गाँधीजी के नाम शचीन्द्रनाथ सान्याल का खुला पत्र

गाँधीजी के नाम शचीन्द्रनाथ सान्याल का खुला पत्र

मैं समझता हूँ कि यह मेरा दायित्व है कि मैं आपको उस वादे की याद दिलाऊँ जिसे कि आपने कुछ समय पहले किया था कि जब क्रान्तिकारी एक बार फिर अपनी चुप्पी तोड़कर भारतीय राजनीति के क्षेत्र में दाख़िल होंगे तो आप राजनीति के क्षेत्र से संन्यास ले लेंगे।। अहिंसावादी असहयोग आन्दोलन का प्रयोग अब ख़त्म हो चुका है। आप अपने प्रयोग के लिए पूरा एक साल चाहते थे, लेकिन प्रयोग अगर पाँच नहीं तो कम से कम पूरे चार सालों तक चला, और क्या अभी भी आप यह कहना चाहते हैं कि यह काफ़ी लम्बे समय तक नहीं चला है?

आप वर्तमान युग के महानतम व्यक्तित्वों में से एक हैं और आपके प्रत्यक्ष मार्गदर्शन एवं प्रेरणा के तहत आपके कार्यक्रम को वास्तव में एक या दूसरे कारण से देश के सर्वश्रेष्ठ लोगों द्वारा आगे बढ़ाया गया। हज़ारों नौजवानों, हमारे देश के युवाओं ने आपके कल्ट (व्यक्ति-पूजा) को अपने समूचे उत्साह से गले लगाया। व्यवहार में समूचे राष्ट्र ने आपके आह्वान का उत्तर दिया। यह कहना ग़लत नहीं होगा कि जनता की यह प्रतिक्रिया चमत्कारिक नहीं तो असाधारण अवश्य थी। इससे अधिक आप क्या चाहते? आपके अनुयायियों में बलिदान और ईमानदारी की कमी न थी, सर्वाधिक स्वार्थी पेशेवर लोगों ने अपने पेशों का त्याग कर दिया, देश के युवाओं ने अपनी समस्त सांसारिक सम्भावनाओं का त्याग करके आपके झण्डे तले एकत्रित शक्तियों में शामिल हो गये, रुपये-पैसे की आमद नहीं होने से हज़ारों परिवार कंगाल हो गये। पैसे की कमी न थी। आप एक करोड़ रुपया चाहते थे और आपको उससे अधिक मिला जितना कि आप चाहते थे। वस्तुतः अगर मैं कहूँ कि आपके आह्वान का प्रत्युत्तर स्वयं आपकी उम्मीद से भी अधिक था तो सम्भवतः मैं बहुत ग़लत नहीं होऊँगा। मैं यह कहना चाहूँगा कि भारत ने अपनी योग्यता के अनुसार भरसक आपका अनुसरण किया और मैं समझता हूँ कि इस बात से शायद ही इन्कार किया जा सके और अभी भी आप यह कहना चाहते हैं कि प्रयोग पर्याप्त समय तक नहीं चला?

दरअसल, आपका कार्यक्रम विफल रहा है जिसमें भारतीयों की कोई ग़लती नहीं है। आपके पास देश के लिए केवल एक कार्यक्रम है लेकिन आप विजयी लक्ष्य तक राष्ट्र को नहीं ले जा सकते। यह कहना कि अहिंसक असहयोग इसलिए विफल रहा कि लोग पर्याप्त मात्रा में अहिंसक नहीं थे, वकील की भाँति तर्क करना है न कि पैग़म्बर की भाँति। लोग उससे अधिक अहिंसक नहीं हो सकते जितना कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान रहे हैं। मैं यह कहना चाहूँगा कि वे उस हद तक अहिंसक थे, जहाँ से कायरता की बू आती है। आप सम्भवतः यह कहेंगे कि यह वह अहिंसा, कायरों की अहिंसा नहीं थी जोकि आपका अभीष्ट थी। बल्कि आपके कार्यक्रम में वह बात ही नहीं थी जोकि कायरों को नायकों में रूपान्तरित कर पाती या जो नायकों के समूहों के बीच से कायरों का पता लगाकर अन्ततोगत्वा उन्हें ख़ारिज कर देती। इसमें जनता की कोई ग़लती नहीं थी। और यह कहना कि असहयोग आन्दोलन में शामिल लोगों की बहुसंख्या नायकों की नहीं वरन कायरों की थी, ज़िम्मेदारियों से पल्ला झाड़ना है। यह कहना राष्ट्र के पौरुष के साथ खिलवाड़ करने जैसा कहीं अधिक है। भारतीय कायर नहीं हैं। उनकी बहादुरी की तुलना हमेशा ही विश्व के सर्वश्रेष्ठ नायकों की बहादुरी के साथ की जा सकेगी। इस बात से इन्कार करना इतिहास से इन्कार करना है। जब मैं भारतीयों की वीरता की बात करता हूँ तो मेरा मतलब गौरवशाली अतीत की जाज्वल्यमान वीरता से ही नहीं होता वरन मैं उस वीरता को भी शामिल करता हूँ जोकि स्वयं को वर्तमान में प्रकट कर रही है क्योंकि भारत में अभी भी मुरदे नहीं बसते।

