भगतसिह – शहीद ख़ुशीराम!

शहीद ख़ुशीराम!

अक्टूबर, 1928 के ‘किरती’ में प्रकाशित। – स.

1919 का वर्ष भी हिन्दुस्तान के इतिहास में हमेशा ही याद रहेगा। ताज़ी-ताज़ी लड़ाई ख़त्म हुई थी। हिन्दुस्तानियों और विशेषतः पंजाबियों ने प्राणों पर खेलकर अंग्रेज़ों को जीत हासिल करवायी थी, लेकिन अहंकारी अंग्रेज़ों ने अहसान का ख़ूब बदला चुकाया। रोल्ट एक्ट पास कर दिया। तूफ़ान मच गया। पंजाब में तो ख़ासतौर पर जोश बढ़ गया। पंजाब में तो अभी पिछले युद्ध की याद ताज़ा थी, उन्हें रोल्ट एक्ट देखकर हद दर्जे की हैरानी हुई। हड़तालें, जुलूस व मीटिगें होने लगीं। जोश बहुत बढ़ा। नौबत जलियाँवाला और मार्शल लॉ तक की आ गयी।

लोग डर गये। कौन कहता था कि निहत्थों पर भी गोली चलायी जा सकती है। आम लोगों ने गिरते-पड़ते पीठ में ही गोलियाँ खायीं। लेकिन उनमें भी श्री ख़ुशीराम जी शहीद ने छाती पर गोलियाँ खा-खाकर क़दम आगे ही बढ़ाया और बहादुरी की लाजवाब मिसाल क़ायम कर दी।

आपका जन्म 27 सावन, सवंत 1957 में गाँव सैदपुर, ज़िला झेलम में लाला भगवानदास के घर हुआ था। आपकी जाति अरोड़ा थी। पैदा होने पर आपकी जन्म-पत्री बनायी गयी और बताया गया कि यह बालक बड़ा बहादुर और तगड़ा होगा और इसका नाम भी ख़ूब प्रसिद्ध होगा। इसलिए उस समय आपका नाम श्री भीमसेन रखा गया, लेकिन बाद में आप श्री ख़ुशीराम के नाम से ही प्रसिद्ध हुए। आप अभी बहुत छोटे ही थे, जब आपके पिता का देहान्त हो गया। आपका ख़ानदान बहुत ग़रीब था और आपका पालन.पोषण लाहौर नवाँकोट अनाथालय में हुआ था। वहीं पहले-पहल आपकी शिक्षा शुरू हुई। वक़्त गुज़रता चला गया। आप फिर डी.ए.वी. कॉलेज, लाहौर में पढ़ने लगे। 1919 में 19 वर्ष की आयु में आपने पंजाब विश्वविद्यालय से शास्त्री की परीक्षा दी थी और छुट्टियाँ बिताने जम्मू चले गये।

सुना कि तीस मार्च के बाद महात्मा गाँधीजी ने आदेश दिया कि 3 अप्रैल को देशभर में हड़ताल की जाय और जलसे-जुलूस निकाले जायें। आप भी लाहौर पहुँचे। आकर पूरी तरह काम को सफल बनाने का प्रयत्न करने लगे। कॉलेजों के लड़कों ने नंगे सिर बड़े-बड़े जुलूस ‘हाय-हाय रोल्ट एक्ट’ कहते हुए निकाले थे। यह सब आपके ही यत्नों का फल था। दो-चार दिन बड़ी रौनक रही। 12 अप्रैल को बादशाही मस्जिद, लाहौर में जलसा हुआ। भीड़ का कोई शुमार न था। हज़ारों आदमी थे। गर्मागर्म भाषण हुए। धुआँधार भाषणों के बाद जुलूस बनाकर लोग शहर को चल पड़े। हीरामण्डी जब पहुँचे और शहर में घुसने लगे, उसी समय नवाब मुहम्मद अली सेना के साथ आगे तैनात था। उसने हुक्म दिया कि जुलूस भंग कर दो। लेकिन वे दिन बड़े अजीब थे। श्री ख़ुशीराम आगे-आगे झण्डा उठाये जा रहे थे। कहा, “यह जुलूस कभी वापस नहीं लिया जा सकता और जुलूस की शक्ल में ही शहर में घुसेगा।” नवाब ने हवा में गोली चला दी। लोग भाग छूटे। शेरमर्द लाला ख़ुशीराम ने गरजकर एक बार तो लोगों को ख़ूब लानत दी। कहा, “तुम्हें शर्म नहीं आती इस तरह गीदड़ों की तरह भागते हो।” लोग एकत्र हो गये। लाला ख़ुशीराम आगे जा रहे थे। नवाब ने फिर गोली चलायी। इस बार गोली हवा में नहीं, बल्कि सीधे महाशय ख़ुशीराम की छाती में लगी। गोली लगी, आप ज़ख़्मी शेर की तरह झपटकर आगे बढ़े। और गोली लगी तो आप और आगे बढ़े। एक-एक कर सात गोलियाँ छाती में लगीं, लेकिन ख़ुशीराम का क़दम आगे ही आगे बढ़ता चला गया। आख़िर आठवीं गोली माथे के दायीं ओर और नवीं बायीं ओर आ लगी। शेर तड़पकर गिर पड़ा। ख़ुशीराम सदा की नींद सो गये, लेकिन आज उनका नाम ज़िन्दा है। उनकी बहादुरी व हिम्मत आज भी उसी तरह ताज़ा है। ख़ैर!

