शहीदों के जो ख़्वाब अधूरे, इसी सदी में होंगे पूरे!

शहीदे-आज़म भगतसिंह, राजगुरू और सुखदेव के 86 वें शहादत दिवस के अवसर पर 15 दिवसीय शहीद यादगारी अभियान

शहीदों के जो ख़्वाब अधूरे, इसी सदी में होंगे पूरे!
इसी सदी में नये वेग से, परिवर्तन का ज्वार उठेगा!!

हम समय के युद्धबन्दी हैं
युद्ध तो लेकिन अभी हारे नहीं हैं हम।
लालिमा है क्षीण पूरब की
पर सुबह के बुझते हुए तारे नहीं हैं हम।

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चलो, अब समय के इस लौह कारागार को तोड़ें
चलो, फि़र ज़ि‍न्दगी की धार अपनी शक्ति से मोड़ें
पराजय से सबक लें, फि़र जुटें, आगे बढ़ें फि़र हम!

-शशिप्रकाश

साथियो, आज हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जब प्रतिक्रिया की काली ताकतों ने चारों ओर से हमला बोल दिया है। जनता के जीवन को नर्ककुण्ड में धकेला जा रहा है। लोग संगठित न हो सकें इसलिए कट्टरपंथ, साम्प्रदायिकता व अन्धराष्ट्रवाद आदि का ज़हर लोगों के दिमाग में भरा जा रहा है। तर्क, प्रगतिशील विचारों व मानवता को आगे ले जाने वाले मूल्यों पर संगठित हमले जारी हैं। दूसरी ओर हर अन्याय के ख़िलाफ़ लड़ने वाले नौजवानों के दिल इस समय बर्फ की ठंडक में डूबे हुए हैं। बेहतर भविष्य के लिए उड़ान भरने वाले उनके पंख कीचड़ में लिथड़े हुए हैं। ऐसे वक़्त में भगतसिंह के शब्दों में ‘क्रान्ति की स्पिरिट ताज़ा करने के लिए ताकि इंसानियत की रूह में हरकत पैदा हो’ हम शहीदे-आज़म भगतसिंह, राजगुरू और सुखदेव के शहादत दिवस पर उनके सपनों को याद कर रहे हैं और उन्हें पूरा करने के लिए नौजवानों का आह्वान कर रहे हैं।

क्या था भगतसिंह, राजगुरू और सुखदेव का सपना?

भगतसिंह का सपना केवल अंग्रेजों को देश से भगाना नहीं था। बल्कि उनका सपना हज़ारों साल से चली आ रही अमीरी व गरीबी की व्यवस्था को इतिहास के कूड़ेदान में फेंककर समता और न्याय पर आधारित समाज बनाकर एक नये युग का सूत्रपात करना था। 1930 में ही भगतसिंह ने कहा था कि हम एक इंसान द्वारा दूसरे इंसान व एक देश द्वारा दूसरे देश के शोषण के ख़िलाफ़ हैं। कांग्रेस व गाँधी के वर्ग-चरित्र और धनिकों व भूस्वामियों पर उनकी निर्भरता को देखते हुए भगतसिंह ने चेतावनी दी थी कि इनका मक़सद लूटने की ताक़त गोरों के हाथ से लेकर मुट्ठी भर भारतीय लुटेरों के हाथ में सौंपना है। इसीलिए इनकी लड़ाई का अन्त किसी न किसी समझौते के रूप में होगी। भगतसिंह ने 6 जून 1929 को दिल्ली के सेशन जज लियोनार्ड मिडिलटन की अदालत में अपने ऐतिहासिक बयान में कहा था कि-क्रान्ति से हमारा अभिप्राय है मुट्ठी भर परजीवी जमातों द्वारा आम जनता की मेहनत की लूट पर आधारित, अन्याय पर आधारित मौजूदा व्यवस्था में आमूल परिवर्तन। समाज का प्रमुख अंग होते हुए भी आज मज़दूरों को उनके प्राथमिक अघिकार से वंचित रखा जा रहा है और उनकी कमाई का सारा धन शोषक पूँजीपति हड़प जाते हैं। दूसरों के अन्नदाता किसान अपने परिवार सहित दाने-दाने के लिए मोहताज हैं। दुनिया भर के बाज़ारों को कपड़ा मुहैया करने वाला बुनकर अपने तथा अपने बच्चों के तन ढंकने भर को भी कपड़ा नहीं पर रहा है। सुन्दर महलों का निर्माण करने वाले राजगीर, लोहार तथा बढ़ई स्वयं गन्दे बाड़ों में रहकर ही अपनी जीवन लीला समाप्त कर जाते हैं। इसके विपरीत समाज के जोंक शोषक पूँजीपति ज़रा-ज़रा सी बातों के लिए लाखों का वारा-न्यारा कर देते हैं। भगतसिंह ने पहले से चले आ रहे संगठन एच.आर.ए. में 1928 में फिरोजशाह कोटला मैदान में हुए क्रान्तिकारियों की बैठक में संगठन के नाम में ‘सोशलिस्ट’ शब्द जोड़ते हुए एक समतामूलक समाज के निर्माण को संगठन का मक़सद घोषित किया।

