचार ही था। स्थितियाँ परिवर्तित हो गयीं। उन्हीं दिनों अभी ग़ुलाम आज़ाद किये ही गये थे लेकिन उनमें से अधिकांश को ज़मीनें नहीं दी गयी थीं जिस पर कि वे मेहनत करके कुछ लाभ उठा सकते या कम से कम भुखमरी से बच सकते।

जो थोड़ी-बहुत ज़मीन उन्हें मिली थी उसी पर टैक्स इतना अधिक लग गया कि लोग भूखों मरने लगे और 1867 में बहुत भयानक अकाल पड़ा। उस समय सरकार का इन्तज़ाम अत्यधिक बुरा था। इतना दमन होता था कि जनता तंग आ गयी थी। सरकारी ज़ुल्म से तंग आकर बड़े-बड़े सरकारी अधिकारी युगान्तकारी बन गये। ऐसिंस्की और किआटकोवस्की, जिन्हें 1880 में फाँसी दी गयी थी, पहले सरकारी कर्मचारी थे। इस तरह दूसरे अनेक जाने-माने अधिकारी, यहाँ तक कि न्यायाधीश भी तंग आकर युगान्तकारी बन गये।

इधर इन पर भी ज़ुल्म की हद हो गयी। लड़कों में अच्छी-अच्छी बातों का प्रचार नहीं होने दिया जाता था। कुछ ऐसी सभाएँ बनी हुई थीं जोकि सभी अच्छी-अच्छी किताबें प्रकाशकों से लेकर मुफ्त बाँट देते या केवल लागत मूल्य पर बेच देते। ये सभी किताबें सरकारी सदस्य से स्वीकृत होती थीं। लेकिन जब सरकार ने देखा कि यह तो प्रचार के लिए इस्तेमाल होती हैं तो उन्होंने उन किताबों के प्रकाशक और वितरक को तबाह करने का निश्चय किया और उन पर हर तरह के ज़ुल्म करने शुरू कर दिये। 1861 से 1870 तक हरसम्भव और जायज़ ढंग से जनता की स्थिति सुधारने और सरकार को सही रास्ते पर लाने की कोशिश की गयी, लेकिन कुछ भी प्रभाव न पड़ा।

ऐसी स्थिति में काफ़ी व्यक्ति तो हाथ पर हाथ धरे किसी ऐसे समय की प्रतीक्षा में बैठ गये कि स्वयं ही हालात सुधरेंगे। कैसे सुधरेंगे? यह कोई नहीं जानता था। वे ईश्वर का ही भरोसा रखकर बैठ गये। लेकिन नवयुवकों के दिलों में आग भड़क उठी। उनके दिलों में ईश्वर का भरोसा शेष नहीं बचा था। चुपचाप, बिना कुछ किये ख़ाली बैठना उन्हें मुश्किल हो गया।

प्रिन्स क्रोपोटकिन अपने एक लेख में लिखते हैं –

‘There are periods when some generations are penetrated with the noblest feelings f altruism and self sacrifice, when life becomes utterly impossible – for the man or woman who feels that he is not doing duty; and so it was with the youth in Russia.’

अर्थात कभी-कभी ऐसा वक़्त आ जाता है जब आम जनता में जनसेवा का भाव ज़ोर पकड़ता है, तब उन नर-नारियों के लिए जीना दूभर हो जाता है जो यह समझने लगते हैं कि वे अपना कर्त्तव्य पूरा नहीं कर रहे हैं। यह स्थिति उस समय रूस की हो गयी थी। वृद्ध व्यक्ति तो हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे लेकिन नवयुवकों के दिलों में आग भड़क उठी।

1871 में बहुत-से युवक-युवतियाँ पश्चिमी यूरोप में भाग गये थे। वहाँ वे पढ़ते थे। ज़्यादातर स्विट्ज़रलैण्ड में थे। उन्हें स्वदेश आने की इजाज़त मिल गयी थी। वे लोग नये साम्यवाद या एकसुरता के विचार लेकर आये थे। उन्होंने आते ही जो प्रचार शुरू किया, तो ज़ार ने तुरन्त सबको पकड़ लिया और वे अन्धाधुन्ध साइबेरिया में जलावतन कर दिये गये। काम ने ख़ुफ़िया रूप धारण कर लिया।