आपकी लाश का बड़ा भारी जुलूस निकला। आम ख़याल किया जाता है कि कम से कम पचास हज़ार लोग इस जुलूस में शामिल थे।

इस तरह उस वीर ने अपने और अपने राष्ट्र के गौरव के लिए प्राणों की बाज़ी लगा दी और अपना नाम अमर कर गया। कुछ वर्षों बाद एक कवि ने एक बड़ी दर्दभरी कविता लिखी थी, जिसका एक मिसरा यों है –

हाय! ख़ुशीराम की बरसी मनाई न गयी!

क्या ख़ुशीराम की मौत को हम भूल गये?

उसके मक़सद पे चढ़ाने को हम भूल गये।


शहीद भगतसिंह व उनके साथियों के बाकी दस्तावेजों को यूनिकोड फॉर्मेट में आप इस लिंक से पढ़ सकते हैं। 


Bhagat-Singh-sampoorna-uplabhdha-dastavejये लेख राहुल फाउण्डेशन द्वारा प्रकाशित ‘भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़’ से लिया गया है। पुस्तक का परिचय वहीं से साभार – अपने देश और पूरी दुनिया के क्रान्तिकारी साहित्य की ऐतिहासिक विरासत को प्रस्तुत करने के क्रम में राहुल फाउण्डेशन ने भगतसिंह और उनके साथियों के महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ों को बड़े पैमाने पर जागरूक नागरिकों और प्रगतिकामी युवाओं तक पहुँचाया है और इसी सोच के तहत, अब भगतसिंह और उनके साथियों के अब तक उपलब्ध सभी दस्तावेज़ों को पहली बार एक साथ प्रकाशित किया गया है।
इक्कीसवीं शताब्दी में भगतसिंह को याद करना और उनके विचारों को जन-जन तक पहुँचाने का उपक्रम एक विस्मृत क्रान्तिकारी परम्परा का पुन:स्मरण मात्र ही नहीं है। भगतसिंह का चिन्तन परम्परा और परिवर्तन के द्वन्द्व का जीवन्त रूप है और आज, जब नयी क्रान्तिकारी शक्तियों को एक बार फिर नयी समाजवादी क्रान्ति की रणनीति और आम रणकौशल विकसित करना है तो भगतसिंह की विचार-प्रक्रिया और उसके निष्कर्षों से कुछ बहुमूल्य चीज़ें सीखने को मिलेंगी।
इन विचारों से देश की व्यापक जनता को, विशेषकर उन करोड़ों जागरूक, विद्रोही, सम्भावनासम्पन्न युवाओं को परिचित कराना आवश्यक है जिनके कन्धे पर भविष्य-निर्माण का कठिन ऐतिहासिक दायित्व है। इसी उदेश्य से भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़ों का यह संकलन प्रस्तुत है।
आयरिश क्रान्तिकारी डान ब्रीन की पुस्तक के भगतसिंह द्वारा किये गये अनुवाद और उनकी जेल नोटबुक के साथ ही, भगतसिंह और उनके साथियों और सभी 108 उपलब्ध दस्तावेज़ों को पहली बार एक साथ प्रकाशित किया गया है। इसके बावजूद ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ?’ जैसे कर्इ महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ों और जेल नोटबुक का जिस तरह आठवें-नवें दशक में पता चला, उसे देखते हुए, अभी भी कुछ सामग्री यहाँ-वहाँ पड़ी होगी, यह मानने के पर्याप्त कारण मौजूद हैं। इसीलिए इस संकलन को ‘सम्पूर्ण दस्तावेज़’ के बजाय ‘सम्पूर्ण उपलब्ध’ दस्तावेज़ नाम दिया गया है।

व्यापक जनता तक पहूँचाने के लिए राहुल फाउण्डेशन ने इस पुस्तक का मुल्य बेहद कम रखा है (250 रू.)। अगर आप ये पुस्तक खरीदना चाहते हैं तो इस लिंक पर जायें या फिर नीचे दिये गये फोन/ईमेल पर सम्‍पर्क करें।

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