भगतसिंह – कूका विद्रोह: एक

कूका विद्रोह: एक

फ़रवरी, 1928 में दिल्ली से प्रकाशित ‘महारथी’ में कूका-विद्रोह के इतिहास की जानकारी देने वाला भगतसिंह का यह लेख बी.एस. सिन्धू नाम से छपा था। – स.

सिक्खों में एक उप सम्प्रदाय है, जो ‘नामधारी’ या कूका कहलाता है। इसका इतिहास कुछ बहुत पुराना नहीं है। गत शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ही इसका आविर्भाव हुआ था। आज वह एक संकुचित धार्मिक सम्प्रदाय दीख पड़ता है, परन्तु इसके संस्थापक श्री गुरु राम सिंह एक कट्टर विप्लवी थे। एक प्रसिद्ध ईश्वरभक्त, समाज के दोष देखकर एक विद्रोही समाज-सुधारक बन गया और एक सच्चे समाज-सुधारक की भाँति, जब वह कर्मक्षेत्र में अग्रसर हुआ तो उसने देखा कि देश की उन्नति के लिए पराधीनता की बेड़ियों का काटना परमावश्यक है। विदेशी शासन के विरुद्ध विद्रोह की तैयारी का विराट आयोजन हुआ। उसकी तैयारी में ही जो कुछ झगड़ा-फ़साद हो गया था, उसी से शासकों को समस्त आन्दोलन के कुचल डालने का सुअवसर मिल गया और उस सब प्रयास का निष्फलता के अतिरिक्त और कुछ परिणाम न निकल सका।

कूका आन्दोलन का इतिहास, आज तक लोगों के सामने नहीं आया। किसी ने उन्हें महत्त्वपूर्ण नहीं समझा। कूकों को भटके हुए तथा मूर्ख कहकर हम अपने कर्त्तव्य से छुट्टी पा जाते हैं। स्वार्थ के लिए अथवा लोभ के लिए यदि उन लोगों ने प्राण दिये होते तो हम उपेक्षा दिखा सकते थे, परन्तु उनकी तो ‘मूर्खता’ में भी ‘देशप्रेम’ का भाव कूट-कूटकर भरा था। वे तो तोप के मुँह से बँधते समय हँस देते थे। वे तो आनन्द से ‘सत्त श्री अकाल’ के तुमुल निनाद से आकाश-पाताल को आच्छादित कर देते थे। उनके मस्तक पर व्यथा, चिन्ता अथवा पश्चाताप की रेखा भी नहीं दीख पड़ती थी। क्या वे भूल जाने योग्य हैं? उनका गुरुतर अपराध शायद विफलता के अतिरिक्त कुछ भी नहीं। परन्तु स्कॉट वीर विलियम वालीस भी तो विफल हो मृत्युदण्ड का भागी बना था। उसकी तो आज समस्त इंग्लैण्ड पूजा करता है। फिर हमारे असफल देशभक्त ही इस तरह क्यों भुलाकर निविड़ अन्धकार में फेंक दिये जायें? अस्तु।

हम समझते हैं कि हमारे लिए, देश के लिए निष्काम भाव से मरने वाले लोगों को भुला देना बड़ी भारी कृतघ्नता होगी। हम उनकी स्मृति में कोई बड़ा स्तूप नहीं खड़ा कर सकते तो क्या अपने हृदय में भी थोड़ा स्थान देने से झेंपें? इसी विचार से प्रेरित होकर आज उन ‘मूर्ख’ तथा ‘उतावले’ आशावादियों का संक्षिप्त इतिहास लिखने की यह चेष्टा है। इससे यदि लोगों को उनके सम्बन्ध में ठीक-ठीक बातों का ज्ञान हो जाये और अधिक जानने की इच्छा उत्पन्न हो जाये तो यह प्रयास सफल समझूँगा।

उनके इस छोटे-से इतिहास को हम तीन भागों में बाँट सकते हैं –

  1. गुरु जी का व्यक्तिगत चरित्र,
  2. कूका विद्रोह,
  3. विद्रोह के बाद।

गुरु राम सिंह जी का जीवन

श्री राम सिंह जी का जन्म सन् 1824 ई. में भैणी नामक गाँव, ज़िला लुधियाना (पंजाब) में एक बढ़ई के घर हुआ था। कहते हैं, गुरु गोविन्द सिंह जी ने कभी कहा था कि “मैं बारहवें वर्ष में राम सिंह नाम से प्रसिद्ध अथवा प्रकट होऊँगा।” इसलिए इनके अनुयायी उन्हें उन्हीं दश गुरुओं का अवतार मानते हैं। परन्तु शेष सिक्ख समाज का विश्वास है कि गुरु गोविन्द सिंह जी ने गुरु के सब अधिकार गुरु ग्रन्थ साहिब पर ही डाल दिये और गुरु-प्रथा बन्द कर दी थी। अतः गुरु राम सिंह गुरु नहीं हो सकते।

हमें इन झगड़ों से कुछ काम नहीं। गुरु राम सिंह युवावस्था में पंजाब केसरी महाराजा रणजीत सिंह की सेना में भरती हो गये। वे पहले से ही ईश्वर-भक्त थे और अधिक समय ईश्वरोपासना में ही बिताते थे। इसी कारण वे शीघ्र ही सेना में सर्वप्रिय हो गये। वो बहुधा ईश्वर-भक्ति में लीन रहने के कारण सैनिक-कर्त्तव्यों की पूर्ति में असमर्थ रहते, परन्तु उन्हें सब कर्त्तव्यों से छुट्टी दे देने पर भी सेना में ही रखा गया। एक दिन, कहा जाता है, उन्हें स्वप्न में श्री गुरु गोविन्द सिंह जी के दर्शन हुए, जिन्होंने उनसे हज़ारा (सीमान्त प्रान्त) निवासी बाबा बालकनाथ से गुरु-गद्दी के अधिकार लेने को कहा। दूसरे ही दिन उन्होंने अन्य बीस-पच्चीस भक्तगण के साथ उधर प्रस्थान कर दिया। बाबा बालकनाथ जी ने उनका ख़ूब स्वागत किया और दीक्षा दी। वहाँ से लौटकर आपने नौकरी छोड़ दी और गाँव में जाकर शान्त जीवन बिताने लगे।