उस समय तीन पार्टियाँ काम कर रही थीं। इनके नेता चेर्नीशेवस्की, हशुटिन (हर्जन – स.) और नेचाइफ थे। पहले आवाज़ सुनायी देती थी कि जनता के साथ होना चाहिए अर्थात जनता से सहानुभूति करनी चाहिए और उन्हें ऊपर उठाने का यत्न करना चाहिए। लेकिन अब नयी आवाज़ उठी कि स्वयं ही जनता बन जाओ। अर्थात जनता के साथ शामिल हो जाओ। इस आवाज़ के उठते ही बलिदान के ऐसे-ऐसे उदाहरण मिलते हैं कि अभी तक दुनिया के तख़्ते से उनकी कोई मिसाल नहीं मिलेगी।

लेकिन पहले यह बता देना आवश्यक है कि यह आवाज़ आख़िर क्यों उठी? प्रिन्स क्रोपोटकिन ने लिखा है – ‘Until of late – however the peasant has always regarded the man who wears broad cloth and neither ploughs hews nor hammers nor digs side by side with him as an enemy. We wanted faith and love from him; and to obtain it was necessary to live their life.’

अर्थात उस समय तक रूसी किसान किसी भी ऐसे आदमी को, जिसने ढीले-ढाले कपड़े पहने हों और जिन्हें न तो हल चलाना आता हो और न कुल्हाड़ा, जिनके हाथों में हथौड़ा चलाने से कभी छाले न पड़े हों, और जिसने कभी फ़सल उगाई व काटी न हो, उसे अपना दुश्मन समझते थे। लेकिन हमें उनकी सहानुभूति और विश्वास चाहिए था। इसलिए उनके पास रहने की ज़रूरत थी। उनके साथ श्रम करने और रहने की आवश्यकता थी।

आहा! आज हम हिन्दुस्तान को स्वतन्त्र कराने की बहुत लम्बी-चौड़ी बातें करते हैं, लेकिन कितने आदमी इस तरह क़ुर्बानी करने को तैयार हैं? कितने अपने शहरों को छोड़कर गाँवों में किसानों की तरह गन्दे-गन्दे रहने के लिए तैयार होंगे? वहाँ तो अजीब स्थिति बन गयी थी।

Youngmen left their classrooms, their regiments and their desks, learned the smith’s trade or the cashier’s; or the ploughman’s and went to work among the villages. Highborn and wealthy ladies also took themselves to the factories, worked fifteen and sixteen hours a day at the machine, slept in doghols with peasants, went barefoot as our working women go, bringing water from the river for the house.

युवक अपने कॉलेज, अपने स्कूल, अपनी प्लाटून और कुर्सियों को छोड़ आये और किसान-लोहार के काम सीखकर गाँवों की ओर चल पड़े। यह कितना बड़ा त्याग है। बड़े-बड़े समृद्ध परिवारों की पली बहुत नाज़ुक युवतियाँ कारख़ानों में मज़दूरी करने के लिए चल पड़ीं। अन्य मज़दूरों की भाँति अँधेरी कोठरियों में सोतीं, सोलह-सोलह घण्टे मशीन पर काम करतीं, नंगे पैर नदी से घर के लिए पानी लातीं।

बस, एक ही लगन। एक ही धुन में मस्त। उन ग़रीब मज़दूरों को उनके बुरे हालात का ज्ञान कराना और इसका इलाज बताना है। यह कितना बड़ा बलिदान है। युवतियों ने तो हद दर्जे का काम किया। रूसी युगान्तकारियों की दादी अम्मा कहलाने वाली श्रीमती कैथराईन एक समृद्ध और सुन्दर महिला थीं। वह भी उनमें शामिल हो गयीं। पहले अपनी ख़ूबसूरती को तेज़ाब डालकर जला डाला और दागदार चेहरा बनाकर बदसूरत बन गयीं ताकि बाह्य सौन्दर्य जनता में काम के दौरान कोई रुकावट न बने। ओह! आज ऐसा बलिदान कर सकने का साहस करने वाले कितने व्यक्ति हिन्दुस्तान में मौजूद हैं। रूस में नौजवान युवक-युवतियाँ घरों से भाग जाते और इन्हीं कार्यों में ज़िन्दगी बिता देते थे। लेकिन आज हिन्दुस्तान में कितने नौजवान हैं जो देश को स्वतन्त्र कराने के उद्देश्य से पागल हुए फिर रहे हों? चारों ओर काफ़ी समझदार आदमी नज़र आते हैं, लेकिन प्रत्येक को अपना जीवन सुखपूर्वक गुज़ारने की चिन्ता हो रही है। तब हम अपने हालात, देश के हालात सुधारने की क्या उम्मीद रखें? पिछली सदी का अन्तिम भाग रूसी नौजवानों ने इस तरह प्रचार कार्य में बिताया। युवतियों को घरों से निकाल लाने के अनेक बहुत सुन्दर क़िस्से मौजूद हैं।

