भगतसिह की जेल नोटबुक जो शहादत के तिरसठ वर्षों बाद छप सकी

भगतसिह की जेल नोटबुक जो शहादत के तिरसठ वर्षों बाद छप सकी

आलोक रंजन

रूसी विद्वान एल.वी. मित्रोखिन वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने 1981 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘Lenin and India’ में पहली बार, एक अलग अध्याय में, भगतसिह की दुर्लभ जेल नोटबुक से विस्तृत हवाले देते हुए उनके द्वारा अन्तिम दिनों में किये गये क्रान्तिकारी और मार्क्सवादी साहित्य के गहन अध्ययन पर प्रकाश डाला था और उन योजक-सूत्रों को संयोजित करने की कोशिश की थी, जो भगतसिह के चिन्तन के संघटक अवयव थे।

भगतसिह और उनके साथियों ने 1928 में ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ की स्थापना के समय ही समाजवाद को लक्ष्य और सिद्धान्त के रूप में स्वीकार कर लिया था, पर कमोबेश 1929 के मध्य तक समाजवाद और मार्क्सवाद के प्रति उनका लगाव भावात्मक ही था, बुद्धिसंगत नहीं। भगतसिह के सहयोगी क्रान्तिकारी शिववर्मा सहित अनेक इतिहासकारों ने इस बात का उल्लेख किया है कि 1929 में गिरफ्तारी के बाद एच.एस.आर.ए. के युवा क्रान्तिकारियों के एक धड़े ने, और विशेषकर भगतसिह ने जेल में बड़ी मुश्किलों से जुटाकर, क्रान्तिकारी साहित्य और मार्क्सवाद का गहन अध्ययन और उस पर विचार-विमर्श किया। इसके परिणामस्वरूप वे अराजकतावादी और मध्यवर्गीय दुस्साहसवाद को छोड़कर तेज़ी से सर्वहारा क्रान्ति के मार्क्सवादी सिद्धान्तों को अपनाने की दिशा में आगे बढ़े। वैयक्तिक शौर्य एवं बलिदान से जनता को जगाने और आतंकवादी रणनीति द्वारा उपनिवेशवाद के विरुद्ध संघर्ष का रास्ता छोड़कर उन्होंने अपने अतीत की आलोचना व समाहार किया तथा इस बात पर बल दिया कि क्रान्ति की मुख्य शक्ति मज़दूर और किसान हैं, साम्राज्यवाद को केवल सर्वहारा क्रान्ति द्वारा ही शिकस्त दी जा सकती है, मुख्यतः पेशेवर क्रान्तिकारियों पर आधारित सर्वहारा वर्ग की क्रान्तिकारी पार्टी के मार्गदर्शन में व्यापक मेहनतकश जनता व मध्यवर्ग के जनसंगठन खड़ा करके जनान्दोलन का मार्ग अपनाया जाना चाहिए और यह कि, इसके बाद ही सशस्त्र क्रान्ति द्वारा सत्ता पलटकर सर्वहारा अधिनायकत्व की स्थापना की जा सकती है। एच.एस.आर.ए. के सिद्धान्तकारों में भगतसिह सर्वोपरि थे और उनकी पूरी विचार-यात्रा को 1929 से मार्च 1931 तक (यानी फाँसी चढ़ने तक) के उनके दस्तावेज़ों, लेखों, पत्रों और वक्तव्यों में देखा जा सकता है। भगतसिह के सर्वोन्नत विचार फ़रवरी 1931 के दो भाग के उस मसविदा दस्तावेज़ में देखने को मिलते हैं जो ‘क्रान्तिकारी कार्यक्रम का मसविदा’ नाम से ‘भगतसिह और उनके साथियों के दस्तावेज़’ (सं. – जगमोहन सिह, चमनलाल, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली) में संकलित है।