भारत को गुरु गोबिन्द सिंह या गुरु रामदास और शिवाजी जैसे नेता की तरह असली नेता की आवश्यकता है। भारत को एक कृष्ण की आवश्यकता है जोकि उचित आदर्श प्रदान कर सके; जिसका अनुसरण अकेले भारत ही नहीं वरन सारी मानवता द्वारा इस मानवता के विविध मिज़ाजों एवं क्षमताओं वाले सभी सदस्यों द्वारा किया जाना वाला हो।

अहिंसक असहयोग आन्दोलन इसलिए नहीं विफल हुआ कि यत्र-तत्र दबी हुई भावनाएँ फूट पड़ीं वरन इसलिए विफल हुआ कि आन्दोलन के पास उचित आदर्श का अभाव था। आपके द्वारा बताया जाने वाला आदर्श भारतीय संस्कृति एवं परम्पराओं के अनुरूप नहीं है। उसमें नक़ल की बू आती है। अहिंसा का आपका दर्शन, कम से कम वह दर्शन जिसे आप लोगों को स्वीकार करने के लिए कहते हैं, हताशा से उपजा हुआ दर्शन है। यह भारतीय ऋषियों की अहिंसा की भावना नहीं है। यह टॉलस्टायवाद और बौद्ध-धर्म का अपूर्ण भौतिक मिश्रण है न कि पूरब और पश्चिम का रासायनिक मिश्रण। आपने कांग्रेसों एवं सम्मेलनों की पश्चिमी पद्धति को अपनाया और देश-काल से निरपेक्ष रहकर अहिंसा की भावना को स्वीकार करने के लिए समूचे राष्ट्र को तैयार करने की कोशिश की। लेकिन यह भावना भारतीयों के लिए में व्यक्तिगत साधना का मामला था। और सर्वोपरि तौर पर भारत के अन्तिम राजनीतिक लक्ष्य की बाबत आपकी समझ साफ़ नहीं थी और भी अस्पष्ट बनी हुई है। यह दुखद स्थिति है। स्वतन्त्रता का आपका विचार भारतीय आदर्शों से मेल नहीं खाता है। भारत सर्वम परवश्म दुखम् सर्वमत्वमसम सुखम और इस आदेश की हिमायत करता है कि व्यक्ति का अस्तित्व पूर्णतया मानवता के उद्देश्य के लिए होता है और मानवता के जरिये ईश्वर की सेवा होती है, जगताथित्मच, कृष्णमा च। वह अहिंसा जिसका भारत उपदेश देता है अहिंसा के लिए अहिंसा नहीं है, वरन मानवता की भलाई के लिए अहिंसा है और जब मानवता की भलाई हिंसा और रक्त-पात की माँग करेगी तो भारत ख़ून बहाने से उसी प्रकार नहीं हिचकिचायेगा जिस प्रकार से शल्यक्रिया से ख़ून बहाने की आवश्यकता उत्पन्न कर देती है। आदर्श भारतीय के लिए हिंसा या अहिंसा का एक जैसा महत्त्व होता है, बशर्ते कि उनसे अन्ततोगत्वा मानवता की भलाई होती हो। विनाशाय च दुष्कृताम् व्यर्थ में ही नहीं कहा गया है।

अतएव मेरे विचार में आपके द्वारा राष्ट्र के सम्मुख रखा गया आदर्श या आपके द्वारा उसके सामने प्रस्तुत किया गया कार्रवाई का कार्यक्रम न तो भारतीय संस्कृति के अनुरूप है और न ही राजनीतिक कार्यक्रम के तौर पर अमल में लाने योग्य।