सोनिया एक पादरी की लड़की थी। उसके स्कूल में युगान्तकारी महिलाएँ पढ़ाने वालों में अभी शामिल हुई थीं। उनके उपदेश सुनकर सोनिया के दिल में भी देशसेवा के भाव ने ज़ोर पकड़ा। एक दिन वह घर से भाग गयी। लेकिन कुछ दिनों बाद पिता ने आकर पकड़ लिया। तब पादरी के घर से उसे मुक्ति दिलाने का बन्दोबस्त किया गया। एक नौजवान उसका प्रेमी बनकर उसके घर गया और उसके पिता को मनाकर उससे शादी कर ली। कहानी बहुत रोचक है और ‘रूस के नायक और नायिकाएँ’ किताब में प्रकाशित हैं। कभी अवसर मिला तो वह कहानी भी पाठकों के समक्ष रखेंगे। ख़ैर, फ़िलहाल पाठक संक्षेप में ही समझ लें कि किस प्रकार रूस में कार्य चल रहे थे।

पहले तो काम खुले रूप में आरम्भ किया गया, लेकिन फिर सरकार ने ज़ुल्म ढाकर धर-पकड़ करके हज़ारों की संख्या में लोग साइबेरिया में भेज दिये। बिना वारण्ट हज़ारों व्यक्तियों को पकड़ लिया। चार-पाँच बरस तक वे अँधेरी कोठरियों में बन्द रखे गये। बाद में लगभग सौ व्यक्तियों पर मुक़दमा चलाया गया जिनमें से कुछ को सज़ा दी गयी। हज़ारों मुक़दमों में से एक ‘ट्रायल ऑफ़ दि हण्ड्रेड नाइण्टी थ्री’ नाम से प्रसिद्ध है। संक्षेप में, सरकारी संख्या के अनुसार हज़ारों लोग पकड़े गये और उन्हें जेलों की तंग अँधेरी सीलनभरी कोठरियों में चार-चार पाँच-पाँच साल बन्द करके रखा गया। इनमें से तीन सौ व्यक्तियों को तो बहुत दिनों तक बन्दी रखा गया। इसी प्रकार अन्य अनेकों ने भी मरने की कोशिश की। 193 पर मुक़दमा चला। अत्यन्त अन्यायकारी न्यायालय ने सामान्य सबूत के आधार पर ही दस-दस वर्षों की सज़ा सिर्फ़ इस बात के लिए दी कि वे प्रचारक थे। उनमें से नब्बे को बरी कर दिया और शेष को सात से दस साल तक की सख़्त सज़ाएँ हुईं तथा बाद में उम्रभर के लिए साइबेरिया की जलावतनी। एक अन्य मुक़दमे में एक महिला को नौ-दस वर्ष की सख़्त सज़ा मात्र इस आरोप में हुई कि उसने एक मज़दूर को साम्यवादी विचारधारा का एक परचा दिया था।

इस तरह ज़ुल्म होता देखकर काम पहले से भी अधिक गुप्त और सोच- समझकर होने लगा। साथ ही प्रतिशोध की भावना भी सक्रिय हो उठी। साधारणतया एक-आध कमीना ख़ुफ़िया अधिकारी जिसे भी चाहता, पकड़ता और जलावतन कर देता। इससे उसे तो इनाम मिल जाता लेकिन नौजवानों का जीवन ख़तरे में पड़ जाता।

कहा तो यह जाता है कि 16 अप्रैल, 1899 में जिस काराकोज्फ ने ज़ार पर गोली चलायी थी, वह भी नाशवादियों का ही काम था। और एक पोलिश नौजवान बेरेजोवस्की भी जिसने अगले वर्ष ज़ार पर पेरिस में गोली चलायी थी, उस पार्टी का सदस्य था। लेकिन वर्तमान स्थिति पर क्रोपोटकिन ने लिखा है कि हमारे शुरू-शुरू के काम में ज़ार जितना सुरक्षित था उतना कभी नहीं रहा होगा। यह तो हारकर अन्त में शक्ति के इस्तेमाल के क्षेत्र में उतरे। उन्होंने पहले हमेशा ज़ार को बचाने की कोशिशें कीं। एक बार जब कोई नौजवान ज़ार को मारने सेण्ट पीर्ट्सबर्ग पहुँचा तो इस पार्टी वालों ने इसे इस काम से रोक दिया।