भगतसिह की जेल नोटबुक मिलने के बाद भगतसिह के चिन्तक व्यक्तित्व की व्यापकता और गहराई पर और अधिक स्पष्ट रोशनी पड़ी है, उनकी विकास की प्रक्रिया समझने में मदद मिली है और यह सच्चाई और अधिक पुष्ट हुई है कि भगतसिह ने अपने अन्तिम दिनों में, सुव्यवस्थित एवं गहन अध्ययन के बाद बुद्धिसंगत ढंग से मार्क्सवाद को अपना मार्गदर्शक सिद्धान्त बनाया था। एकबारगी तो यह बात अविश्वसनीय-सी लगती है कि क्रान्तिकारी जीवन और जेल की बीहड़ कठिनाइयों में भगतसिह ने ब्रिटिश सेंसरशिप की तमाम दिक्क़तों के बावजूद पुस्तकें जुटाकर इतना गहन और व्यापक अध्ययन कर डाला। महज 23 वर्ष की छोटी-सी उम्र में चिन्तन का जो धरातल उन्होंने हासिल कर लिया था, वह उनके युगद्रष्टा युगपुरुष होने का ही प्रमाण था। ऐसे महान चिन्तक ही इतिहास की दिशा बदलने और गति तेज़ करने का माद्दा रखते हैं। भगतसिह की शहादत भारतीय जनता को आज भी क्षितिज पर अनवरत जलती मशाल की तरह प्रेरणा देती है, पर यह भी सच है कि उनकी फाँसी ने इतिहास की दिशा बदल दी। यह सोचना ग़लत नहीं है कि भगतसिह को 23 वर्ष की अल्पायु में यदि फाँसी नहीं हुई होती तो राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष का इतिहास और भारतीय सर्वहारा क्रान्ति का इतिहास शायद कुछ और ही ढंग से लिखा जाता।

बहरहाल, इतिहास की उतनी ही दुखद विडम्बना यह भी है कि आज भी इस देश के शिक्षित लोगों का एक बड़ा हिस्सा भगतसिह को एक महान वीर तो मानता है, पर यह नहीं जानता कि 23 वर्ष का वह युवा एक महान चिन्तक भी था। राजनीतिक आज़ादी मिलने के पचास वर्षों बाद भी सम्पूर्ण गाँधी वाङमय, नेहरू वाङमय से लेकर सभी राष्ट्रपतियों के अनुष्ठानिक भाषणों के विशद्ग्रन्थ तक प्रकाशित होते रहे पर किसी भी सरकार ने भगतसिह और उनके साथियों के सभी दस्तावेज़ों को अभिलेखागार, पत्र-पत्रिकाओं और व्यक्तिगत संग्रहों से निकालकर छापने की सुध नहीं ली।

छिटपुट पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित लेखों, अजय कुमार घोष, शिव वर्मा, सोहन सिह जोश, जितेन्द्र नाथ सान्याल आदि भगतसिह के समकालीन क्रान्तिकारियों की विभिन्न पुस्तकों-लेखों, भगतसिह के अनुज की पुत्री वीरेन्द्र सिन्धु की पुस्तकों तथा गोपाल ठाकुर, जी. देवल, मन्मथनाथ गुप्त, बिपन चन्द्र, हंसराज रहबर, कमलेश मोहन आदि इतिहासकारों-लेखकों के विभिन्न लेखों एवं पुस्तकों से भगतसिह के विचारक व्यक्तित्व पर रोशनी अवश्य पड़ती रही है, पर बहुसंख्यक शिक्षित आबादी भी इससे बहुत कम ही परिचित रही है। भगतसिह के कुछ ऐतिहासिक बयानों-दस्तावेज़ों को सत्तर के दशक के पूर्वार्द्ध में दिल्ली से कुछ क्रान्तिकारी वामपन्थी संस्कृतिकर्मियों की पहल पर प्रकाशित होने वाली ‘मुक्ति’ पत्रिका ने प्रकाशित किया। इसके बाद कई पत्रिकाओं ने और क्रान्तिकारी ग्रुपों ने पुस्तिकाओं के रूप में भगतसिह के चुने हुए कुछ लेखों को छापने का काम किया। भगतसिह के साथी शिववर्मा ने उनके चुनिन्दा लेखों का संकलन अंग्रेज़ी और हिन्दी में प्रकाशित किया।