भगतसिंह और उनके साथी ऐसा समाज बनाना चाहते थे जिसमें जाति और धर्म के नाम पर झगड़े न हों। भगतसिंह ने जब देश के युवाओं को संगठित करने के लिए ‘नौजवान भारत सभा’ का गठन किया तो इस बात का विशेष ख़्याल रखा। भगतसिंह का संगठन शुरू से ही धर्मनिरपेक्ष संगठन था। नौजवानों के बीच धार्मिक व जातिगत बँटवारे को रोकने के लिए विचारों के प्रचार-प्रसार के अलावा सहभोज जैसे कार्यक्रम हमेशा आयोजित किये जाते थे। अंग्रेज जहाँ एक ओर आज़ादी की लड़ाई को कमज़ोर करने के लिए हिन्दू व मुसलमानों को आपस में लड़ा रहे थे वहीं हिन्दू महासभा और तबलीगी जमात जैसे कट्टरपंथी संगठन भी हिन्दू-मुस्लिम के झगड़े पैदा करके अंग्रेजों की प्रकारान्तर से मदद कर रहे थे। भगतसिंह ने लोगों को आपस में लडने से रोकने के लिए लोगों के बीच वर्ग-चेतना पैदा करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि-लोगों को परस्पर लड़ने से रोकने के लिए वर्ग चेतना की ज़रूरत होती है। गरीब मेहनतक़श व किसानों को स्पष्ट समझा देना चाहिए कि तुम्हारे असली दुश्मन पूँजीपति हैं। इसलिए तुम्हें इनके हथकण्डांे से बचकर रहना चाहिए और इनके हत्थे चढ़कर कुछ न करना चाहिए। भगतसिंह जैसे क्रान्तिकारियों के विचारों को भारत के शासक वर्ग ने न केवल धूल व राख के नीचे दबाने की घृणित साज़िश रची, अपितु उन्हें बन्दूक-पिस्तौल वाले नौजवान के रूप में जनता में स्थापित कर दिया है। जबकि अपने आरम्भिक क्रान्तिकारी दिनों को छोड़कर भगतसिंह जनता को जगाने व उनके व्यापक संगठित ताकत के जरिये ही क्रान्ति करने के प्रबल समर्थक थे। जेल से भेजे गये विद्यार्थियों के नाम पत्र में उन्होंने लिखा-इस समय हम नौजवानों से यह नहीं कह सकते कि वे बम और पिस्तौल उठायें। आज विद्यार्थियों के सामने इससे भी महत्वपूर्ण काम हैं। …नौजवानों को क्रान्ति का यह सन्देश देश के कोने-कोने में पहुँचाना है, फैक्ट्री-कारखानों के क्षेत्रों में, गन्दी बस्तियों और गाँवों की जर्जर झोपड़ियों में रहने वाले करोड़ों लोगों में इस क्रान्ति की अलख जगानी है जिससे आज़ादी आयेगी और तब एक मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य का शोषण असम्भव हो जायेगा। भगतसिंह ने देशी-विदेशी लूट को ख़त्म करना अपना लक्ष्य बताया था। फांसी पर चढ़ने से तीन पहले पंजाब के गवर्नर को लिखे एक पत्र में उन्हांेने कहा-निकट भविष्य में यह युद्ध अन्तिम रूप में लड़ा जायेगा। साम्राज्यवाद और पूँजीवाद कुछ समय के मेहमान हैं। यही वह युद्ध है जिसमें हमने प्रत्यक्ष रूप में भाग लिया है। हम इसके लिए अपने पर गर्व करते हैं। इस युद्ध को न तो हमने शुरू किया है, न यह हमारे जीवन के साथ समाप्त ही होगा।

