शहीद रामप्रसाद बिस्मिल का अन्तिम सन्देश

शहीद रामप्रसाद बिस्मिल का अन्तिम सन्देश

दिसम्बर 1927 में काकोरी के चार क्रान्तिकारियों को फाँसी दे दी गयी। जनवरी, 1928 के ‘किरती’ में भगतसिंह ने ‘विद्रोही’ नाम से इन पर कुछ लेख छपवाये। यह उन्हीं में से एक है। इसमें भगतसिंह ने बिस्मिल के अन्तिम सन्देश को प्रस्तुत किया है। – स.

आपने एक लेख ‘निज-जीवन घटा’ लिखा था जो गोरखपुर के ‘स्वदेश’ अख़बार में छपा था। उसी को संक्षेप में हम पाठकों की सेवा में रख रहे हैं, ताकि वे जान सकें कि उन क्रान्तिकारी वीरों के शहादत के समय क्या विचार थे।

आप 16 तारीख़ को लिखते हैं –

19 तारीख़ सुबह साढ़े छह बजे फाँसी का समय निश्चित हो चुका है। कोई चिन्ता नहीं, ईश्वर की कृपा से मैं बार-बार जन्म लूँगा और मेरा उद्देश्य होगा कि संसार में पूर्ण स्वतन्त्रता हो, कि प्रकृति की देन पर सबका एक-सा अधिकार हो कि कोई किसी पर शासन न करे। सभी जगह लोगों के अपने पंचायती राज्य स्थापित हों। अब मैं उन बातों का उल्लेख कर देना ज़रूरी समझता हूँ जो सेशन जज के 6 अप्रैल, 1927 के फ़ैसले के बाद काकोरी के क़ैदियों के साथ हुईं। 18 जुलाई को अवध चीफ कोर्ट में अपील हुई। वह सिर्फ़ मौत की सज़ा पाये चार क़ैदियों की ओर से थी। लेकिन पुलिस की ओर से सज़ा बढ़ाने की अपील हुई। फिर बाक़ी क़ैदियों ने भी अपील कर दी, लेकिन श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल, श्री भूपेन्द्रनाथ सान्याल और इक़बालिया गवाह बनवारीलाल ने अपील नहीं की थी और फिर प्रणव चटर्जी ने इक़बाल कर लिया और अपील वापस ले ली। फाँसीवालों की सज़ा बहाल रही और श्री जोगेशचन्द्र चटर्जी, श्री गोविन्दचरण क्यू और श्री मुकन्दीलाल जी को दस साल की उम्रक़ैद हो गयी। श्री सुरेशचन्द भट्टाचार्य और श्री विष्णुशरण दुबलिस की सज़ा 7-7 साल से बढ़ाकर 10-10 साल कर दी गयी। रामनाथ पाण्डे की तीन साल और प्रणवेश की क़ैद चार साल रह गयी। प्रेमकिशन खन्ना पर से डकैती की सज़ा कम कर पाँच वर्ष क़ैद रह गयी। बाक़ी सबकी अपीलें ख़ारिज कर दी गयीं। अशफ़ाक़ की मौत की सज़ा बनी रही, शचीन्द्रनाथ बख्शी ने अपील ही नहीं की थी।

अपील से पहले मैंने गवर्नर के पास प्रार्थनापत्र लिख भेजा था जिसमें मैंने कहा था कि मैं गुप्त षड्यन्त्रों में हिस्सा न लिया करूँगा और कोई सम्बन्ध भी उनसे नहीं रखूँगा। रहम की अपील में भी इस प्रार्थनापत्र का ज़िक्र कर दिया था। लेकिन जजों ने कोई ध्यान देना ज़रूरी न समझा। जेल से अपना बचाव मैंने ख़ुद लिखकर चीफ कोर्ट में भेजा, लेकिन जजों ने कहा कि यह बचाव रामप्रसाद का लिखा हुआ नहीं, ज़रूर किसी बड़े सयाने आदमी की मदद से लिखा गया है। उल्टे उन्होंने यह कहा दिया कि रामप्रसाद बड़ा भयानक क्रान्तिकारी है और यदि रिहा हुआ तो फिर वही काम करेगा।