वर्षों बीत गये। अनेक परिवर्तन हो गये। महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद गद्दी के लिए झगड़ा हुआ। अंग्रेज़ों ने पंजाब जीत लिया और इसे भी शेष भारत की तरह पराधीनता की बेड़ियों से जकड़ दिया। यह सबकुछ हो गया और साथ ही 1857 का सिपाही विद्रोह भी हो गया और अंग्रेज़ शान्तिपूर्वक भारत पर शासन करने लगे, परन्तु गुरु राम सिंह वहीं अपना शान्त जीवन बिताते रहे। हाँ, ईश्वर-भक्ति के कारण आप दूर-दूर तक प्रसिद्ध हो गये। प्रान्तभर से लोग दर्शनों के लिए आते थे।

पहले तो आप केवल ईश्वर-भक्ति का ही उपदेश देते थे, परन्तु बाद में कुछ समाज-सुधार सम्बन्धी उपदेश देने लगे। आपने कन्या क्रय-विक्रय, मदिरा-मांस भक्षण आदि बहुत-सी कुरीतियों का बड़े ज़ोर से विरोध किया। आपके भक्तगण भी सादा जीवन बिताते और ईश्वरोपासना में तल्लीन रहते। आपने अपने गाँव में एक सार्वजनिक भण्डारा खोल रखा था, जहाँ पर कि सभी लोगों को बिना मूल्य भोजन मिलता था। परन्तु शीघ्र ही एक परिवर्तन हुआ।

कहा जाता है, रामदास नामक किसी अज्ञात संन्यासी ने आकर उनसे कहा – “इस समय देश का विदेशी शासन से छुटकारा दिलाना ही सर्वप्रथम कर्त्तव्य है।” और उसी समय से आपने अपना कार्यक्रम राजनीतिक बना लिया। संन्यासी वाली बात केवल सुनी-सुनायी है। सम्भव है ऐसी कोई घटना घटित ही न हुई हो, परन्तु इतना तो मानना ही पड़ेगा कि इस समय गुरु राम सिंह जी को देश की पराधीनता एकदम बुरी तरह अखरी। वे समझ गये थे कि बाह्य स्वतन्त्रता के साथ ही साथ देशवासियों की आत्मा भी मरती जा रही है। लोग स्वाधीनता का विचार तक खो बैठे हैं। अभी कल उन्होंने सिपाही विद्रोह तथा उसकी विफलता के बाद किये गये अकथनीय अत्याचार देखे-सुने थे। उससे भी अवश्यमेव उन्हें कुछ ठेस लगी होगी। जो भी हो, उन्होंने विदेशी शासन का खोखलापन ख़ूब अच्छी तरह देखकर एक कार्यक्रम बनाकर कार्य आरम्भ कर दिया। अब तक केवल उपदेश ही होता था, अब ‘दीक्षा’ तथा संगठन भी आरम्भ हुआ।

उन्होंने उस समय ठीक उसी असहयोग का प्रचार प्रारम्भ कर दिया, जो 1920 में महात्मा गाँधीजी ने किया। उनका असहयोग महात्मा जी के असहयोग से भी कई बातों में बढ़-चढ़कर था। अदालतों के बहिष्कार, अपनी पंचायतों के संस्थापन, सरकारी शिक्षा के बहिष्कार, विदेशी सरकार के पूर्ण बहिष्कार के साथ ही साथ रेल, तार तथा डाक के बहिष्कार का प्रचार भी हुआ। उस समय देश आज की तरह निर्जीव होकर उन वस्तुओं पर इतना निर्भर नहीं हो गया था कि उनके बहिष्कार की कल्पना भी न कर पाता। प्रत्युत उन्होंने डाक का अपना प्रबन्ध इतना अच्छा कर लिया था कि ‘उनकी डाक सरकारी डाक से भी जल्दी पहुँच जाती थी।’[1] इस सबके साथ सादा वेष तथा स्वदेशी वस्त्र पहनने का ज़ोर से उपदेश होता था। प्रचार-कार्य बहुत दिनों तक न होने पाया था कि सरकार की तीव्र दृष्टि इस आन्दोलन पर पड़ी। उन्हें इस प्रचण्ड आन्दोलन को दबा देने की चिन्ता हुई।

T.D. Forsith, जोकि सन् 1863 ई. में पंजाब सरकार के चीफ़ सेक्रेटरी थे और बाद में 1872 में कूका विद्रोह के समय अम्बाला डिवीज़न के कमिश्नर पद पर काम करते थे, अपनी Autobiography में लिखते हैं –

“1863 में ही मैं इस आन्दोलन की तह तक पहुँच गया था और समझ गया था कि यह क्या भीषण परिणाम ला सकता है। अतः मैंने उनके प्रचार पर बहुत-से बन्धन लगा दिये, जिससे उनके प्रचार-कार्य की गति कुछ हद तक रुक गयी।”