सबसे पहले जगमोहन सिह (भगतसिह की बहन के पुत्र) और चमनलाल ने भगतसिह और उनके साथियों के अधिकांश वक्तव्यों, लेखों, पत्रों और दस्तावेज़ों को एक जगह संकलित किया (हालाँकि यह संकलन भी सम्पूर्ण नहीं है) जो 1986 में राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुआ।

इस तथ्य की चर्चा भगतसिह के कई साथियों और इतिहासविदों ने की है कि जेल में उन्होंने चार और पुस्तकें लिखी थीं: ‘आत्मकथा’, ‘समाजवाद का आदर्श’, ‘भारत में क्रान्तिकारी आन्दोलन’ तथा ‘मृत्यु के द्वार पर’। दुर्भाग्यवश इनकी पाण्डुलिपियाँ आज उपलब्ध नहीं हैं और माना यही जाता है कि वे नष्ट हो चुकी हैं। हालाँकि इनके ग़ायब होने की कहानी भी रहस्यमय है और इसमें भी किसी साजिश से पूरी तरह इन्कार नहीं किया जा सकता। बहरहाल, यह भारतीय इतिहास के सर्वाधिक दुर्भाग्यपूर्ण प्रसंगों में से एक है।

अब हम भगतसिह की उस ऐतिहासिक जेल नोटबुक की चर्चा पर आते हैं जो पहली बार 1993 में जयपुर से ‘इण्डियन बुक क्रॉनिकल’ से ‘A Martyrs Notebook’ नाम से प्रकाशित हुई। इसका सम्पादन भूपेन्द्र हूजा ने किया था। इस डायरी के प्रारम्भ में दी गयी परिचयात्मक टिप्पणी के अनुसार, इसकी हस्तलिखित/ डुप्लीकेटेड प्रतिलिपि एक पैकेट के रूप में पहली बार जी.बी. कुमार हूजा (गुरुकुल कांगड़ी, हरिद्वार के तत्कालीन कुलपति) को 1981 में गुरुकुल, इन्द्रप्रस्थ के दौरे के समय स्वामी शक्तिवेश से मिली थी।

पर इससे भी पहले यह डायरी 1977 में एल.वी. मित्रोखिन ने फ़रीदाबाद में रह रहे भगतसिह के भाई कुलबीर सिह के पास देखी थी और उसका विस्तृत अध्ययन करके एक लेख लिखा था, जो 1981 में अंग्रेज़ी में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘Lenin and India’ में एक अध्याय के रूप में शामिल किया गया। पुनः 1990 में इस पुस्तक का हिन्दी अनुवाद भी प्रगति प्रकाशन, मास्को से ‘लेनिन और भारत’ नाम से प्रकाशित हुआ।

अब तक इस डायरी के सम्बन्ध में प्राप्त जानकारी को हम यहाँ सिलसिलेवार प्रस्तुत कर रहे हैं।

1968 में भारतीय इतिहासकार जी. देवल ने ‘पीपुल्स पाथ’ पत्रिका में भगतसिह पर एक लेख लिखा था जिसमें 200 पन्नों की एक कापी का ज़िक्र किया गया है। उक्त कापी में पूँजीवाद, समाजवाद, राज्य की उत्पत्ति, मार्क्सवाद, कम्युनिज़्म, धर्म, दर्शन, क्रान्तियों के इतिहास आदि पर विभिन्न पुस्तकों के अध्ययन के दौरान भगतसिह द्वारा जेल में लिये गये नोट्स हैं। यह नोटबुक भगतसिह की फाँसी के बाद उनके परिवार वालों को सौंप दी गयी थी। देवल ने इसे फ़रीदाबाद में रह रहे भगतसिह के छोटे भाई कुलबीर सिह के पास देखा था और अध्ययन करके नोट्स लिये थे। अपने लेख में देवल ने इस बात पर ज़ोर दिया कि यह डायरी प्रकाशित की जानी चाहिए, पर ऐसा हुआ नहीं।

