हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का संविधान

हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का संविधान

1925 की फ़ाइल न. 375, गृह विभाग (राजनीतिक), भारत सरकार (एनएआई)।

1924 के आख़िर में शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा तैयार किया गया। इसे पीले काग़ज़ पर मुद्रित किया गया था और यही कारण है कि इसका उल्लेख आमतौर पर ‘येलो पेपर’ के नाम से किया जाता है। – स.

नाम : एसोसिएशन का नाम हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन होगा।

उद्देश्य : एसोसिएशन का उद्देश्य संगठित एवं सशस्त्र क्रान्ति के द्वारा भारत के संयुक्त प्रान्तों का संघबद्ध गणतन्त्र स्थापित करना होगा।

गणतन्त्र के संविधान का अन्तिम स्वरूप का निर्धारण और घोषणा जन प्रतिनिधियों के द्वारा उस समय की जायेगी जबकि वे अपने फ़ैसलों को क्रियान्वित करने की स्थिति में होंगे। गणतन्त्र का मूलभूत सिद्धान्त सार्विक मताधिकार और ऐसी समस्त व्यवस्थाओं का उन्मूलन होगा जोकि किसी भी प्रकार के मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को सम्भव बनाती हैं।

संविधान : संचालन समिति/एसोसिएशन की संचालन समिति भारत के प्रत्येक प्रान्त के प्रतिनिधियों से मिलकर बनी केन्द्रीय परिषद होगी। केन्द्रीय परिषद के फ़ैसलों को पूरा अधिकार प्राप्त होगा।

केन्द्रीय परिषद का प्रमुख कार्य विभिन्न प्रान्तों की गतिविधियों पर निगरानी रखना, उनके बीच तालमेल और समन्वय क़ायम करना होगा, जिसके बारे में उसे पूरी जानकारी होगी। भारत के बाहर दूसरे देशों में किये जाने वाले कामों को सीधे केन्द्रीय परिषद की देखरेख में किया जायेगा।

प्रान्तीय संगठन : एक समिति होगी जोकि प्रत्येक प्रान्त में एसोसिएशन के पाँच भिन्न-भिन्न विभागों का प्रतिनिधित्व करने वाले पाँच लोगों से मिलकर बनी होगी, जोकि प्रान्त में एसोसिएशन की समस्त गतिविधियों का नियमन करेगी।

समिति के समस्त फ़ैसले सर्वानुमति से लिये जायेंगे।

विभाग – प्रत्येक प्रान्तीय संगठन में निम्नलिखित विभाग होंगे:

  1. प्रचार
  2. लोगों को जुटाना
  3. निधियों की व्यवस्था करना और आतंकवाद
  4. अस्त्र-शस्त्र एवं गोला-बारूद का संग्रह एवं भण्डारण
  5. 5. विदेशी सम्बन्ध
  6. प्रचार का काम इस प्रकार से किया जायेगा:

(ए) खुले एवं गुप्त प्रेस के द्वारा (बी) व्यक्तिगत वार्तालाप के जरिये (सी) सार्वजनिक मंचों के जरिये (डी) संगठित कथाओं की व्यवस्था के जरिये और (ई) मैजिक लैण्टर्न स्लाइड्स के जरिये।

  1. लोगों को जुटाने का काम विभिन्न ज़िलों के प्रभारी संगठनकर्ताओं द्वारा किया जायेगा।
  2. निधियों की व्यवस्था करने का काम आमतौर पर स्वैच्छिक चन्दे के उपाय को काम में लाकर किया जायेगा और यदा-कदा ज़बरन उगाही के उपाय को काम में लाया जायेगा। विदेशी सरकार के एजेण्ट या एजेण्टों द्वारा दमन के अतीव मामलों में एसोसिएशन का यह कर्त्तव्य होगा कि वह जिस भी रूप में ठीक समझे उसका प्रतिकार करे।
  3. एसोसिएशन के हर सदस्य को शस्त्र सज्जित करने के लिए समस्त प्रयास किये जायेंगे; लेकिन इस तरह के सभी हथियारों को विभिन्न केन्द्रों पर रखा जायेगा और उनका उपयोग केवल प्रान्तीय समिति के दिशा-निर्देशों के अनुसार ही किया जायेगा।