यह कैसी आज़ादी है यह किसकी आज़ादी है, जनता के हिस्से में केवल लूट और बर्बादी है।

आज़ादी के इतने सालों में शासक वर्गों द्वारा जनता को धीरे-धीरे को नर्ककुण्ड में धकेल दिया गया है। “विकास” की सच्चाई यह है कि देश की ऊपर की 1 फीसदी आबादी के पास देश की कुल सम्पदा का 58.4 फीसदी हिस्सा इकट्ठा हो चुका है और अगर ऊपर की 10 फीसदी आबादी को लें तो यह आंकड़ा 80.7 फीसदी तक पहुँच जाता है। दूसरी ओर नीचे की 50 फीसदी आबादी के पास कुल सम्पदा का महज 1 फीसदी है। देश के गोदामों में अनाज सड़ने के बावजूद प्रतिदिन लगभग 9000 बच्चे कुपोषण व स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं से मर जाते हैं। यूनीसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक कुपोषण का शिकार दुनिया का हर तीसरा बच्चा भारत का है। 50 प्रतिशत औरतें खून की कमी की शिकार हैं। ‘जनसंख्या स्थिरता कोष’ के मुताबिक 10000 में से 301 महिलाओं की प्रसव के दौरान मृत्यु होती है। सरकारी नीतियों के कारण होने वाली मौतें आतंकी घटनाओं से होने वाली मौतों की तुलना में कई हजार गुना हैं। लेकिन इन मौतों पर नेताओं व मीडिया द्वारा साजिशाना चुप्पी बनी रहती है। 1 फरवरी को बजट पेश होने से पहले आर्थिक सर्वे की रिपोर्ट में यह बताया गया है कि हर साल औसतन 90 लाख लोग रोजी-रोटी की तलाश में अपना घर छोड़कर प्रवासी बन जाते हैं। जिनमें से ज़्यादातर मुम्बई, तिरूपुर, दिल्ली, बंगलुरू, लुधियाना आदि की गन्दी और बीमारी से भरी झोपड़पट्टियों में समा जाते हैं। आँकड़ों के मुताबिक देश की लगभग 36 करोड़ आबादी झुग्गी-झोपड़ियों और फुटपाथ पर रहने के लिए मजबूर है। मोदी सरकार ने 2014 में 6 करोड़ सस्ते मकान बनवाने की घोषणा की। फिर जून 2015 में इस दावे से हटते हुए 2022 तक 2 करोड़ मकान बनवाने की बात यानि हर साल लगभग 30 लाख मकान। लेकिन जुलाई 2016 में पता चला कि 1 साल में केवल 19255 मकान बने। इसी तरह हर वर्ष 2 करोड़ नये रोजगार पैदा करने के दावे की सच्चाई इसी से सामने आ जाती है कि बेरोजगारी की दर पिछले कई वर्षों से लगातार बढ़ते हुए 2015.16 में 7.3 प्रतिशत तक पहुँच गई। देश के लगभग 30 करोड़ लोग बेरोजगारी में धक्के खा रहे हैं। जनता की सुविधाओं में लगातार कटौती की जा रही है और अमीरज़ादों के अरबों रूपये के कर्ज राइट आफ (वास्तव में माफ़) किये जा रहे हैं। जनता को भटकाने के लिए तमाम नौटंकी की जा रही है। नोटबन्दी की नौटंकी सबसे हालिया नौटंकी थी। बिकाऊ मीडिया ने इस पर खूब वाहवाही की। जबकि ऑल इण्डिया मैन्यूफैक्चरर्स ऑर्गेनाईजेशन के सर्वे के मुताबिक नोटबन्दी के पहले 34 दिनों में ही लगभग 35 प्रतिशत श्रमिकों को अपनी आजीविका से हाथ धोना पड़ा। मार्च 2017 तक यह आंकड़ा 60 प्रतिशत तक पहुँच जाने का अनुमान है। नये नोटों को छापने में 15 से 20 हज़ार करोड़ रूपये खर्च आयेंगे। जाहिर है जनता को अपना बोझ बढ़ाने के लिए तैयार रहना पडे़ेगा। मोदी ने सत्ता में आते ही बचे-खुचे पब्लिक सेक्टर को लुटेरों को बेचना शुरू कर दिया है (वैसे आज़ादी के बाद जो अर्थतन्त्र अस्तित्व में आया था यह उसकी स्वाभाविक परिणति है)। स्टेशन पर चाय बेचने का ढोंग रचते हुए अब स्टेशन को ही निजी हाथों में बेचा जा रहा है। इसकी शुरुआत हबीबगंज रेलवे स्टेशन (मध्यप्रदेश) कर दिया गया है। आगे करीब 400 रेलवे स्टेशनों को p.p.p. (प्राइवेट पब्लिक पार्टनरशिप) के हवाले करने की योजना है।