उक्त डायरी की जानकारी होने पर 1977 में रूसी विद्वान मित्रोखिन भारत आये और कुलबीर सिह के हवाले से उक्त डायरी के विस्तृत अध्ययन के बाद एक लेख लिखा जो उनकी पुस्तक ‘Lenin and India’ का एक अध्याय बना।

हमें उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 1979 के बाद इतिहास के कई शोधार्थियों ने 404 पृष्ठों की उक्त जेल नोटबुक की एक फ़ोटो प्रतिलिपि तीन मूर्ति भवन स्थित जवाहर लाल नेहरू मेमोरियल म्यूज़ियम व लायब्रेरी में भी देखी-पढ़ी। पर इस पर अलग से कोई शोध निबन्ध कहीं भी प्रकाशित नहीं हुआ।

गुरुकुल कांगड़ी के तत्कालीन कुलपति जी.बी. कुमार हूजा 1981 में गुरुकुल इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली से 20 किलोमीटर दक्षिण तुगलकाबाद रेलवे स्टेशन के निकट) के दौरे पर गये थे। वहाँ संस्था के तत्कालीन मुख्य अधिष्ठाता स्वामी शक्तिवेश ने गुरुकुल के ‘हॉल ऑफ़ फ़ेम’ के तहख़ाने में सुरक्षित इस ऐतिहासिक धरोहर की एक हस्तलिखित/डुप्लीकेटेड प्रतिलिपि दिखलायी, जिसे जी.बी. कुमार हूजा ने कुछ दिनों के लिए माँग लिया। बाद में स्वामी शक्तिवेश की हत्या हो गयी और उक्त डायरी (प्रतिलिपि) हूजा जी के पास ही रह गयी।

1989 में भगतसिह की शहादत के दिन 23 मार्च को जयपुर में कुछ बुद्धिजीवियों ने ‘हिन्दोस्तानी मंच’ का गठन किया। उसी की प्रारम्भिक बैठकों में जी.बी. कुमार हूजा ने भगतसिह की जेल डायरी की जानकारी दी और ‘हिन्दोस्तानी मंच’ ने इसे प्रकाशित करने का निश्चय किया।

‘इण्डियन बुक क्रॉनिकल’ पत्रिका (जयपुर) के सम्पादक भूपेन्द्र हूजा को इस परियोजना के सम्पादन की ज़िम्मेदारी दी गयी और ‘हिन्दोस्तानी मंच’ के महासचिव सरदार ओबेराय, प्रो. आर.पी. भटनागर और डॉ. आर.सी. भारतीय ने उनके सहयोगी की भूमिका निभायी। दुर्भाग्यवश, अर्थाभाव के कारण यह योजना खटाई में पड़ गयी।

इसी दौरान डॉ. आर.सी. भारतीय को उक्त जेल नोटबुक की एक और टाइप की हुई प्रतिलिपि प्राप्त हुई जो एक स्थानीय विद्वान डॉ. प्रकाश चतुर्वेदी मास्को अभिलेखागार से फ़ोटो-प्रतिलिपि कराकर लाये थे। ‘मास्को प्रति’ और ‘गुरुकुल प्रति’ शब्दशः एक-दूसरे से मिल रहे थे।

1991 में भूपेन्द्र हूजा ने नोटबुक को किश्तों में अपनी पत्रिका ‘इण्डियन बुक क्रॉनिकल’ में प्रकाशित करना शुरू किया। भगतसिह की जेल नोटबुक इस रूप में पहली बार व्यापक पाठक समुदाय तक पहुँची। डॉ. चमनलाल ने भी भूपेन्द्र हूजा को सूचित किया कि उक्त नोटबुक की एक प्रतिलिपि उन्होंने भी नेहरू म्यूजियम लायब्रेरी, नई दिल्ली में देखी थी।