जब सरकार ने लोगों का बड़ी संख्या में भैणी आना-जाना तथा उनका वहाँ अधिक देर तक ठहरना तक भी बन्द कर दिया तब गुरु राम सिंह जी ने अपना कार्य जारी रखने के लिए एक तदबीर सोची। समस्त देश को 22 हिस्सों में विभक्त कर 22 योग्य मनुष्य उनका संगठन करने के लिए नियुक्त कर दिये। वे सभी ‘सूबे’ कहलाते थे। कार्य बहुत कुशलता से चलता रहा। सभी नामधारी सिक्ख अपनी आय का दशांश गुरु जी को भेंट किया करते। वे सब भैणी भेज दिया जाता था। यह सब होता ही था और साथ ही साथ गुप्त रूप से विद्रोह का प्रचार भी होता रहा। बाहरी जोश बहुत कम कर दिया गया। यहाँ तक कि सरकार का सन्देह बहुत हद तक दूर हो गया और सब बन्धन स्वतः 1869 में हटा लिये गये।

बन्धन-मुक्त होते ही लोगों का जोश बढ़ा। इतना बढ़ा कि सँभालना कठिन हो गया। इसी से 1872 में अपरिपक्व विद्रोह उठ खड़ा हुआ, जिसके कारण सारा विराट आन्दोलन पिस गया। परन्तु उस मुख्य घटना पर कुछ लिखने से पहले श्री गुरु जी के व्यक्तिगत चरित्र सम्बन्धी कुछ मनोरंजक बातों का उल्लेख करना अनुचित न होगा।

गुरु राम सिंह बड़े तेजस्वी तथा प्रभावशाली व्यक्ति थे। उनके असाधारण आत्मबल सम्बन्धी बहुत-सी बातें प्रसिद्ध हैं। कहते हैं कि वे जिसके कान में दीक्षा का मन्त्र फूँक देते थे वही उनका परम भक्त तथा शिष्य हो जाता था। जब यह बात ज़रा प्रसिद्ध हुई तो दो बदमाश अंग्रेज़ उनके पास उनकी शक्ति की परीक्षा लेने गये। उन्होंने कहा था, “देखेंगे, गुरु जी का हम पर क्या प्रभाव पड़ता है?” परन्तु दीक्षा के बाद से वे उनके कट्टर भक्त बन गये और तब से उनके व्यक्तिगत दोष भी मिट गये। इसी तरह डॉक्टर गोकलचन्द पी.एच.डी. एक लेख में लिखते हैं कि उनकी दादी का भाई एक बड़ा चरित्रहीन व्यक्ति था, और उसे हुक्के का व्यसन था। केवल एक बार ही गुरु राम सिंह जी के दर्शनों ने उनका जीवन एकदम परिवर्तित कर दिया। उनका हुक्का तो एकदम छूट गया और शेष सारा जीवन ईश्वरोपासना में ही बीता। इसी तरह एक और मनुष्य जिसने कि कभी कोई हत्या कर दी थी, वह भी गुरु जी से दीक्षित हुआ। फिर उसने अपनेआप को कोर्ट में पेश कर दिया और अपना अपराध स्वीकार कर लिया। जब जज ने अत्यन्त आश्चर्य के साथ पूछा, “तुम्हें तो कोई जानता भी न था और हत्या सम्बन्धी बात का तुम पर सन्देह भी न था, फिर तुमने एकाएक अपराध स्वीकार कर मृत्यु का आह्वान क्यों किया?” तो उसने कहा, “मेंरे गुरु जी की ऐसी ही आज्ञा है।”

सरकार ने भी परीक्षा करनी चाही। एक सब-इंस्पेक्टर को भेजा। वह भी प्रसन्न था। उसे आशा थी कि सब भेद खोलकर कुछ पुरस्कार पायेगा। गुरु जी के दर्शन किये। लौट आया। लौटते ही त्यागपत्र दे दिया। अफ़सरों ने पूछा, “राम सिंह क्या कहता है?” कहा, “बताने की आज्ञा नहीं।” पूछा गया, “त्यागपत्र क्यों देते हो?” उत्तर दिया, “गुरु जी की यही आज्ञा है। वे कहते हैं, विदेशी शासकों की नौकरी मत करो।”

ऐसी अनेक घटनाएँ हैं। जो भी हो, इतना तो मानना ही पड़ेगा कि गुरु जी ईश्वर-भक्ति तथा उच्च चरित्र के कारण एक महान शक्तिशाली महापुरुष थे। अतः उपरोक्त घटनाएँ असम्भव नहीं। अस्तु। सरकार यह बात देखकर घबरायी और उसे सारे आन्दोलन को दबाने की चिन्ता हुई। यह भी स्वाभाविक ही था।

अपरिपक्व विप्लव का प्रारम्भ

1869 में सब बन्धन हटा दिये गये। लोग सहड्डों की संख्या में भैणी आने लगे। सन् 1871 ई. में कुछ कूके वीर अमृतसर में से गुज़र रहे थे। सुना, मुसलमान बूचड़ असंख्य गौओं की नित्य हिन्दुओं को चिढ़ाने के लिए उनके सामने हत्या करते हैं। हिन्दू समाज को बहुत कष्ट होता है। कट्टर गो-भक्त कूके यह सब सहन न कर सके। उन्होंने बूचड़ख़ाने पर आक्रमण कर दिया और सभी बूचड़ों को वहीं ढेर कर दिया और आप भैणी की ओर चल दिये। अमृतसर के सभी प्रतिष्ठित हिन्दू गिरफ्तार कर लिये गये। उधर गुरु जी को वैसे भी सारा समाचार मिल चुका था, इधर इन कूकों ने जाते ही सब कहानी कह सुनायी। गुरु जी ने आज्ञा दी, “जाओ जाकर अपना अपराध स्वीकार कर लो और उन निर्दोष लोगों को विपत्ति से बचाओ।” आज्ञा का पालन हुआ। निरपराध लोग छूट गये और ये वीर अत्यन्त आनन्द और हर्ष के साथ फाँसी पर लटक गये। ऐसी ही एक घटना रायकोट में भी हो गयी। वहाँ पर भी कई कूकों को फाँसी पर लटका दिया गया था। परन्तु वहाँ पर शेष सिक्खों ने अनुभव किया कि उनके निर्दोष साथी फाँसी पर लटकाये गये हैं। प्रतिहिंसा की अग्नि प्रचण्ड हो उठी, परन्तु कोई विशेष घटना नहीं हुई।