ज़िला संगठनकर्ता या विभाग के प्रभारी अधिकारी की जानकारी और अनुमति के बग़ैर एक भी हथियार ज़िले के किसी भी स्थान से हटाया या उपयोग में नहीं लाया जायेगा।

  1. 5. विदेशी सम्बन्ध। विभाग केन्द्रीय समिति से मिलने वाले सीधे आदेशों के तहत अपने काम को पूरा करेगा।

ज़िला संगठनकर्ता उसके कर्त्तव्य

ज़िला संगठनकर्ता अपने ज़िले के सदस्यों का अकेला प्रभारी होगा। वह अपने ज़िले के प्रत्येक हिस्से में अपने एसोसिएशन की शाखाएँ खोलने की कोशिश करेगा। भरती का काम प्रभावी तरीक़े से चलाने के लिए उसे अपने ज़िले के विभिन्न सार्वजनिक निकायों और संस्थाओं के साथ सम्पर्क बनाये रखना होगा। ज़िला संगठनकर्ताओं को हर प्रकार से प्रान्तीय समिति के अधीन रखा जायेगा जोकि समस्त गतिविधियों की निगरानी और निर्देशन करेगी।

ज़िला संगठनकर्ता यह सुनिश्चित करेगा कि सदस्यगण अलग-अलग समूहों में विभाजित हों और विभिन्न समूहों को एक-दूसरे के बारे में जानकारी न हो। जहाँ तक सम्भव है कि किसी भी प्रान्त के ज़िला संगठनकर्ता एक-दूसरे की गतिविधियों से अवगत न हों, उन्हें एक-दूसरे को व्यक्तिगत रूप से या नाम से भी नहीं जानना चाहिए। कोई भी ज़िला संगठनकर्ता अपने से बड़े अधिकारी को सूचना दिये बग़ैर अपनी जगह को नहीं छोड़ेगा।

ज़िला संगठनकर्ता की योग्यताएँ

  1. उसके पास अलग-अलग मिजाज के लोगों को दिशा-निर्देश देने और उनसे काम लेने की कुशलता और योग्यता होनी चाहिए।
  2. उसके पास अपनी मातृभूमि के विशेष सन्दर्भ में सम-सामयिक राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक समस्याओं को समझने की क्षमता होनी चाहिए।
  3. उसे भारत द्वारा विकसित की गयी सभ्यता-विशेष के विशिष्ट सन्दर्भ में भारत के इतिहास की मूल भावना को आत्मसात करने में सक्षम होना चाहिए।
  4. स्वतन्त्र भारत के जीवन लक्ष्य और मंज़िल को लेकर उसे अवश्य ही आस्थावान होना चाहिए, जोकि मनुष्य की आत्मिक एवं भौतिक दोनों प्रकार की गतिविधियों के विभिन्न क्षेत्रों में सामंजस्य क़ायम करती है। उसे अवश्य ही साहसी और आत्मबलिदान के जज़्बे से परिपूर्ण होना चाहिए जिसके बिना उसके समस्त देदीप्यमान गुणों का कोई मोल नहीं होगा।

प्रान्तीय परिषद और केन्द्रीय परिषद

प्रान्तीय समिति और केन्द्रीय समिति के सदस्यों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसके एसोसिएशन के प्रत्येक सदस्य को अपनी व्यक्तिगत योग्यताओं को विकसित करने और उसे काम में लाने की पूरी स्वतन्त्रता और विपुल अवसर मिले, इसके बग़ैर एसोसिएशन विघटित होने की ओर प्रवृत्त होगा।

कार्यक्रम

एसोसिएशन की समस्त गतिविधियों को दो हिस्सों – सार्वजनिक एवं निजी – में बाँटा जायेगा।

सार्वजनिक:

  1. क्लबों, पुस्तकालयों, सेवा समितियों आदि की शक्ल में एसोसिएशनों की स्थापना करना।
  2. मज़दूरों और किसानों का संगठन बनाना। विभिन्न फ़ैक्टरियों, रेलवे और कोयला क्षेत्रों में मज़दूरों को संगठित और नियन्त्रित करने के लिए एसोसिएशन की तरफ़ से उपयुक्त व्यक्तियों को लगाया जाना चाहिए और उनके दिलो-दिमाग़ में इस बात को बैठा देना होगा कि वे क्रान्ति के लिए नहीं हैं वरन यह कि क्रान्ति उनके लिए है। इसी प्रकार से किसानों को भी संगठित करना होगा।
  3. स्वतन्त्र भारतीय गणतन्त्र के विचार को प्रचारित करने के लिए प्रत्येक प्रान्त में साप्ताहिक अख़बार शुरू करने होंगे।
  4. समसामयिक घटनाक्रम और विदेशों में प्रचलित विचारों के प्रवाह से जनसाधारण को अवगत कराने के लिए पुस्तिकाओं और परचों का प्रकाशन।
  5. 5. कांग्रेस और दूसरी सार्वजनिक गतिविधियों को जहाँ तक हो सके प्रभावित करना और उसे अपने उपयोग में लाना।

निजी:

(ए) गुप्त प्रेस की स्थापना करना और उसके जरिये ऐसे साहित्य को प्रकाशित करना जिसे कि आसानी से खुले में न प्रकाशित किया जा सकता हो।

(बी) इस प्रकार के साहित्य को प्रसारित करना।

(सी) देश के प्रत्येक भाग में ज़िलेवार ढंग से इस एसोसिएशन की शाखाएँ स्थापित करना।

(डी) जिस भी तरीक़े से सम्भव हो पैसों की व्यवस्था करना।

(ई) उपयुक्त लोगों को दूसरे देशों में भेजना जहाँ पर वे सैनिक या वैज्ञानिक प्रशिक्षण प्राप्त कर सकते हों ताकि वे खुले विद्रोह के समय पर सेनाओं एवं आयुध फ़ैक्टरियों की कमान सँभालने के लिए सैन्य या वैज्ञानिक विशेषज्ञ हासिल कर सकें।

(एफ़) हथियारों एवं गोला-बारूद का आयात करना और इसके अलावा जहाँ तक सम्भव हो उनका देश के भीतर ही निर्माण करना।

(जी) भारत के बाहर के भारतीय क्रान्तिकारियों के साथ निकट सम्पर्क बनाये रखना और उनके साथ सहयोग करना।

(एच) एसोसिएशन के सदस्यों को मौजूदा सेना में सूचीबद्ध करना।

(आई) कभी-कभार के प्रतिकारी उपायों और प्रचार के द्वारा अपने ध्येय के प्रति जनता की हमदर्दी हासिल करना और इस प्रकार हमदर्दों के दल का निर्माण करना।

सभी सदस्यों को प्रत्येक प्रान्त के विभिन्न ज़िलों के प्रभारी संगठनकर्ताओं द्वारा भरती किया जायेगा। प्रत्येक सदस्य को अपना पूरा समय एसोसिएशन के कामों को देने और ज़रूरत पड़ने पर अपनी जान को जोखिम में डालने के लिए तैयार रहना होगा।

उसे ज़िला संगठनकर्ता के आदेशों का अक्षरशः पालन करना होगा।

उसे अपनी स्वयं की पहलक़दमी का विकास करना चाहिए और यह याद रखना चाहिए कि एसोसिएशन की सफलता उसके एक-एक सदस्यों की सूझबूझ, पहलक़दमी और दायित्वबोध पर काफ़ी कुछ निर्भर करती है।

उसका व्यवहार इस प्रकार का होना चाहिए कि जोकि उसे ध्येय के बारे में पूर्वाग्रह न क़ायम करे जिसके लिए उसका एसोसिएशन लगा हुआ है और इस संगठन को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से नुक़सान पहुँचाने वाले व्यवहार से दूर रहना चाहिए।

ज़िला संगठनकर्ता की सहमति के बग़ैर इस एसोसिएशन का कोई भी सदस्य किसी भी दूसरे संगठन से सम्बन्ध नहीं रख सकेगा।