उन्होंने (मेरी) बुद्धिमत्ता-समझदारी आदि की प्रशंसा करने के बाद कहा कि यह एक ऐसा निर्दयी क़ातिल है, जो उन पर भी गोली चला सकता है जिसके साथ उसकी कोई दुश्मनी नहीं है। ख़ैर! क़लम उनके हाथ थी, जो चाहते वह लिखते। लेकिन चीफ कोर्ट के फ़ैसले से स्पष्ट पता चलता है कि बदला लेने के विचार से ही हमें फाँसी की सज़ा दी गयी है।

अपील ख़ारिज हो गयी; फिर लाट साहिब और वायसराय के पास रहम का प्रार्थनापत्र दिया गया। श्री राजिन्द्रनाथ लाहिड़ी, श्री अशफ़ाक़उल्ला खान, श्री रोशन सिंह और रामप्रसाद की मौत की सज़ा बदलने के लिए यू.पी. कौंसिल के लगभग सभी चुने हुए सदस्यों के हस्ताक्षर से एक प्रार्थनापत्र दिया गया। मेरे पिता के प्रयत्नों से 250 आनरेरी मजिस्ट्रेटों और बड़े-बड़े ज़मींदारों के हस्ताक्षरों सहित एक अलग प्रार्थनापत्र दिया गया। असेम्बली और कौंसिल ऑफ़ स्टेट के 108 सदस्यों ने भी हमारी मौत की सज़ा बदलने के लिए वायसराय के पास प्रार्थनापत्र दिया। उन्होंने यह भी कहा कि जज ने कहा था कि यदि ये लोग पश्चाताप करें तो सज़ाएँ बहुत कम कर दी जायेंगी। चारों ओर से इतनी घोषणाएँ हो चुकी थीं, लेकिन एक सिरे से दूसरे सिरे तक सभी हमारे रक्त के प्यासे थे और वायसराय ने भी हमारी एक न सुनी।

पण्डित मदनमोहन मालवीय जी कई और सज्जनों को लेकर वायसराय से मिले। सबको उम्मीद थी कि अब ज़रूर मौत की सज़ा हटा ली जायेगी। लेकिन क्या होना था। चुपचाप दशहरे से दो दिन पहले सभी जेलों में तार दे दी गयी कि फाँसी की तारीख़ निश्चित हो गयी है। जब जेल के सुपरिण्टेण्डेण्ट ने यह तार मुझे सुनायी तो मैंने कहा, अच्छा! आप अपना काम करो। लेकिन उनके ज़ोर देकर कहने से एक रहम की तार बादशाह को भेज दी। उस समय प्रिवी कौंसिल में अपील करने का विचार भी मन में आया। श्री मोहनलाल सक्सेना वकील को तार दी गयी। जब उन्हें बताया गया कि वायसराय ने सभी की दरख़्वास्तें नामंज़ूर कर दी हैं तो किसी को यक़ीन ही नहीं हो रहा था। उनसे कह-सुनकर प्रिवी कौंसिल में अपील करवायी गयी। परिणाम पहले ही पता था, अपील ख़ारिज हो गयी।

अब सवाल उठेगा कि सबकुछ पहले से ही जानते हुए मैंने माफ़ीनामा, रहम की दरख़्वास्त, अपीलों पर अपीलें क्यों लिख-लिख भेजीं? मुझे तो इसका एक ही कारण समझ में आता है कि राजनीति एक शतरंज का खेल है। सरकार ने बंगाल आर्डिनेंस के क़ैदियों सम्बन्धी असेम्बली में ज़ोर देकर कहा था कि उनके ख़िलाफ़ बड़े सबूत हैं, जो गवाहों की सुरक्षा के लिए हम खुली अदालत में पेश नहीं करते। हालाँकि दक्षिणेश्वर बमकाण्ड और शोभा बाज़ार षड्यन्त्र के मुक़दमे खुली अदालत में चले। ख़ुफ़िया पुलिस के सुपरिण्टेण्डेण्ट को मारने का मुक़दमा भी खुली अदालत में चला। काकोरी केस भी डेढ़ साल चला सरकार की ओर से 300 गवाह पेश हुए। कभी किसी गवाह पर मुसीबत न आयी, हालाँकि यह भी कहा गया था कि काकोरी षड्यन्त्र की शुरुआत बंगाल में हुई। सरकारी घोषणाओं की पोल खोलने की इच्छा से ही मैंने यह सब किया। माफ़ीनामे भी लिखे, अपीलें भी कीं, लेकिन क्या होना था। असलियत तो यह है कि जोरावर मारे भी और रोने भी न दे।