13 जनवरी, सन् 1872 को भैणी में माघी का मेला होने वाला था। लोग दूर-दूर से हज़ारों की संख्या में आने लगे। एक कूका नामधारी[2] वीर मलेर कोटला नामक मुसलमान रियासत की इसी नाम की राजधानी में से गुज़र रहा था, वहाँ पर उसने एक मुसलमान को देखा जो एक बैल पर अत्यन्त बोझ लादे, स्वयं उस पर बैठा हुआ उसे पीटता जा रहा था। बैल बड़े कष्ट से चल रहा था। यह देखकर उस कूके ने उस मुसलमान से कहा, “भाई! इतना अत्याचार न करो। बोझ पहले ही ज़्यादा है, तुम नीचे उतर आओ तो क्या हर्ज़ हो?” परन्तु उस मुसलमान ने तुरन्त उसे दो-चार गालियाँ दे दीं। कूका सिक्ख कोई भीरु या कायर तो था ही नहीं, ईंट का जवाब पत्थर से मिला। नौबत हाथापाई तक आ गयी। मुसलमान रियासत के मदमत्त मुसलमान कर्मचारी उसे पकड़कर कोतवाली में ले गये, जहाँ पर उस ग़रीब को अनेकानेक यातनाएँ तथा अपमान सहन करने पड़े। और बाद में, उस बैल का, उसके पास बैठाकर, उसकी आँखों के सामने, वध कर दिया गया। यह असह्य था। छूटते ही वह वीर भैणी पहुँचा। उसने भरे दिवान में क्रूर आतताइयों के उन अत्याचारों का विवरण तथा अपनी करुण कथा कह सुनायी। लोग तो रायकोट की घटना से पहिले ही उत्तेजित हो रहे थे, उस पर यह घटना हो गयी। जलती पर तेल पड़ा और भभक उठी। निज बाहुबल के भरोसे बदला चुकाने का निश्चय हो गया। जोश बढ़ता देखकर गुरु जी तनिक घबराये। गले में कपड़ा डालकर प्रार्थना की, “खालसा जी! क्या अनर्थ करने जा रहे हो। ज़रा शान्ति तथा सहनशीलता से काम लीजिये। ज़रा सोचो तो सही, इस सबका क्या परिणाम होगा? सारा बना-बनाया काम बिगड़ जायेगा।” गुरु जी के इस प्रकार समझाने पर बहुत-से लोगों का जोश तो ठण्डा हो गया, परन्तु 150 व्यक्ति प्रतिहिंसा की उग्र मूर्तियाँ बन उठे। उनका जोश न थमा। गुरु जी ने लाख समझाने की चेष्टा की, परन्तु एक साथी का अपमान उनके लिए असह्य हो उठा था।

बड़ी विकट परिस्थिति थी। काम अधूरा ही था और कोई तैयारी न की गयी थी। ऐसी दशा में इन 150 उत्तेजित लोगों का साथ देने से सारा आन्दोलन पिस जाने की सम्भावना थी। – क्या किया जाये? किकर्त्तव्यविमूढ़ की भाँति सभी देख रहे थे और देख रहे थे गुरु जी भी। और कोई दूसरा व्यक्ति ऐसे समय क्या करता? अथवा ऐसे समय पर लोग क्या करने की सलाह दे सकते हैं? इस बात का हमें पता नहीं, इसकी चिन्ता भी नहीं। दूरदर्शी गुरु राम सिंह ने उस समय यही सोचा कि ये उत्तेजित लोग तो शान्त हो नहीं रहे हैं, इनकी इच्छानुसार अभी विद्रोह खड़ा करने की तो तैयारी नहीं की गयी और अभी तो इच्छानुसार सब संगठन भी नहीं हुआ। इस समय यदि ये जायें और हम सरकार पर यह प्रकट कर दें कि हमारा इनसे कोई सम्बन्ध नहीं तो शेष आन्दोलन बच जायेगा। बात तो अच्छी दीख पड़ती है, परन्तु राजनीतिक चालों का महत्त्व उनकी सफलता पर निर्भर हुआ करता है। गुरु जी ने यह चाल चली थी, वह निष्फल हुई। पासा उलट गया। यही उनका गुरुतर अपराध था। उन्होंने उसी समय पुलिस को ख़बर दे दी कि ‘ये लोग उत्तेजित होकर उनकी आज्ञाओं तथा प्रार्थनाओं की उपेक्षा करके झगड़े-फ़साद के लिए जा रहे हैं। मैं अभी से पुलिस को सब समाचार देकर सतर्क कर देना चाहता हूँ। वह उनसे निपट ले। मैं अनर्थ का उत्तरदायी नहीं हूँ।’

लुधियाना के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर मि. Cowan अपने 15 जनवरी के पत्र में अम्बाला-कमिश्नर को इस घटना के बारे में इस प्रकार लिखते हैं –

He (a police reporter) stated to me that Ram Singh, the leader of the kookas, went to those men, with a turban around his neck, and entreated them not to create a disturbance; and they would not listen to him; and that Ram Singh then came to the Deputy Inspector and reported to him that these men were upto mischief, and that he had no control over them.