लेकिन बाद में तो काम ज़ोरों से चल पड़ा। 1879 में मुलज़िम बन्दियों में से एक को, जिन पर अभी मुक़दमा चलना था, बेंत लगाये गये क्योंकि उसने उठकर पुलिस अधिकारी को सलाम नहीं किया था और शेष बन्दियों को जिन्होंने उसकी हिमायत की, जनरल ट्रेपोफ के आदेशानुसार बुरी तरह पीटा गया। इस पर एक बहादुर युवती वीरा जसुलिच ने जनरल ट्रेसोफ पर गोली चला दी। वह मरा तो नहीं लेकिन युवती पर मुक़दमा चला। वह बरी कर दी गयी। पुलिस ने फिर उसे पकड़ना चाहा लेकिन जनता उसे छीनकर ले गयी।

जब से रूसी क्रान्तिकारियों ने देखा कि उनकी कोई मदद नहीं करता, उनकी रक्षा के लिए कोई क़ानून नहीं है, तब से उन्होंने स्वयं ही अपनी रक्षा करनी आरम्भ कर दी। पुलिस सुबह-सुबह लोगों के घर घेर लेती, महिलाओं तक के कपड़े उतारकर सिपाही उनकी तलाशी लेते। लोग बहुत तंग आ गये। कुछ यह भी कहने लगे कि अन्य देशों में तो ऐसा नहीं हो सकता। हम भी यह नहीं होने देंगे। सबसे पहले ओडेसा में कोवल्सकी ने यह काम किया। उसने पुलिस के साथ टक्कर ली। दमन और भी बढ़ा। लेकिन फिर क्या था, प्रतिरोध का काम चल पड़ा। सुरक्षा के लिए शक्ति का इस्तेमाल उचित समझा जाने लगा। पहले पाँच, फिर तीन ख़ुफ़िया अधिकारी क़त्ल किये गये, जिनके बदले में सत्रह नौजवानों को फाँसी दी गयी। फिर तो बस प्रतिशोध लेने, फाँसियाँ देने का यही क्रम चल पड़ा।

1879 में तो पुनः नाशवाद का अर्थ बम और पिस्तौल चलाना ही हो गया। तंग आकर ज़ार ने भी उन्हें ठिकाने लगाने का निर्णय कर लिया।

बस फिर क्या था, सभी इस काम में लग गये। 14 अप्रैल, 1879 को शोलोवियूफ ने ज़ार पर गोली चला दी, लेकिन ज़ार बच गया। उसी बरस ज़ार के विण्टरप्लेस अर्थात शरद महल को डाइनामाइट से उड़ा दिया गया, लेकिन तब भी ज़ार बच गया। अगले बरस जब ज़ार पीर्ट्सबर्ग से मास्को जा रहा था, उसकी गाड़ी उड़ा दी गयी। गाड़ी के कई डिब्बे उड़ गये, लेकिन ज़ार तब भी बच गया। 13 मार्च, 1881 को ज़ार अपनी विशेष पल्टन और घोड़ों की परेड देखकर वापस आ रहा था कि उस पर एक बम फेंका गया। बम से गाड़ी टूट गयी और ज़ार उतरकर नौकर के पास उसे देखने के लिए झुककर कहने लगा, “ईश्वर की कृपा से मैं बच गया।” तुरन्त एक अन्य नौजवान क्रान्तिकारी ने आगे बढ़कर दूसरा बम फेंकते हुए कहा, “ज़ार, इतनी जल्दी ख़ुदा का शुक्रिया अदा न कर।” तभी बम फटा और ज़ार मर गया। हज़ारों व्यक्तियों की गिरफ्तारियाँ हुईं। अनेकों फाँसी चढ़ गये। पाँच व्यक्तियों को विशेष रूप से जनता के समक्ष फाँसी दी गयी। इनमें सबसे अधिक प्रसिद्ध एक महिला थी, जिसका नाम सोफिया प्रोवस्किया था।

