नोटबन्दी, काला धन और परेशानहाल जनता – सोचने के लिए कुछ सवाल, जानने की कुछ बातें

नोटबन्दी, काला धन और परेशानहाल जनता – सोचने के लिए कुछ सवाल, जानने की कुछ बातें

साथियो,

पिछले 8 नवम्बर की रात से देशभर में अफ़रा-तफ़री का आलम है। बैंकों के बाहर सुबह से रात तक लम्बी-लम्बी कतारें लगी हैं, सारे काम छोड़कर लोग अपनी ही मेहनत और बचत के पैसे पाने के लिए धक्के खा रहे हैं। अस्पतालों में मरीज़ों का इलाज नहीं हो पा रहा है, खेती-किसानी के काम रुके हुए हैं, कामगारों को मज़दूरी नहीं मिल पा रही है, आम लोग रोज़मर्रा की मामूली ज़रूरतें तक पूरी नहीं कर पा रहे हैं। देश में कई जगह सदमे से लोगों की मौत तक हो जाने की ख़बरें आयी हैं। दिलचस्प बात यह है कि देश के बड़े पूँजीपतियों, व्यापारियों, अफ़सरशाहों-नेताशाहों, पि़फ़ल्मी अभिनेताओं में काले धन पर इस तथाकथित “सर्जिकल स्ट्राइक” से कोई बेचैनी या खलबली नहीं दिखायी दे रही है। जिनके पास काला धन होने की सबसे ज़्यादा सम्भावना है उनमें से कोई बैंकों की कतारों में धक्के खाता नहीं दिख रहा है। उल्टे वे सरकार के इस फ़ैसले का स्वागत कर रहे हैं। आख़िर माजरा क्या है?

आने वाले दिनों में ये परेशानियाँ कम नहीं बल्कि बढ़ने ही वाली हैं। बैंक, एटीएम और नोटों की कमी की मुश्किलें तो अगले कई दिनों तक बनी ही रहेंगी, अर्थशास्त्रियों का कहना है कि पहले से संकटग्रस्त चल रही अर्थव्यवस्था को इस झटके से उबरने में कुछ महीने लग सकते हैं। महँगाई, बेरोजगारी से तबाह जनता के जख्मों पर अभी कुछ और नमक रगड़ा जायेगा।

अगर वाकई सरकार के इस क़दम से काला धन ख़त्म हो जाता और जनता के जीवन में ख़ुशहाली आ जाती, 15 लाख न सही, दस-बीस हज़ार भी हरेक के बैंक खाते में आ जाने की गारंटी होती, तो भी लोग इस “क़ुर्बानी” का बोझ सह लेते। आख़िर आज़ादी के बाद से सरकार के हर “कड़े फ़ैसले” का बोझ तो आम मेहनतकश जनता ही उठाती रही है। मगर जनता की पीठ पर मुसीबतों का पहाड़ लादने के बाद काले धन की चुहिया निकालने की इस क़वायद का मक़सद क्या है? मोदी सरकार के इस नये फ़रमान के पीछे के घपले-घोटालों की बात करने से पहले आइये ज़रा यह जान लें कि इस फैसले से काले धन और भ्रष्टाचार मिटाने की बातें बस एक छलावा क्यों हैं।

काला धन असल में होता क्या है, क्यों और कैसे पैदा होता है और इसका क्या किया जाता है? काले धन का अर्थ है गैरक़ानूनी कामों जैसे तस्करी, ड्रग्स और अवैध हथियारों का कारोबार आदि, और टैक्स चोरी से कमाया धन। अक्सर जनता का सामना निचले स्तर पर फैले भ्रष्टाचार और घूसख़ोरी से होता है या चुनावी नेताओं की अँधेरगर्दी उन्हें दिखायी देती है। लेकिन सबसे बड़े पैमाने का भ्रष्टाचार और काले धन की समानान्तर अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा स्रोत उन्हें दिखायी नहीं देता। इसीलिए वे इस भ्रम का शिकार हो जाते हैं कि बड़े नोट बन्द होने से काला धन बिलबिलाकर बाहर निकल आयेगा। सच्चाई यह है कि देश में काले धन का सिर्फ़ 6 प्रतिशत नकदी के रूप में है (हिन्दुस्तान टाइम्स, 12 नवम्बर ’16)। विदेशों में जमा लाखों करोड़ के काले धन की बात ही अलग है। इस नकदी का भी बहुत ही छोटा-सा हिस्सा बाहर निकल सकेगा क्योंकि काले धन के असली खिलाड़ियों को उसे सफेद करने की तमाम तिकड़में आती हैं और वे शुरू भी हो गयी हैं। कुछ लोगों को कुछ दिनों की परेशानी होगी, मगर सरकार ने 2000 का नोट निकालकर और 1000 के नोट की वापसी का वादा करके आगे का इन्तज़ाम भी कर दिया है। समझने की बात यह भी है कि अगर बड़े नोट बन्‍द कर सकने से काले धन पर चोट हो सकती तो पहले की ऐसी कार्रवाइयों का कुछ नतीजा निकला होता। 1978 में तो एक साथ 1000, 5000 और 10000 के नोट बन्‍द कर दिये गये थे। मगर काले धन की समानान्‍तर अर्थव्‍यवस्‍था लगातार फलती-फूलती रही है। उदारीकरण-निजीकरण की नीतियाँ आने के बाद से तो इसमें ज़बर्दस्‍त बढ़ोत्‍तरी हुई है।

बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ आयात और निर्यात में ओवर इन्वॉयसिंग और अंडर इन्वॉयसिंग के ज़रिये अरबों रुपये का काला धन कमाती हैं। रिज़र्व बैंक के मुताबिक 40 साल में इस तरीके से 170 खराब रुपये का काला धन विदेश भेजा गया है। जैसे, पिछले दिनों जिंदल, अनिल अम्बानी और अडानी की कम्पनियों सहित कई बिजली कम्पनियों द्वारा कोयले के आयात में 60 हज़ार करोड़ के घोटाले का मामला सामने आया। इन कम्पनियों ने दुबई या सिंगापुर में बनायी अपनी कम्पनियों के ज़रिए ऑस्ट्रेलिया से कोयला खरीदा कम दाम पर और फिर अपनी ही कम्पनी से यही कोयला बढ़े दाम पर खरीद लिया। इस तरह भारत से जितनी रकम बाहर गयी उसका आधा ही आस्ट्रेलिया पहुँचा। बीच की रकम दुबई/सिंगापुर में इनकी अपनी कम्पनी के पास ही रह गयी – यह असली काले धन का एक रूप है! विदेश में रखा यह काला धन ही स्विस बैंकों या पनामा जैसे टैक्स चोरी की पनाहगाहों में जमा होता है और बाद में घूमफिर कर मॉरीशस आदि जगहों में स्थापित फ़र्जी कम्पनियों के पी-नोट्स में लग जाता है और विदेशी निवेश के तौर पर बिना कोई टैक्स चुकाये भारत पहुँच जाता है। विदेशी निवेश को बढ़ावा देने के नाम पर भारत सरकार इस पर फिर से होने वाली कमाई पर भी टैक्स छूट तो देती ही है, यह हज़ारों करोड़ रुपया किसका है यह सवाल भी नहीं पूछती! जबकि आज 4000 रुपये के नोट बदलने के लिए भी साधारण लोगों से पहचान के सबूत माँगे जा रहे हैं!

विदेशी बैंकों से बहुत ज़्यादा काला धन देश के भीतर है लेकिन कुछ कंजूस या कम समझदार व्यक्तियों को छोड़कर यह काला धन बैंक नोटों के रूप में नहीं रखा जाता बल्कि ज़मीन-मकान जैसी सम्पत्तियों, शेयर-बॉण्ड, बहुमूल्य धातुओं और किस्म-किस्म की कम्पनियाँ-ट्रस्ट-सोसायटी, आदि बनाकर निवेश किया जाता है जिससे और भी कमाई होती रहे। बड़े स्मगलर और अपराधी भी अब बक्सों में नोट भरकर नहीं रखते बल्कि फिल्म उद्योग, बिल्डिंग, होटल सहित तरह-तरह के व्यवसासों में निवेश करते हैं। टाटा-बिड़ला-अम्बानी जैसे तथाकथित “सम्मानित” घरानों से लेकर छोटे उद्योगपतियों-व्यापारियों तक सभी टैक्सचोरी करते हैं और चोरी की उस रकम को बार-बार निवेश करते रहते हैं। इन्हें टैक्स वकीलों, चार्टर्ड एकाउंटेंटों और खुद सरकारी अमले की मदद भी मिलती है। ऊपर से ये बैंकों के भी खरबों रुपये दबाकर बैठे हैं। हाल की सरकारी रिपोर्ट के अनुसार सिर्फ़ 57 लोगों के पास बैंकों के 85,000 करोड़ रुपये बाकी हैं। मोदी सरकार ने पिछले फरवरी में एक झटके में धन्नासेठों के 1 लाख 14 हजार करोड़ के कर्जे़ माफ़ कर दिये। यह सारा काला धन आज भी शान से बाजारों में  घूम रहा है और अपने मालिकों के लिए कमाई कर रहा है।