इस तरह भूपेन्द्र हूजा व उनके सहयोगियों की नज़र में उक्त जेल नोटबुक की आधिकारिकता और अधिक पुष्ट हुई। पहली बार 1994 में उक्त जेल नोटबुक ‘इण्डियन बुक क्रॉनिकल’ की ओर से ही भूपेन्द्र हूजा और जी.बी. कुमार हूजा (बलभद्र भारती) की भूमिकाओं के साथ पुस्तकाकार प्रकाशित हुई। उक्त दोनों भूमिकाओं से भी स्पष्ट है कि जी.बी-कुमार हूजा और भूपेन्द्र हूजा को इस तथ्य की जानकारी नहीं थी कि उक्त डायरी की मूल प्रति भगतसिह के भाई कुलबीर सिह के पास फ़रीदाबाद में भी मौजूद है। उन्हें जी. देवल के उस लेख की भी सम्भवतः जानकारी नहीं थी जिन्होंने सबसे पहले 1968 में यह तथ्य उद्घाटित किया था, न ही उन्हें मित्रोखिन का वह लेख (1981) ही मिला था जो उक्त डायरी के विशद अध्ययन के बाद लिखा गया था।

बहरहाल, मित्रोखिन ने कुलबीर सिह के पास उपलब्ध नोटबुक/डायरी से लिये गये हवालों पर जो पृष्ठ अंकित किये हैं, उन्हें देखने से स्पष्ट हो जाता है कि जी.बी. कुमार हूजा को प्राप्त ‘गुरुकुल टेक्स्ट’ उक्त मूल डायरी की ही डुप्लीकेट/हस्तलिखित प्रतिलिपि है।

ऐसा सम्भव है कि डॉ. प्रकाश चतुर्वेदी ने डायरी/नोटबुक की जो प्रतिलिपि मास्को अभिलेखागार में देखी थी, वह मित्रोखिन ही भारत से ले गये हों। या यह भी हो सकता है कि किसी और रूसी विद्वान ने भी डायरी का अध्ययन किया हो।

बहरहाल, इन तथ्यों से डायरी की आधिकारिकता ही और अधिक पुष्ट होती है।

‘भगतसिह और उनके साथियों के दस्तावेज़’ पुस्तक के सम्पादक-द्वय जगमोहन सिह और चमनलाल ने भी पुस्तक के दूसरे संस्करण की भूमिका (23 मार्च ’89) में लिखा है: “भगतसिह की जेल में लिखित 404 पृष्ठों की डायरी, जिसमें महत्त्वपूर्ण राजनीतिक व दार्शनिक नोट्स हैं, अब भी सामान्य पाठकों की पहुँच से बाहर है, हालाँकि इसकी फ़ोटो प्रति तीन मूर्ति स्थित जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल म्यूज़ियम व लायब्रेरी में सुरक्षित है। इस पर क्या कहा जा सकता है, पाठक स्वयं ही सोचें।”

इस टिप्पणी से ऐसा लगता है कि जगमोहन सिह और चमनलाल को भी यह तथ्य ज्ञात नहीं था कि भगतसिह की मूल जेल नोटबुक उनके भाई कुलबीर सिह के पास मौजूद है, जिसका अध्ययन 1968 में जी. देवल ने और 1977 में मित्रोखिन ने किया था। यह विशेष आश्चर्य की बात इसलिए भी है क्योंकि जगमोहन सिह भी स्वयं भगतसिह के परिवार के सदस्य हैं। वे भगतसिह की बहन बीबी अमर कौर के पुत्र हैं। भगतसिह के दूसरे भाई कुलतार सिह की पुत्री वीरेन्द्र सिन्धू ने भी भगतसिह पर दो पुस्तकें लिखी हैं। उन्होंने भी इसका उल्लेख नहीं किया है कि भगतसिह की जेल नोटबुक उनके परिवार के ही एक सदस्य के पास मौजूद है। यदि इन परिवार-जनों को भी यह तथ्य नहीं पता था तो इस बारे में हमें कुछ नहीं कहना। न ही इसकी अन्तर्कथा को जानने में हमारी कोई रुचि है।