हमारे ज़िन्दा रहने से कहीं विद्रोह नहीं हो चला था। अब तक क्रान्तिकारियों के लिए किसी ने इतनी भारी सिफ़ारिश नहीं की थी, लेकिन सरकार को इससे क्या? उसे अपनी ताक़त पर नाज़ है, अपने बल पर अहंकार है। सर विलियम मौरिस ने स्वयं शाहजहाँपुर और इलाहाबाद के दंगों में मौत की सज़ा पाने वालों की मौत की सज़ाएँ माफ़ की थीं, जबकि वहाँ रोज़ दंगे होते थे। यदि हमारी सज़ा कम करने से औरों की हिम्मत बढ़ती है तो यही बात साम्प्रदायिक दंगों सम्बन्धी भी कही जा सकती है। लेकिन यहाँ मामला ही कुछ और था।

आज प्राण उत्सर्ग करते हुए मुझे कोई निराशा नहीं हो रही कि यह व्यर्थ गये। बलिदान कभी व्यर्थ नहीं जाते। क्या पता हमारे जैसे लोगों की ठण्डी आहों से ही यह परिणाम हुआ कि लॉर्ड बर्कन हैड के दिमाग़ में हिन्दुस्तान की ज़ंजीरें जकड़ने के विचार आया और उसने रॉयल कमीशन भेजा, जिसके बायकाट के लिए हिन्दू-मुसलमानों में फिर कुछ एकता हो रही है। ईश्वर करे कि इनको शीघ्र ही सद्बुद्धि आये और यह फिर एक हो जायें। हमारी अपील नामंज़ूर होते ही मैंने श्री मोहनलाल सक्सेना से कहा था कि इस बार हमारी यादगार मनाने के लिए हिन्दू-मुसलमान नेताओं को इकट्ठा बुलाया जाये।

अशफ़ाक़उल्ला को सरकार ने रामप्रसाद का दायाँ हाथ बताया है। अशफ़ाक़ कट्टर मुसलमान होते हुए भी रामप्रसाद जैसे कट्टर आर्यसमाजी का क्रान्ति में दाहिना हाथ हो सकता है तो क्या भारत के अन्य हिन्दू-मुसलमान आज़ादी के लिए अपने छोटे-मोटे लाभ भुला एक नहीं हो सकते? अशफ़ाक़ तो पहले ऐसे मुसलमान हैं जिन्हें कि बंगाली क्रान्तिकारी पार्टी के सम्बन्ध में फाँसी दी जा रही है। ईश्वर ने मेरी पुकार सुन ली। मेरा काम ख़त्म हो गया। मैंने मुसलमानों में से एक नौजवान निकालकर हिन्दुस्तान को यह दिखा दिया है कि मुस्लिम नौजवान भी हिन्दू नौजवानों से बढ़-चढ़कर देश के लिए बलिदान दे सकता है और वह सभी परीक्षाओं में सफल हुआ। अब यह कहने की हिम्मत किसी में नहीं होनी चाहिए कि मुसलमानों पर विश्वास नहीं करना चाहिए। यह पहला तज़ुर्बा था जो पूरा हुआ।

अशफ़ाक़! ईश्वर तुम्हारी आत्मा को शान्ति दे। तुमने मेरी और देश के सभी मुसलमानों की लाज बचा ली है यह दिखा दिया है कि भारत में भी तुर्की और मिस्र जैसे मुसलमान युवक मिल सकते हैं।