भगतसिंह का ख़्वाब, इलेक्शन नहीं इंकलाब!

साथियो, चुनाव से यह स्थिति बदलने वाली नहीं है! पिछले 65-66 सालों से हम लगातार विभिन्न चुनावी मदारियों को चुनते आये हैं। लेकिन हर बार ढाक के तीन पात। साँपनाथ जाते हैं नागनाथ आते हैं। अगर चुनाव से कुछ बदलने होता तो इतने साल बहुत होते हैं। वास्तव में पूरी व्यवस्था है ही ऐसी कि इसमें आम जनता का कभी भला नहीं हो सकता। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। अभी उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव हुआ जिसमें भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। नवनिर्वाचित विधायकों में 116 आराधिक पृष्ठभूमि के हैं और 253 करोड़पति। वास्तव में हर विधानसभा क्षेत्र में लाखो-लाख लोग हैं, उसमें एक सामान्य आदमी चाह के इलेक्शन नहीं लड़ सकता। इलेक्शन लड़ते हैं पैसे वाले, गुण्डे मॉफिया और इनको मदद करते है पूँजीपति, ठेकेदार, भट्ठामालिक, बड़े-2 व्यापारी। इसलिए चाहे जो पार्टी हो उनसे यह उम्मीद करना व्यर्थ है कि वो लोगों के लिए काम करेंगे। वो सबसे पहले उनके लिए काम करेंगे जो उनके चुनाव प्रचार में खर्च किये थे। अब ये लोग जब जीत कर जायेंगे तो नियम कानून भी अमीरों के हित में बनायेंगे। यही वजह है कि अमीर और अमीर होते जा रहे हैं जबकि जनता और अधिक रसातल में धंसती जा रही है। मौजूदा नेताशाही, नौकरशाही, न्यायपालिका सब अमीरों के हित में काम करती है। इसलिए इस मशीनरी से जनता कोई उम्मीद नहीं कर सकती। भगतसिंह ने कहा था कि-हर मनुष्य को अपने श्रम का फल पाने-जैसा सभी प्रकार का अधिकार है और प्रत्येक राष्ट्र अपने मूलभूत प्राकृतिक संसाधनों का पूर्ण स्वामी है। अगर कोई सरकार जनता को उसके इन मूलभूत अधिकारों से वंचित रखती है तो जनता का केवल यह अधिकार ही नहीं बल्कि आवश्यक कत्र्तव्य भी बन जाता है कि ऐसी सरकार को समाप्त कर दे।