यह सवाल हम यहाँ इसलिए उठा रहे हैं कि यह भारत में इतिहास की एक गम्भीर समस्या है। आज़ाद भारत की कांग्रेसी सरकार ही नहीं, किसी भी पूँजीवादी संसदमार्गी दल से हम यह अपेक्षा नहीं रखते कि उनकी सरकारें भगतसिह के विचारों को जनता तक पहुँचाने का काम करेंगी। उनका बस चलता तो वे भगतसिह की स्मृति तक को दफ़्न कर देतीं। पर यह उनके बस के बाहर की बात है।

लेकिन शहीदे-आजम भगतसिह के परिवार-जनों का उनकी वैचारिक विरासत के बारे में जो रुख रहा, उसके बारे में क्या कहा जाये? सीधा सवाल यह है कि कुलबीर सिह के पास यदि भगतसिह की जेल नोटबुक मौजूद थी, तो उन्होंने उसे भारतीय जनता तक पहुँचाने के लिए क्या कोशिश की? उन्होंने अख़बारों में, इतिहासकारों को पत्र लिखकर इसे छपाने और जनता तक पहुँचाने की कोई कोशिश क्यों नहीं की? क्या इसे प्रकाशित करने के लिए प्रकाशक नहीं मिलते? या जनता से स्रोत-संसाधन नहीं जुटते? हमारी जानकारी के अनुसार, शहीदेआजम के परिवार के लोग स्वयं भी इतने विपन्न नहीं हैं। उन्हें यदि भगतसिह के आदर्शों से प्यार होता और उनके विचारों को जन-जन तक पहुँचाने की चिन्ता होती तो वे उक्त डायरी स्वयं छपवा सकते थे। आश्चर्य तो तब होता है जब लगता है कि जेल नोटबुक के कुलबीर सिह के पास उपलब्ध होने का तथ्य स्वयं जगमोहन सिह या वीरेन्द्र सिन्धू को ही नहीं पता था। क्या यह एक शर्मनाक विडम्बना नहीं है कि भगतसिह की जेल नोटबुक पर आधारित पहला विस्तृत शोध-निबन्ध 1981 में एक रूसी विद्वान मित्रोखिन की पुस्तक में संकलित होकर सामने आया? वैसे इस काहिली और ग़ैरज़ि‍म्मेदारी के लिए उन इतिहासकारों को भी माफ़ नहीं किया जा सकता जो इतिहास को केवल प्रोफ़ेसरी का जरिया बनाये हुए हैं और इतिहास की बहुमूल्य विरासत को भी जनता तक पहुँचाने की जिन्हें रत्तीभर चिन्ता नहीं है। और भला क्यों हो? वे इतिहास पढ़ाने वाले मुदर्रिस हैं, इतिहास बनाने से उनका भला क्या सरोकार?