इसलिए नोटबंदी से असली काला धन वाले कारोबारियों को ना तो कुछ नुकसान होने वाला है ना ही इनका काले धन का चोरी का कारोबार रुकने वाला है। अगर इनके पास तात्कालिक ज़रूरत के लिए कुछ नोट इकठ्ठा हों भी तो भी राजनेताओं, अफ़सरों, पुलिस, वित्तीय व्यवस्था में इनका रुतबा और पहुँच इतनी गहरी है कि उन्हें खपाने में इन्हें कोई ख़ास दिक्कत नहीं आयेगी। भारत की 84 प्रतिशत सम्पत्ति के मालिक सिर्फ 20 प्रतिशत लोग हैं जबकि शेष 80 प्रतिशत के पास सिर्फ़ 16 प्रतिशत सम्पत्ति है। क्या 20 प्रतिशत अमीर लोगों के बजाय इन 80 प्रतिशत ग़रीबों के पास काला धन है? लेकिन इन 80 प्रतिशत लोगों की आमदनी नकदी में है, इनके पास 500 या 1000 के नोट भी हैं और अब इन्हें इनको बदलने में सिर्फ़ तकलीफ़ ही नहीं उठानी पड़ रही बल्कि इन्हें लूटा भी जा रहा है।

अब ज़रा इसके दूसरे पहलुओं को भी देख लें। नरेन्द्र मोदी ने 8 नवम्बर के अपने भाषण में कहा कि इस फ़ैसले की जानकारी सिर्फ़ 6 लोगों को थी। लेकिन अब ऐसे तथ्य सामने आ रहे हैं जिनसे साफ़ है कि भाजपा और संघ के लोगों को काफ़ी पहले से इसका पता चल गया था। पिछले कई साल से बैंकों में नकदी जमा करने की दर में बढ़ोत्तरी नहीं हुई थी। लेकिन पिछले तीन महीने में अचानक इसमें भारी बढ़ोत्तरी हो गयी। देशभर में हज़ारों करोड़ की नकदी जमा करायी गयी। मोदी की घोषणा से कुछ ही घण्टे पहले बंगाल में भाजपा के बैंक खाते में एक करोड़ की नकदी जमा करायी गयी। अब यह साफ़ होता जा रहा है कि लोगों को महँगाई, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार, असुरक्षा से मुक्ति दिलाने के लुभावने सपने दिखाकर सत्ता में आयी भाजपा सरकार ने अपने सभी दावों-जुमलों के फेल हो जाने के कारण लोगों को भरमाने के लिए यह नयी नौटंकी शुरू की है। मोदी सरकार के ढाई साल में जनता की मुसीबतें कम होने के बजाय और बढ़ी हैं। समाज में लगातार ज़हर घोला जा रहा है। आज़ादी की लड़ाई के ग़द्दार लगातार देश को बेचने का काम कर रहे हैं और उनकी लूट पर सवाल उठाने वालों को “देशभक्ति” के नाम पर लाठी और जेल दे रहे हैं। कभी “लव जिहाद”, कभी “गौरक्षा”, कभी “सर्जिकल स्ट्राइक” का शोर उठाकर अपना निकम्मापन छिपाने में असफल मोदी सरकार ने जनता पर यह नयी चोट की है। इसका जवाब जनता की एकजुटता से देना होगा!

नौजवान भारत सभा

स्‍त्री मुक्ति लीग

जागरूक नागरिक मंच

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3 thoughts on “नोटबन्दी, काला धन और परेशानहाल जनता – सोचने के लिए कुछ सवाल, जानने की कुछ बातें

  1. Very well written article….
    I’ve shared it… I hope the author keeps writing…

  2. Ruchit Karnawat

    It’s a step toward corruption. Well corruption is in the blood so it is not possible to totally eradicate it.. but still what else can we do.. no one will decorrupt overnight. .. neither in their 7 lives or so.. Is instinct.. we all see that happening … Will u or will u not bribe the policeman who caught u without helmet.. this society is noy ideal.. and there is no single step which can change everything.. but of course.. we are spoilt for over 70 years and to recover.. we will have to give time.. time…. and demobilisation has not only targeted the widespread corruption but also the fake money that pakistan has been circulating throughout the years.. I don’t get why the ones who are against demonetization include this point… pakistan can no longer circulate fake notes to buy weapons in india.. and also when the circulation of notes increases from a certain extent… the nation starts to lose the value of is currency.. so this will also stop.. and atleast the black money which was with singer of the ‘rich’ people.. iss useless now.. and they will reach to the poor to get it deposited through their jan dhan account.. and there are people who are keeping an eye on all of this…. so anyone trying to convert the black into white will be caught.. let’s hope.. and yeah… chetan bhagat is a phenomenal writer.. and is one of the most influential person in india.. according to Forbes too… and he writes adult novels.. and everyone has a different taste… I personally didn’t like his latest release “one indian girl” but every novel of his has a message for the youth.. for instance..”revolution 2020″ and yeah.. I hate honey singh. and I would like to appreciate this step of urs.. but I think u need to be more specific and unbiased.. and cover all the topics.. Best of luck

  3. Gautam

    To fir koi rasta batao jisse kale dhan par rok lag sake

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