उस समय पार्टी दब गयी। फिर कई अन्य पार्टियाँ उठीं। लेकिन नाशवादी पार्टी का इतिहास इतना-सा है। नाशवादियों को लोगों ने ग़लत आँका और अराजकतावादियों की तरह इन्हें भी बदनाम किया गया। एक अंग्रेज़ी समाचारपत्र ने एक कार्टून बनाया जिसमें तबाह हुई चीज़ों में निहिलिस्ट बम और डाइनामाइट लिये खड़े थे। एक पूछता है, फ्क्यों बन्धु, कुछ बाक़ी तो नहीं है?” दूसरा कहता है, “दुनिया का गोला ही बाक़ी है।” पहला कहता है, “लगा देता हूँ डाइनामाइट तुम्हारे उसमें भी!” यह बड़ा ग़लत बयान था। आस्कर वाइल्ड ने एक नाटक ‘वीरा दि निहिलिस्ट’ लिखा था। उसमें नाशवादियों का अच्छा चित्र बनाने का प्रयास किया गया। लेकिन उसमें बहुत अशुद्धियाँ हैं। एक अन्य किताब ‘कैरियर ऑफ़ ए निहिलिस्ट’ भी प्रकाशित हुई थी। यह पठनीय है। इसमें नाशवादियों के बारे में ठीक लिखा है। हिन्दी में ‘बोल्शेविक के कोम’ तथा ‘निहिलिस्ट-रहस्य’ प्रकाशित हो चुके हैं। पहला काकोरी के शहीद श्री रामप्रसाद बिस्मिल का लिखा है। उसमें उन्होंने निहिलिस्टों की बहुत दर्दनाक तस्वीर खींची है। मगर उन्हें मात्र विनाश चाहने वाले ही दिखाया गया है, जोकि ठीक नहीं है। वे अच्छे जनसेवक थे। वे बहुत बलिदानी और जनता से प्यार करने वाले थे। वे धन्य थे।

अन्यायी व्यवस्था

वे लोग जो महल बनाते और झोंपड़ियों में रहते हैं, वे लोग जो सुन्दर-सुन्दर आरामदायक चीज़ें बनाते हैं, स्वयं पुरानी और गन्दी चटाइयों पर सोते हैं।

ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए? ऐसी स्थितियाँ यदि भूतकाल में रही हैं तो भविष्य में क्यों नहीं बदलाव आना चाहिए? यदि हम चाहते हैं कि देश की जनता की हालत आज से अच्छी हो तो ये स्थितियाँ बदलनी होंगी। हमें परिवर्तनकारी होना होगा।

अगस्त, 1928


शहीद भगतसिंह व उनके साथियों के बाकी दस्तावेजों को यूनिकोड फॉर्मेट में आप इस लिंक से पढ़ सकते हैं। 


Bhagat-Singh-sampoorna-uplabhdha-dastavejये लेख राहुल फाउण्डेशन द्वारा प्रकाशित ‘भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़’ से लिया गया है। पुस्तक का परिचय वहीं से साभार – अपने देश और पूरी दुनिया के क्रान्तिकारी साहित्य की ऐतिहासिक विरासत को प्रस्तुत करने के क्रम में राहुल फाउण्डेशन ने भगतसिंह और उनके साथियों के महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ों को बड़े पैमाने पर जागरूक नागरिकों और प्रगतिकामी युवाओं तक पहुँचाया है और इसी सोच के तहत, अब भगतसिंह और उनके साथियों के अब तक उपलब्ध सभी दस्तावेज़ों को पहली बार एक साथ प्रकाशित किया गया है।
इक्कीसवीं शताब्दी में भगतसिंह को याद करना और उनके विचारों को जन-जन तक पहुँचाने का उपक्रम एक विस्मृत क्रान्तिकारी परम्परा का पुन:स्मरण मात्र ही नहीं है। भगतसिंह का चिन्तन परम्परा और परिवर्तन के द्वन्द्व का जीवन्त रूप है और आज, जब नयी क्रान्तिकारी शक्तियों को एक बार फिर नयी समाजवादी क्रान्ति की रणनीति और आम रणकौशल विकसित करना है तो भगतसिंह की विचार-प्रक्रिया और उसके निष्कर्षों से कुछ बहुमूल्य चीज़ें सीखने को मिलेंगी।
इन विचारों से देश की व्यापक जनता को, विशेषकर उन करोड़ों जागरूक, विद्रोही, सम्भावनासम्पन्न युवाओं को परिचित कराना आवश्यक है जिनके कन्धे पर भविष्य-निर्माण का कठिन ऐतिहासिक दायित्व है। इसी उदेश्य से भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़ों का यह संकलन प्रस्तुत है।
आयरिश क्रान्तिकारी डान ब्रीन की पुस्तक के भगतसिंह द्वारा किये गये अनुवाद और उनकी जेल नोटबुक के साथ ही, भगतसिंह और उनके साथियों और सभी 108 उपलब्ध दस्तावेज़ों को पहली बार एक साथ प्रकाशित किया गया है। इसके बावजूद ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ?’ जैसे कर्इ महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ों और जेल नोटबुक का जिस तरह आठवें-नवें दशक में पता चला, उसे देखते हुए, अभी भी कुछ सामग्री यहाँ-वहाँ पड़ी होगी, यह मानने के पर्याप्त कारण मौजूद हैं। इसीलिए इस संकलन को ‘सम्पूर्ण दस्तावेज़’ के बजाय ‘सम्पूर्ण उपलब्ध’ दस्तावेज़ नाम दिया गया है।

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