मीडिया को लोकतन्त्र का चौथा खम्भा कहा जाता है। पर मीडिया लूटतन्त्र के चौथे खम्भे के रूप में काम करती है। इसका कारण यह है कि मीडिया पर भी बड़े-बड़े धन्नासेठों का कब्जा है। जैसे जी-न्यूज़ भाजपा राज्यसभा सांसद सुभाष चन्द्रा का है, हिस्दुस्तान अखबार बिड़ला का है, राष्ट्रीय सहारा सुब्रत राय है आदि। इन चैनलों अखबारों से कैसे उम्मीद की जा सकती है ये जनता को सही बतायेंगे। सामानों के विज्ञापन के लिए अश्लीलता, फूहड़ता, फिल्मों के नाम पर मार-काट, गन्दगी, कार्यक्रम के नाम पर नेताओं की छवि चमकाना, साम्प्रदायिक घटना को ऐसे दिखाना कि जनता में द्वेष बढ़े आम बात बन गयी है। मीडिया की आज कोइ विश्वसनीयता नहीं बची है।

फासीवाद का उभार

आज पूरी दुनिया आर्थिक संकट के लाइलाज दौर से गुजर रही है। इस संकट की बुनियाद पर पूरी दुनिया में व हमारे देश में फासीवाद का संकट बहुत तेज़ से बढ़ रहा है। हिटलर और मुसोलिनी द्वारा रची गई विनाशलीला से पहली बार पूरी दुनिया फासीवाद व उसकी भयावहता से परिचित हुई। वास्तव में खुद पूँजीपतियों द्वारा पैदा किये गये आर्थिक संकट से जब मेहनतकशों के मेहनत की लूट से होने वाले मुनाफे की दर गिरने लगती है तो अपनी लूट को बरकरार रखने के लिए वो ऐसी ताकतों को मज़बूत करते हैं जो जनता को बुरी तरह से चूसने में उनकी मदद करें। जनता के असंतोष को कुचलने के लिए फासिस्ट बहुत सारे हथकण्डे अपनाते हैं। वो पूँजीवादी लूट को छिपाने के लिए “विकास” का ढिंढोरा पीटने, “बेहतर दिन लाने” आदि का खूब प्रचार करते हैं दूसरी ओर जनता के सामने नस्ल, धर्म और “राष्ट्र” आदि के नाम पर एक नकली दुश्मन खड़ा करते हैं। जैसे हिटलर ने पूँजीवादी लूट से तबाह हो रहे बेरोजगार युवाओं, निम्न मध्यम वर्ग, छोटे व्यापारियों-उद्योगपतियों, यहाँ तक कि मज़दूरों-किसानों की एक बड़ी संख्या की पिछड़ी चेतना का फायदा उठाते हुए उन्हें इस आधार पर लामबन्द करने में सफल हो गये कि सारी समस्या की जड़ यहूदी हैं। हिटलर सत्ता की मशीनरी के एक-एक हिस्से पर अपनी पकड़ बनाने में सफल रहा। उसके बाद जब फासिस्टों ने विनाश का तांडव रचा तो पढ़ीलिखी आबादी के एक बड़े हिस्से, निम्न मध्यवर्ग, छोटे व्यापारियों को यह पता चल गया कि हिटलर केवल बड़े उद्योगपतियों की सेवा कर रहा है लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। भारत में यही काम संघ परिवार कर रहा है। संघ परिवार के संस्थापक सदस्यों में से एक मुंजे ने फासीवादी कार्यप्रणाली सीखने के लिए इटली के फासीवादी नेता मुसोलिनी से