परन्तु उस समय सरकार या पुलिस जान-बूझकर चुप रही। चुपचाप उनको अंग्रेज़ राज्य में से रियासत में घुसने दिया। उसी समय उन सबको गिरफ्तार क्यों नहीं कर लिया गया? कुछ दिनों के बाद उनका जोश ठण्डा हो ही जाता। परन्तु नहीं, सरकार तो स्वयं चाहती थी कि उसे कोई अवसर मिले, जिससे वह आन्दोलन कुचला जा सके। इस समय मनोवांछित सुअवसर मिल गया। लोगों का तो यहाँ तक कहना है कि उन लोगों को उत्तेजित करने में भी सरकारी आदमियों का हाथ था। ख़ैर, उसके सम्बन्ध में कुछ न कह सकने पर भी हम सरकार पर जान-बूझकर चुप रहने का अपराध लगा सकते हैं। अस्तु, वे 150 कूके वीर पटियाला के सीमान्त स्थित रब्बू गाँव के बाहर जा ठहरे। रातभर वहीं विश्राम किया। अगले दिन भी वहीं रहे। शायद और साथियों की प्रतीक्षा कर रहे थे।

14 जनवरी, सन् 1872 ई. को सायंकाल उन्होंने कुछ सिक्ख सरदारों के मलोध (Malodh) नामक क़िले पर आक्रमण कर दिया। इस क़िले पर आक्रमण क्यों किया गया? इसके सम्बन्ध में डिस्ट्रिक्ट गजेटियर में लिखा है कि उन्हें आशा थी कि यह सरदार विद्रोह में उनका नेतृत्व लेंगे। सम्भव है, पहिले विराट आयोजन में ऐसी ही तैयारी रही हो और उस समय उन्होंने अपरिपक्व विद्रोह उठता देख सहायता देने अथवा नेतृत्व लेने से इन्कार कर दिया हो। ख़ैर, कूकों ने वहाँ आक्रमण कर दिया और कुछ शस्त्र, कुछ घोड़े तथा एक तोप लेकर चलते बने। वहाँ पर दोनों ओर के दो-दो व्यक्ति मरे और कुछ घायल हुए।

अगले दिन प्रातःकाल 7 बजे वे मलेर कोटला पहुँच गये। सरकार ने पटियाला तथा मलेर कोटला दोनों राज्यों को पहले से सतर्क कर दिया था। मलेर कोटला की रक्षा के लिए विशेष तौर से तैयारी की गयी थी, परन्तु इन दुःसाहसी वीरों ने इस वेग से आक्रमण किया कि शहर में तो क्या, महल तक में जा घुसे। ख़ज़ाना लूटने की कोशिश होने लगी। लूट ही तो लिया होता परन्तु दुर्भाग्यवश भूल से एक और दरवाज़ा तोड़ने में बहुत समय नष्ट हो गया, जहाँ कि कुछ व्यर्थ के काग़ज़ों के अतिरिक्त उनके हाथ कुछ न लगा और उधर उन्हें शीघ्र ही वहाँ से भागना पड़ा। 8 को मारकर, 15 को घायल कर और कुछ शस्त्र तथा घोड़े लेकर वे वहाँ से चल निकले। उनके सात साथी मरे और पाँच पकड़े गये अथवा घायल हो गये। उनके पीछे कोटला के सशस्त्र सैनिक भी भागे और –

A sort of running fight was kept along, shots fired and many more Kookas were wounded, till both parties reached the village of Ruir in the Patiala state; the Kookas carrying most of the wounded with them.

रड़ गाँव के निकटवर्ती जंगल में वे छिप गये। शिवपुर के नायब नाजिम ने उन पर फिर आक्रमण किया। फिर लड़ाई छिड़ी, परन्तु कूके थके-माँदे थे, भूखे-प्यासे थे, और थे घायल बिना मरहम-पट्टी के। वे पकड़े गये। 68 व्यक्ति पकड़े गये थे जिनमें से 28 घायल हो चुके थे।

यही घटना ‘विद्रोह’ कहलाती है। मि. कावन अपने एक पत्र में लिखता है –

It looks like the commencement of insurrection…

और एक स्थान पर लिखता है –

I propose to execute at once all who were engaged in attacks on Malodh and Malarkotla. I am sensible of great responsibility in exercising an authority which is not vested in me, but hte case in an exceptional one. These men are not ordinary criminals. They are rebels, having for their immediate object the acquisition of plunder, and ulteriorly the subversion of order. It is certain that had their first attempts been crowned with success, had they succeeded in arming themselves with horses and treasures, they would have been joined by all the abandoned charities in the country and their extinction would not be effected without much trouble.

ये 68 व्यक्ति 17 जनवरी को मलेर कोटला लाये गये। उनमें से दो स्त्रियाँ भी थीं। वे पटियाला स्टेट की नागरिक थीं। उन्हें तो स्टेट के सुपुर्द कर दिया गया और शेष 66 में से पचास को वहीं तोप से उड़ा देने का निश्चय हो चुका था। अपनी-अपनी बारी से सानन्द सत्त श्री अकाल आदि जयघोष करते हुए, तोप के मुँह से बँध जाते। एक बार धमाके की आवाज़ होती और वह कूका वीर इस संसार से न जाने किधर चला जाता। उन fanatics को मृत्यु का भय नहीं हुआ, वे हम ‘समझदार’ लोगों की तरह मृत्यु की कल्पना-मात्र से ही थर-थर काँप नहीं उठे। ऐसे ही ‘मूर्ख’ और कहाँ कितनी संख्या में मिल सकते हैं? उस समय स्वार्थ के लिए मरने वाले लोग इसी तरह प्रसन्न रह सकते, इसी तरह हँसते हुए मृत्यु से आलिगन कर पाते, यह असम्भव जान पड़ता है। आत्मसम्मान, देशहित तथा स्वतन्त्रता प्राप्ति आदि न जाने किन-किन उच्च भावों की प्रेरणा से वह मृत्युंजय बन पाये थे। इसी से हम उनकी इस उत्तेजना तथा जल्दबाज़ी को भूलकर प्रणम्य समझने में बाधित (को बाध्य) होते हैं। ख़ैर! एक-एक करके 49 तो तोप से उड़ा दिये गये, परन्तु पचासवें ने, जोकि तेरह वर्षीय बालक था, वहाँ फ़साद खड़ा कर दिया। मि. कावन एक पत्र में लिखता है –

It was my intention to have had 50 men blown away, and to have sent the remaining 16 rebels to Malodh to be executed there tomorrow, but one escaped from guards and made a furious attack on me; and as he was a very powerful man, I had considerable difficulty in releasing myself… The officials whom he attacked drew their sword and cut him down.