जहाँ तक भगतसिह के परिवार के उन सदस्यों का सवाल है, जिन्होंने आज़ादी के इतने वर्षों बाद तक इतिहास की एक बहुमूल्य धरोहर को पारिवारिक सम्पत्ति की तरह दाबे रखा और उसे जनता तक पहुँचाने की कोई कोशिश नहीं की; वे भी अपनी इस करनी के चलते इतिहास में अपना नाम दर्ज करा चुके हैं। वैसे हमारे देश में यह कोई नई बात नहीं है। क्रान्तिकारी राजनीति और साहित्य में ऐसे कई उदाहरण हैं कि महान विभूतियों के रक्त-सम्बन्धी उत्तराधिकारी उनसे जुड़े होने के नाते इज़्ज़त तो ख़ूब पा रहे हैं पर उनके आदर्शों और सपनों से उन्हें कुछ भी नहीं लेना-देना। उनकी रुचि या तो सम्मान-प्रतिष्ठा-सुविधा में है या फिर रायल्टी की मोटी रक़म में। भगतसिह हों या राहुल सांकृत्यायन, उनका कृतित्व आज पूरे राष्ट्र की, पूरी जनता की या उनके वैचारिक उत्तराधिकारियों की धरोहर न बनकर परिवार-जनों की निजी सम्पत्ति बन गयी है। क्रान्तिकारियों के तमाम बेटे-भतीजे-भांजे आज क्रान्तिकारियों के रक्त-सम्बन्धी होने के नाते स्वाभाविक तौर पर जनता से इज़्ज़त पाते हैं और सीना फुलाते हैं। पर उन्हें इस बात में कोई दिलचस्पी नहीं कि क्या उन क्रान्तिकारियों के सपने पूरे हुए? इसके विपरीत वे उसी सत्ता से सुविधाएँ लेने और उन्हीं राजनीतिक दलों की राजनीति करने तक का काम करते हैं, जिन्होंने क्रान्तिकारियों के सपनों के साथ विश्वासघात किया। क्रान्तिकारियों के ऐसे वारिस भी क्या अपने महान पूर्वजों के आदर्शों का व्यापार नहीं कर रहे हैं?

बहरहाल, 1994 में भूपेन्द्र हूजा और उनके साथियों ने भगतसिह की जेल नोटबुक का मूल अंग्रेज़ी संस्करण छापकर भारत की जनता और क्रान्तिकारी आन्दोलन के लिए जो उपयोगी कार्य किया उसे कभी भी भुलाया नहीं सकता।

आम जनता को इतिहास की बहुमूल्य धरोहर से परिचित कराने के महत्त्वपूर्ण कार्यभारों में से यह भी एक है कि भगतसिह की जेल नोटबुक और उनके तथा उनके साथियों के सभी दस्तावेज़ों को सभी भारतीय भाषाओं में अनूदित करके जन-जन तक पहुँचाया जाये।

भगतसिह की जेल नोटबुक स्कूली कापी की सामान्य साइज (17.50 से.मी. x 21 से.मी,) की पुस्तिका है। नोटबुक खोलते ही पहले पेज (टाइटिल पेज) पर अंग्रेज़ी में लिखा है: ‘‘भगतसिह के लिए/चार सौ चार (404) पृष्ठ…’’ नीचे एक हस्ताक्षर है और 12-9-29 की तिथि दी गयी है। स्पष्ट है कि यह प्रविष्टि जेल अधिकारियों द्वारा भगतसिह को कापी देते समय की गयी है। जेल मैनुअल/ नियमावली के जानकार जानते होंगे कि जब भी कोई क़ैदी लिखने के लिए कापी माँगता है तो जेल अधिकारी को कापी के शुरू और अन्त में ऐसा लिखना होता है और क़ैदी को भी प्राप्त करते समय वहाँ हस्ताक्षर करना होता है। भगतसिह के हस्ताक्षर (अंग्रेज़ी में) टाइटिल पेज पर भी मौजूद हैं और 12-9-29 की तिथि के साथ कापी के अन्त में भी। नोटबुक की जो डुप्लीकेटेड/हस्तलिखित प्रतिलिपि

जी.बी. कुमार हूजा को गुरुकुल इन्द्रप्रस्थ में मिली, उसमें नीचे बायें कोने पर अंग्रेज़ी में यह भी लिखा हुआ था: “प्रतिलिपि शहीद भगतसिह के भतीजे अभय कुमार सिह द्वारा तैयार।”

मूल नोटबुक के पृष्ठ भगतसिह की छोटे अक्षरों वाली लिखाई से भरे हुए हैं। ज्यादा नोट्स अंग्रेज़ी में लिये गये हैं, लेकिन कहीं-कहीं उर्दू का भी इस्तेमाल किया गया है।

 

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