मिला। संघ के गोलवरकर ने अपनी पुस्तक ‘बंच ऑफ़ थाट्स’ में हिटलर की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। संघ परिवार येन केन प्रकारेण मुस्लिमों को हिन्दुओं के दुश्मन के रूप में पेश करता है। युद्धोन्माद भड़काया जा रहा है। समाज के तथाकथित पढ़े-लिखे लोगों का एक बड़ा हिस्सा गुमराह है। जबकि वे इतिहास का ये सबक भूल गये हैं कि युद्ध में हमेशा जनता ही तबाह होती है। संघ परिवार का राजनीतिक संगठन भाजपा मोदी के नेतृत्व में जब अमीरजादों का फायदा बरकरार रखने के लिए जनता को मिलने वाली सब्सिडी में एक-एक करके कटौती कर रही है तो दूसरी ओर विरोध करने वाले लोगों व संगठनों पर देशद्रोह, आई एस आई आदि का ठप्पा लगाया जा रहा है। इस काम में मीडिया भी जमकर इनका साथ दे रही है। इनके अनुषंगी संगठन प्रगतिशील छात्रों व बुद्धिजीवियों पर हमले कर रहे हैं। जबकि अभी हाल ही में मध्यप्रदेश में भाजपा के आई.टी. सेल के कई सदस्य आई.एस.आई. से सम्बन्ध रखने की वजह से पकड़े गये हैं। पर मीडिया और सभी “देशप्रेमी” चुप हैं। तमाम संस्थाओं का भगवाकरण किया जा रहा है और पाठ्यक्रम बदला जा रहा है। नौजवानों को इसके ख़िलाफ़ उठना ही होगा नहीं तो देश भयानक तबाही की ओर बढ़ चुका है। जनता को यह बात समझाना ही होगा कि उनकी तबाही बर्बादी की वजह कोई देश या धर्म नहीं है बल्कि लूट व अन्याय पर टिकी मौजूदा व्यवस्था है।

साथियो, भगतसिंह और उनके साथियों से प्रेरणा लेते हुए हमें उठ खड़ा होना होगा। हम सभी इंसाफ़पसन्द नागरिकों, मेहनतकशों और छात्रों-नौजवानों की ओर अपना हाथ बढ़ा रहे हैं। देश में एक नयी शुरुआत हो चुकी है। भगतसिंह द्वारा बनाये ‘नौजवान भारत सभा’ को फिर से ज़िन्दा कर दिया गया है। देश के कई विश्वविद्यालयों, कॉलेजों में हम इन्हीं आदर्शों पर क्रान्तिकारी छात्र संगठन बना रहे हैं। मेहनतकशों के बीच भी काम शुरू किया जा चुका हैं, स्त्रियों व जागरुक नागरिकों के मंच व संगठन जगह-2 संगठित कर रहे हैं। इस विशाल देश को देखते हुए यह शुरुआत छोटी लग सकती है। लेकिन हर लम्बे सफर की शुरुआत एक उठाये गये पहले क़दम से ही होती है। दिशा यदि सही हो, संकल्प मज़बूत हो और सोच वैज्ञानिक हो, तो हवा के उठने वाले एक झोंके को चक्रवाती तूफान बनते देर नहीं लगती। यदि आप एक ज़िन्दा इंसान की तरह जीने और लड़ने को ज़िन्दगी का ढंग-ढर्रा बनाने को तैयार हैं तो हमसे ज़रूर सम्पर्क कीजिए।

नौजवान भारत सभा, दिशा छात्र संगठन, स्त्री मुक्ति लीग

 

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