इसी घटना के सम्बन्ध में जो बात सुनी जाती है वह यूँ है कि 50वाँ व्यक्ति एक तेरह वर्षीय बालक था। उसे देखकर मिसेज़ कावन को दया आयी। उसने अपने पति से उसे छोड़ देने को कहा। पत्नी की प्रेरणा से मि- कावन ने झुककर उस बालक से कहा, “अरे, पाजी राम सिंह का साथ छोड़ दो और कह दो, मैं उसका अनुयायी नहीं हूँ, तुम्हें छोड़ दिया जायेगा।” वीर बालक अपने गुरु के प्रति यह अपमानजनक शब्द सहन न कर सका। क्रुद्ध सिंह की तरह वह झपटा और उसने कावन को दाढ़ी से पकड़ लिया और तब तक न छोड़ा, जब तक उसके दोनों हाथ न काट दिये गये और तलवारों से क़त्ल न कर दिया गया। अस्तु, इस तरह उस दुखान्त नाटक का एक और पर्व समाप्त हो गया।

बिना अभियोग चलाये 50 को तोप से उड़ा देना, summary execution कर देना एकदम अनुचित दीख पड़ता है। उधर मि. फार्सिथ, अम्बाला-कमिश्नर ने उन्हें एक पत्र में लिख दिया था कि बिना अभियोग चलाये किसी को मृत्युदण्ड मत देना, परन्तु मि. कावन ने मनमानी कर डाली और जब मि. कावन पर बाद में मुक़दमा चला तो उन्होंने कमिश्नर साहिब का अगले दिन का पत्र, जिसमें उनके इस कार्य की प्रशंसा की गयी थी, पेश किया। परन्तु उसके सम्बन्ध में मि. फार्सिथ का कहना है कि मैंने परिस्थिति नाज़ुक जान यह उचित समझा कि लोगों को किंचित-मात्र भी सन्देह न होने पाये कि अफ़सरों में भी आपस में कुछ खेंचातानी हो रही है। अतः उसके पिछले कार्य की प्रशंसा कर और summary execution करने से मना कर दिया था। परन्तु शेष 16 व्यक्तियों को भी तो अगले ही दिन फाँसी पर लटका दिया गया।

उन वीरों की मृत्यु के प्रति उपेक्षा ने अफ़सरों को भी प्रभावित कर दिया था। Mr. E. Perkinson, Deputy Superintendent Police अपनी 17 जनवरी की रिपोर्ट में दो व्यक्तियों के सम्बन्ध में लिखते हैं –

Both Hira Singh and Lehna Singh the leaders taken. They are generally well dressed and well to do men; but have the appearance of bold and determined looking fellows.

इधर तो यह सबकुछ हो रहा था, उधर डिप्टी कमिश्नर ने गुरु राम सिंह को बुलाया और घर लौटा दिया, क्योंकि वह समझता था कि वे निर्दोष हैं, क्योंकि उन्होंने उन उन्मत्त तथा उत्तेजित कूकों की ख़बर देकर पुलिस को चौकन्ना कर दिया था। गुरु राम सिंह की निर्दोषता के सम्बध में पंजाब सरकार ने भारत सरकार को यूँ लिखा –

No direct evidence against Ram Singh in this case is sufficient to put hin on this trial.

परन्तु 17 जनवरी को कमिश्नर की आज्ञा से घुड़सवार तथा दूसरी पुलिस ने कर्नल बायली (Baille) के नेतृत्व में, अध्यक्षता में भैणी नगर को एकाएक घेर लिया। सब लोगों को यह देखकर बहुत आश्चर्य हुआ, परन्तु जब उन्हें मालूम हुआ कि सरकार उन्हें पकड़ना चाहती है तब उन्होंने अपनेआप को शान्तिपूर्वक पुलिस के हवाले कर दिया। उस समय गुरु राम सिंह के साथ चार व्यक्ति, चार विभिन्न स्थानों के सूबे श्री साहिब सिंह, श्री जवाहिर सिंह, श्री गुरुदत्त सिंह तथा श्री तन्नू सिंह भी थे। उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें पहिले तो इलाहाबाद भेजा गया और बाद में रंगून भेज दिया गया। यह गिरफ्तारी रेगूलेशन 1818 के अनुसार हुई थी। यहीं पर गुरु राम सिंह जी की वह चाल उलटी पड़ी। यदि उस समय वे बचे रहते तो फिर शीघ्र ही सब स्थिति सँभल जाती।

इधर ज्यों-ज्यों प्रान्तभर में विद्रोह का समाचार फैलने लगा, त्यों-त्यों ये लोग भैणी की ओर जाने लगे। सब लोगों का विचार था कि जिस दिन की प्रतीक्षा थी, वह आ गया। इधर पुलिस भी चौकन्नी हो गयी थी। जहाँ कोई कूके मिल जाते वहीं पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता। इसी तरह 172 कूकों के एक गुट से कर्नल बायली की भेंट हो गयी। उनमें से चार तो विभिन्न स्थानों के सूबे – श्री ब्रह्मा सिंह, श्री काहन सिंह, श्री पहाड़ा सिंह तथा श्री हुकुम सिंह तो तुरन्त पहिले लुधियाना और फिर गुरु जी के पास इलाहाबाद भेज दिये गये और 120 घरों को लौटा दिये गये और शेष पचास –

Having no homes and ostensible means of living, beingh in fact, a dangerous clan of this sort who having sold all they possessed, hold themselves in readiness to perform any act that their leaders may order.