अब देशवासियों के सामने यही प्रार्थना है कि यदि उन्हें हमारे मरने का ज़रा भी अफ़सोस है तो वे जैसे भी हो, हिन्दू-मुस्लिम एकता स्थापित करें – यही हमारी आख़िरी इच्छा थी, यही हमारी यादगार हो सकती है। सभी धर्मों और सभी पार्टियों को कांग्रेस को ही प्रतिनिधि मानना चाहिए। फिर वह दिन दूर नहीं, जब अंग्रेज़ों को भारतीयों के आगे शीश झुकाना होगा।

जो कुछ मैं कह रहा हूँ, ठीक वही श्री अशफ़ाक़उल्ला ख़ान वारसी का विचार है। अपील लिखते समय लखनऊ जेल में मैंने उनसे बातचीत की थी। श्री अशफ़ाक़ तो रहम की दरख़्वास्त देने के लिए राजी नहीं थे। उन्होंने तो सिर्फ़ मेरी ज़िद पर, मेरे कहने पर ही ऐसा किया था।

सरकार से मैंने यहाँ तक कहा था कि जब तक उसे विश्वास न हो, तब तक मुझे जेल में क़ैद रखे या किसी दूसरे देश में निर्वासित कर दे, और हिन्दुस्तान न लौटने दे। लेकिन सरकार को क्या करना था। सरकार को यही मंज़ूर था कि हमें फाँसी ज़रूर दी जाये, हिन्दुस्तानियों के जले दिल पर नमक छिड़का जाये और वे तड़प उठें; कुछ सँभल जायें और हमारे पुनर्जन्म लेकर काम के लिए तैयार होने तक देश की हालत सुधर गयी हो।

अब तो मेरी यही राय है कि अंग्रेज़ी अदालत के आगे न तो कोई बयान दे और न ही कोई सफ़ाई पेश करे। अपील करने के पीछे एक कारण यह भी था कि फाँसी की तारीख़ बदलवाकर मैं एक बार देशवासियों की सहायता और नवयुवकों का दम देखूँ। इसमें मुझे बहुत निराशा हुई। मैंने निश्चय किया था कि सम्भव हो तो जेल से भाग जाऊँ। यदि ऐसा हो सकता तो बाक़ी तीनों की मौत की सज़ा भी माफ़ हो जाती। यदि सरकार न करती तो मैं करवा लेता। इसका तरीक़ा मुझे ख़ूब आता था। मैंने बाहर निकलने के लिए बड़े यत्न किये, लेकिन बाहर से कोई सहायता नहीं मिली। अफ़सोस तो इसी बात का है कि जिस देश में मैंने इतना बड़ा क्रान्तिकारी दल खड़ा कर दिया था, वहीं अपनी रक्षा के लिए मुझे एक पिस्तौल तक न मिला। कोई नौजवान मेरी सहायता के लिए आगे नहीं आया। मेरी नौजवानों से प्रार्थना है कि जब तक सभी लोग पढ़-लिख न जायें, तब तक कोई भी गुप्त पार्टियों की ओर ध्यान नहीं दे। यदि देश-सेवा की इच्छा है तो खुला काम करें। व्यर्थ बातें सुन-सुनकर ख़याली पुलाव पकाते हुए अपने जीवन को मुसीबतों में न डालें। अभी गुप्त काम का समय नहीं आया। हमें इस मुक़दमे के दौरान बड़े अनुभव हुए, लेकिन उनका लाभ उठाने का अवसर सरकार ने हमें नहीं दिया। लेकिन इस बात के लिए हिन्दुस्तान और ब्रिटिश सरकार बहुत पछतायेगी।