कोई भी सदस्य ज़िला संगठनकर्ता को बताये बग़ैर अपनी जगह को नहीं छोड़ेगा।

प्रत्येक सदस्य को इस बात की भरसक कोशिश करनी होगी कि वह पुलिस या जनता की निगाह में क्रान्तिकारी जमात से सम्बन्ध रखने के लिए सन्देह के घेरे में न आ जाये।

प्रत्येक सदस्य को यह याद रखना होगा कि उसका अपना व्यवहार और ग़लतियाँ समूचे संगठन को विनष्ट करने की ओर ले जा सकती हैं।

कोई भी सदस्य जहाँ तक उसके सार्वजनिक जीवन का सम्बन्ध है, ज़िला संगठनकर्ता से कुछ भी नहीं छिपायेगा।

ग़द्दारी करने वाले सदस्यों को निष्कासन या मौत के द्वारा दण्डित किया जायेगा।

दण्ड देने का अधिकार पूरी तरह से “प्रा. स.” के पास होगा।


शहीद भगतसिंह व उनके साथियों के बाकी दस्तावेजों को यूनिकोड फॉर्मेट में आप इस लिंक से पढ़ सकते हैं। 


Bhagat-Singh-sampoorna-uplabhdha-dastavejये लेख राहुल फाउण्डेशन द्वारा प्रकाशित ‘भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़’ से लिया गया है। पुस्तक का परिचय वहीं से साभार – अपने देश और पूरी दुनिया के क्रान्तिकारी साहित्य की ऐतिहासिक विरासत को प्रस्तुत करने के क्रम में राहुल फाउण्डेशन ने भगतसिंह और उनके साथियों के महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ों को बड़े पैमाने पर जागरूक नागरिकों और प्रगतिकामी युवाओं तक पहुँचाया है और इसी सोच के तहत, अब भगतसिंह और उनके साथियों के अब तक उपलब्ध सभी दस्तावेज़ों को पहली बार एक साथ प्रकाशित किया गया है।
इक्कीसवीं शताब्दी में भगतसिंह को याद करना और उनके विचारों को जन-जन तक पहुँचाने का उपक्रम एक विस्मृत क्रान्तिकारी परम्परा का पुन:स्मरण मात्र ही नहीं है। भगतसिंह का चिन्तन परम्परा और परिवर्तन के द्वन्द्व का जीवन्त रूप है और आज, जब नयी क्रान्तिकारी शक्तियों को एक बार फिर नयी समाजवादी क्रान्ति की रणनीति और आम रणकौशल विकसित करना है तो भगतसिंह की विचार-प्रक्रिया और उसके निष्कर्षों से कुछ बहुमूल्य चीज़ें सीखने को मिलेंगी।
इन विचारों से देश की व्यापक जनता को, विशेषकर उन करोड़ों जागरूक, विद्रोही, सम्भावनासम्पन्न युवाओं को परिचित कराना आवश्यक है जिनके कन्धे पर भविष्य-निर्माण का कठिन ऐतिहासिक दायित्व है। इसी उदेश्य से भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़ों का यह संकलन प्रस्तुत है।
आयरिश क्रान्तिकारी डान ब्रीन की पुस्तक के भगतसिंह द्वारा किये गये अनुवाद और उनकी जेल नोटबुक के साथ ही, भगतसिंह और उनके साथियों और सभी 108 उपलब्ध दस्तावेज़ों को पहली बार एक साथ प्रकाशित किया गया है। इसके बावजूद ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ?’ जैसे कर्इ महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ों और जेल नोटबुक का जिस तरह आठवें-नवें दशक में पता चला, उसे देखते हुए, अभी भी कुछ सामग्री यहाँ-वहाँ पड़ी होगी, यह मानने के पर्याप्त कारण मौजूद हैं। इसीलिए इस संकलन को ‘सम्पूर्ण दस्तावेज़’ के बजाय ‘सम्पूर्ण उपलब्ध’ दस्तावेज़ नाम दिया गया है।

व्यापक जनता तक पहूँचाने के लिए राहुल फाउण्डेशन ने इस पुस्तक का मुल्य बेहद कम रखा है (250 रू.)। अगर आप ये पुस्तक खरीदना चाहते हैं तो इस लिंक पर जायें या फिर नीचे दिये गये फोन/ईमेल पर सम्‍पर्क करें।

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