 – को जेल में बन्द कर दिया गया। इस तरह कुछ ही दिनों में सब मामला शान्त हो गया।

उसके बाद –

सबकुछ हो चुका। नाटक की मुख्य घटना हो चुकी। अब तो कथा समाप्त करने को परिशिष्ट-मात्र शेष है। मि. कावन और मि. फार्सिथ पर summary execution करने का अभियोग चला। उन्होंने पंजाब की भीषण स्थिति का रोमांचकारी चित्रण करने में कोई कसर उठा न रखी और पुरस्कार पाने की आशा प्रकट की। मि. कावन को तो पदच्युत कर इंग्लैण्ड भेज दिया गया और मि. फार्सिथ को पंजाब से अवध उसी पद पर तब्दील कर दिया। पचास को तोप से उड़ाने और 16 को फाँसी दे डालने – और वह भी बिना अभियोग चलाये, बिना उन लोगों को सफ़ाई देने का अवसर दिये – के अपराध की यह सज़ा दी गयी। Sir Henry Cotton के शब्दों में तो यह दण्ड एकदम अपर्याप्त अथवा नाकाफ़ी था परन्तु ऐंग्लो इण्डियन समाचारपत्रों ने इतना भी दण्ड देने के विरुद्ध बहुत बवेला मचाया था।

इधर शेष कूका समाज पर बहुत अत्याचार होने लगे। गुरु राम सिंह के बाद श्री हरि सिंह गुरु बने। उन्हें भैणी में नज़रबन्द कर दिया गया। गुरुद्वारे के बाहर पुलिस की चौकी बिठा दी गयी। छह वर्ष तक तो भैणी की ऐसी दशा रही मानो शत्रु घेरा डाले पड़ा हो। न कोई बाहर से भीतर आ सकता, न कोई भीतर से बाहर जा पाता। फिर धीरे-धीरे कुछ-कुछ लोगों का आना-जाना खुला। उस समय भी हरि सिंह बाहर नहीं आ सकते थे – इसके बावजूद कि आने-जाने की आज्ञा हो गयी थी। आने वाले यात्रियों को बहुत तंग किया जाता था। बुरी तरह अपमानित किया जाता, मुश्कें कसकर धूप में डाल दिया जाता, जहाँ बेचारों को घण्टों झुलसना पड़ता। चारपाई के नीचे हाथ दबाकर कई आदमी चारपाई पर बैठ जाते। उन पर हुक्के का गन्दा बदबूदार पानी डाल दिया जाता। यह सब अत्याचार करने वाले इसी देश के निवासी होते थे और इन यातनाओं को चुपचाप सहन करने वाले भी इसी देश के अभागे निवासी। और अब तो यह निरा धार्मिक सम्प्रदाय रह गया था। परन्तु पंजाब प्रान्त का इतिहास बड़ा रोमांचकारी है। समाज का समाज Outlaws घोषित हुआ तो पंजाब में, किसी सम्प्रदाय के सभी के सभी लोग भीषण अत्याचारों का शिकार हुए तो पंजाब में और फिर हज़ारों का सारे का सारा आन्दोलन unlawful क़रार दिया गया तो पंजाब में। इस बार भी ऐसा ही हुआ। प्रत्येक कूका अपने-अपने घर में नज़रबन्द था। बिना पुलिस की आज्ञा के कहीं बाहर न जा सकता। आज्ञा लेने जाने के मानी होते, पुलिस के अकथनीय अत्याचार, तथा अपमान सहन करना और (कई) दिनों तक भूखे-प्यासे तड़पते रहकर बाहर जाने की आज्ञा पाये बिना चुपचाप घर आकर बैठ जाना। यह दशा बहुत दिनों तक चली और बन्दिशें तो अब 1920 में आकर असहयोग के दिनों में हटायी गयीं। अस्तु!

गुरु राम सिंह जी बर्मा में ही नज़रबन्द रहे। डि. गजेटियर में लिखा है – “Finally he died in Burma in 1855.” परन्तु 1920 में डस्का निवासी श्री आलम सिंह इंजीनियर ने एक लेख द्वारा उपरोक्त बात का खण्डन किया था। उन्होंने लिखा था कि वे दो और साथियों सहित Lower Burma की किसी पोर्ट से लासट द्वीप जा रहे थे। उस पोर्ट का नाम भोलमीन था। वहाँ पर एक दिन एक बड़े तेजस्वी व्यक्ति को पुलिस की निगरानी में सैर करते देखकर उनके सम्बन्ध में कुछ पूछताछ करने पर मालूम हुआ कि ये पंजाब के राजा हैं। वह समझे शायद महाराजा दिलीप सिंह हों, परन्तु बाद को मालूम हुआ कि वह कूका गुरु राम सिंह जी हैं। उस समय उनके साथ उनका एक सूबा लक्खा सिंह भी था। उनसे मिलने पर ख़ूब बातचीत हुई और मालूम हुआ कि उन्हें पाँच मील तक बाहर सैर करने की आज्ञा थी। ख़ैर! सरकार ने इस लेख का कभी प्रतिवाद भी नहीं किया। जो भी हो, मालूम ऐसा ही होता है कि गुरु जी अब इस संसार में नहीं हैं, परन्तु कूका लोगों का विश्वास है कि वे अभी जीवित हैं। ख़ैर!