मुलाक़ात के समय आपने यह भी कहा था कि, “क्रान्तिकारी लोगों में भी हिम्मत की बहुत कमी है और जनता की हमदर्दी अभी उनके साथ नहीं है। साथ ही इनमें भी प्रान्तीयता की भावना बहुत है। परस्पर पूरा विश्वास भी नहीं है।” इन बातों के कारण हमारी हसरतें दिल में ही रह गयीं। मौखिक रूप से इन्कार करने से ही मुझे 5000 रुपये नक़द और विलायत भेज बैरिस्टर बनने का वायदा मिल रहा था। लेकिन इस बात को घोर पाप समझकर मैंने इसकी ओर ध्यान भी नहीं दिया। लेकिन अफ़सोस इस बात का है कि बड़े-बड़े विश्वसनीय कहे जाने वाले साथियों ने अपने सुख के लिए छिप-छिपकर पार्टी को धोखा दिया और हमारे साथ दग़ा किया।


शहीद भगतसिंह व उनके साथियों के बाकी दस्तावेजों को यूनिकोड फॉर्मेट में आप इस लिंक से पढ़ सकते हैं। 


Bhagat-Singh-sampoorna-uplabhdha-dastavejये लेख राहुल फाउण्डेशन द्वारा प्रकाशित ‘भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़’ से लिया गया है। पुस्तक का परिचय वहीं से साभार – अपने देश और पूरी दुनिया के क्रान्तिकारी साहित्य की ऐतिहासिक विरासत को प्रस्तुत करने के क्रम में राहुल फाउण्डेशन ने भगतसिंह और उनके साथियों के महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ों को बड़े पैमाने पर जागरूक नागरिकों और प्रगतिकामी युवाओं तक पहुँचाया है और इसी सोच के तहत, अब भगतसिंह और उनके साथियों के अब तक उपलब्ध सभी दस्तावेज़ों को पहली बार एक साथ प्रकाशित किया गया है।
इक्कीसवीं शताब्दी में भगतसिंह को याद करना और उनके विचारों को जन-जन तक पहुँचाने का उपक्रम एक विस्मृत क्रान्तिकारी परम्परा का पुन:स्मरण मात्र ही नहीं है। भगतसिंह का चिन्तन परम्परा और परिवर्तन के द्वन्द्व का जीवन्त रूप है और आज, जब नयी क्रान्तिकारी शक्तियों को एक बार फिर नयी समाजवादी क्रान्ति की रणनीति और आम रणकौशल विकसित करना है तो भगतसिंह की विचार-प्रक्रिया और उसके निष्कर्षों से कुछ बहुमूल्य चीज़ें सीखने को मिलेंगी।
इन विचारों से देश की व्यापक जनता को, विशेषकर उन करोड़ों जागरूक, विद्रोही, सम्भावनासम्पन्न युवाओं को परिचित कराना आवश्यक है जिनके कन्धे पर भविष्य-निर्माण का कठिन ऐतिहासिक दायित्व है। इसी उदेश्य से भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़ों का यह संकलन प्रस्तुत है।
आयरिश क्रान्तिकारी डान ब्रीन की पुस्तक के भगतसिंह द्वारा किये गये अनुवाद और उनकी जेल नोटबुक के साथ ही, भगतसिंह और उनके साथियों और सभी 108 उपलब्ध दस्तावेज़ों को पहली बार एक साथ प्रकाशित किया गया है। इसके बावजूद ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ?’ जैसे कर्इ महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ों और जेल नोटबुक का जिस तरह आठवें-नवें दशक में पता चला, उसे देखते हुए, अभी भी कुछ सामग्री यहाँ-वहाँ पड़ी होगी, यह मानने के पर्याप्त कारण मौजूद हैं। इसीलिए इस संकलन को ‘सम्पूर्ण दस्तावेज़’ के बजाय ‘सम्पूर्ण उपलब्ध’ दस्तावेज़ नाम दिया गया है।

व्यापक जनता तक पहूँचाने के लिए राहुल फाउण्डेशन ने इस पुस्तक का मुल्य बेहद कम रखा है (250 रू.)। अगर आप ये पुस्तक खरीदना चाहते हैं तो इस लिंक पर जायें या फिर नीचे दिये गये फोन/ईमेल पर सम्‍पर्क करें।

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