आज भी पंजाब में कूका सम्प्रदाय विद्यमान है। उनमें ईश्वर-भक्ति का अभी तक प्राधान्य है। बहुत सवेरे उठकर केशी स्नान कर घण्टों तक भगवद्भजन में लीन रहना, उनका नित्य नियम है। मांस, मदिरा, आदि वस्तुओं के प्रयोग के कट्टर विरोधी हैं। एक सीधी पगड़ी, एक लम्बा कुर्ता और एक कच्छा – यही उनका पहनावा है। एक कम्बल और एक डोलका-सा बना हुआ बड़ा-सा लोटा और एक टकुआ जिसे वे सफाजंग बोलते हैं – यही उनका सामान है। गले में सूत की बनी हुई एक सुन्दर माला रहती है। उनमें भी एक विशेष मस्ताना दल होता है। वे शबद-कीर्तन करते हुए एकदम सुध-बुध भूल जाते हैं। इन लोगों के संकीर्तन से प्रत्येक व्यक्ति प्रफुल्लित तथा रोमांचित-सा हो जाता है। ख़ून खौलने लगता है, आँखों में प्रेम तथा भक्ति के आँसू भर आते हैं।

ग्यारहवें और बारहवें गुरु में विश्वास रखने के कारण तथा मांस, मदिरा के कट्टर विरोधी होने के कारण वे शेष सिक्ख समाज से जुदा हैं। उनमें समानता का भाव प्रबल होता है। होली आदि के अवसर पर उनके विशेष उत्सव होते हैं, जहाँ तक कि ख़ूब होम यज्ञ होता है। शेष सिक्ख इसके विरोधी हैं। कूके अपने को हिन्दू मानते हैं, शेष सिक्ख नहीं। विगत अकाली आन्दोलन के दिनों में उन्होंने अकालियों का कुछ विरोध किया था जिससे उनकी स्थिति कुछ ख़राब हो गयी। तथापि वे अपने ढंग के निराले लोग हैं। उन्हें देख एक उस अधखिले फूल की याद आती है जो खिलते ही मसल डाला गया हो। गुरु राम सिंह जी की हसरतें दिल-की-दिल ही में रह गयी थीं। उनके शेष सभी अनुयायियों का आत्मबलिदान भी विस्मृत हो गया। उन अज्ञात लोगों के बलिदानों का क्या परिणाम हुआ, सो वही सर्वज्ञ भगवान जाने। परन्तु हम तो उनकी सफलता-विफलता का विचार छोड़ उनके निष्काम बलिदान की याद में एक बार नमस्कार करते हैं।

[1] भाई परमानन्द के एक लेख के आधार पर

[2] गुरु रामधारी के अनुयायी नामधारी तथा कूका कहलाते थे। नामधारी इसलिए कि गुरु जी के उपदेश का आधार स्तम्भ ‘ईश्वर का नाम’ था। उस उपदेश और दीक्षा पाने के बाद प्रत्येक मनुष्य ‘नामधारी’ अथवा ‘इश्वर-नाम को ह्रदय में धारण किये हुए’ कहलाता था। कूका इसलिए कि वे भगवद्भजन में तन्मय होकर ख़ूब शोर मचाते थे, अतः कूकने वाले ‘कूका’ कहलाते थे।


शहीद भगतसिंह व उनके साथियों के बाकी दस्तावेजों को यूनिकोड फॉर्मेट में आप इस लिंक से पढ़ सकते हैं। 


Bhagat-Singh-sampoorna-uplabhdha-dastavejये लेख राहुल फाउण्डेशन द्वारा प्रकाशित ‘भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़’ से लिया गया है। पुस्तक का परिचय वहीं से साभार – अपने देश और पूरी दुनिया के क्रान्तिकारी साहित्य की ऐतिहासिक विरासत को प्रस्तुत करने के क्रम में राहुल फाउण्डेशन ने भगतसिंह और उनके साथियों के महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ों को बड़े पैमाने पर जागरूक नागरिकों और प्रगतिकामी युवाओं तक पहुँचाया है और इसी सोच के तहत, अब भगतसिंह और उनके साथियों के अब तक उपलब्ध सभी दस्तावेज़ों को पहली बार एक साथ प्रकाशित किया गया है।
इक्कीसवीं शताब्दी में भगतसिंह को याद करना और उनके विचारों को जन-जन तक पहुँचाने का उपक्रम एक विस्मृत क्रान्तिकारी परम्परा का पुन:स्मरण मात्र ही नहीं है। भगतसिंह का चिन्तन परम्परा और परिवर्तन के द्वन्द्व का जीवन्त रूप है और आज, जब नयी क्रान्तिकारी शक्तियों को एक बार फिर नयी समाजवादी क्रान्ति की रणनीति और आम रणकौशल विकसित करना है तो भगतसिंह की विचार-प्रक्रिया और उसके निष्कर्षों से कुछ बहुमूल्य चीज़ें सीखने को मिलेंगी।
इन विचारों से देश की व्यापक जनता को, विशेषकर उन करोड़ों जागरूक, विद्रोही, सम्भावनासम्पन्न युवाओं को परिचित कराना आवश्यक है जिनके कन्धे पर भविष्य-निर्माण का कठिन ऐतिहासिक दायित्व है। इसी उदेश्य से भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़ों का यह संकलन प्रस्तुत है।
आयरिश क्रान्तिकारी डान ब्रीन की पुस्तक के भगतसिंह द्वारा किये गये अनुवाद और उनकी जेल नोटबुक के साथ ही, भगतसिंह और उनके साथियों और सभी 108 उपलब्ध दस्तावेज़ों को पहली बार एक साथ प्रकाशित किया गया है। इसके बावजूद ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ?’ जैसे कर्इ महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ों और जेल नोटबुक का जिस तरह आठवें-नवें दशक में पता चला, उसे देखते हुए, अभी भी कुछ सामग्री यहाँ-वहाँ पड़ी होगी, यह मानने के पर्याप्त कारण मौजूद हैं। इसीलिए इस संकलन को ‘सम्पूर्ण दस्तावेज़’ के बजाय ‘सम्पूर्ण उपलब्ध’ दस्तावेज़ नाम दिया गया है।

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