यह सोचना बस अकल्पनीय और अबोधगम्य है कि आप अभी भी थोड़ी-बहुत यह आशा पाले हुए हैं कि इंग्लैण्ड अपनी स्वयं की इच्छा से न्यायपूर्ण और उदार हो सकता है – यह इंग्लैण्ड ‘जोकि आत्मरक्षा के वैध उपाय के तौर पर जलियाँवाला बाग़ नरसंहार’ में यक़ीन करता है,’ यह जिसने इंग्लैण्ड ओडायर – नायर मामले की सुनवाई की और बर्बरता के पक्ष में फ़ैसला सुनाया। अगर आप के मन में ब्रिटिश सरकार की सद्बुद्धि में लेशमात्र भी आस्था बची हुई है तो आपके अनुसार किसी कार्यक्रम की आवश्यकता ही आख़िर क्या है? अगर ब्रिटिश सरकार को होश में लाने के लिए किसी आन्दोलन की आवश्यकता है, तो फिर ब्रिटिश सरकार की ईमानदारी और नेक इरादों की बात क्यों की जाये? मुझे लगता है कि आपके भीतर का पैग़म्बर मर चुका है और आप एक बार फिर कमज़ोर मामले की पैरवी करने वाले वकील हैं; या सम्भवतः आप हमेशा से भाष्यकार रहे हैं – केवल अर्द्ध-सत्यों के – ज़ोरदार व्याख्याकार। दुनिया के दूसरे स्वतन्त्र राष्ट्रों के साथ गँठजोड़ या महासंघ में समप्रभु स्वतन्त्र भारतीय गणतन्त्र एक बात है और इस साम्राज्यवादी ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर स्वशासित भारत पूर्णतया दूसरी बात है। ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर बने रहने की आपकी भावना बहुतेरी भयंकर भूलों में से एक की याद दिलाती है, कि आपने मिथ्या औचित्य की वर्तमान ज़रूरतों के साथ बेशक़ीमती आदर्श का समझौता किया है, और यही वह कारण है कि आप देश के युवाओं की कल्पनाशीलता आकृष्ट करने में विफल रहे हैं – ये वे युवा हैं जो दिलेरी दिखा सकते थे और जो अभी भी आपकी इच्छाओं के ख़िलाफ़ जाने की दिलेरी दिखा रहे हैं। हालाँकि वे बेहिचक इस बात को स्वीकार करते हैं कि आप आधुनिक युग की महानतम शख़्सियतों में से एक हैं। ये भारतीय क्रान्तिकारी हैं। उन्होंने अब और अधिक ख़ामोश नहीं रहने का फ़ैसला किया है, अतएव वे आपसे राजनीति के क्षेत्र से अवकाश लेने का अनुरोध करते हैं, अथवा राजनीतिक आन्दोलन को इस प्रकार से निर्देशित करें जिससे कि क्रान्तिकारी आन्दोलन को उससे मदद हासिल हो न कि उसके मार्ग में रुकावट पैदा हो। अभी तक उन लोगों ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आपके अनुरोध को स्वीकार करते हुए अपनी गतिविधियों को स्थगित रखा है पर अब वे आगे बढ़ चुके हैं। वास्तव में उन लोगों ने अपनी ओर से आपको अपने कार्यक्रम को अमल में लाने में भरसक सहायता प्रदान की है। लेकिन अब प्रयोग ख़त्म हो चुका है, लिहाज़ा क्रान्तिकारी लोग अपने वादे से आज़ाद हैं। वस्तुतः उन्होंने केवल सालभर के लिए चुप रहने का वादा किया था, इससे अधिक समय के लिए नहीं।

आगे, मैं इस बात का उल्लेख करना चाहूँगा कि जब आपने 39वीं कांग्रेस में अपने हालिया अध्यक्षीय सम्बोधन में क्रान्तिकारियों पर दोषारोपण किया था तो आपने कई पहलुओं से उनका ग़लत मूल्यांकन किया था। आपने कहा कि क्रान्तिकारी भारत की प्रगति में बाधा डाल रहे हैं। मुझे नहीं पता कि ‘प्रगति’ शब्द से आपका मतलब क्या है। अगर आपका मतलब राजनीतिक प्रगति से है तो क्या आप इससे इन्कार कर सकते हैं कि भारत द्वारा पहले ही हासिल की जा चुकी प्रत्येक राजनीतिक प्रगति, फिर वह चाहे मामूली ही क्यों न हो, मुख्यतया क्रान्तिकारी पार्टी की क़ुर्बानियों एवं प्रयत्नों के द्वारा हासिल हुई है? क्या आपको इससे इन्कार है कि बंगाल का विभाजन बंगाल के क्रान्तिकारियों के प्रयासों से रद्द हुआ? क्या आपको इस बात में सन्देह है कि मोर्ले-मिण्टो सुधार भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का फल है, जैसाकि मोण्टफ़ोर्ड सुधार को अमल में लाने में अगर पूरी तरह नहीं तो मुख्य भूमिका अवश्य थी? अगर आप इन प्रश्नों का सकारात्मक उत्तर देते हैं तो मुझे बहुत अधिक हैरानी नहीं होगी लेकिन मैं आपको यक़ीन दिला सकता हूँ कि ब्रिटिश सरकार को इस आन्दोलन के सम्भावनासम्पन्न होने का अहसास है। यहाँ तक कि स्वर्गीय मोंशेग्यू ने एक जाने-माने भारतीय से यह बात कही थी कि महज युवा भारतीय क्रान्तिकारियों की गतिविधियों के चलते ही उन्होंने भारत आने की जहमत उठाई और अपने प्राणों को जोखिम में डाला।

अगर आप यह कहते हैं कि ये सुधार सच्ची प्रगति के सूचक नहीं हैं तो मैं यह कहना चाहूँगा कि इस क्रान्तिकारी आन्दोलन ने भारत की नैतिक उन्नति में कोई कम प्रगति नहीं हासिल की है। भारतीय मौत को लेकर दयनीय रूप से भयभीत रहते हैं और इस क्रान्तिकारी पार्टी ने एक बार फिर भारतीयों को उदात्त ध्येय के लिए मरने में निहित भव्यता और सौन्दर्य का अहसास कराया। क्रान्तिकारियों ने एक बार फिर यह प्रदर्शित किया कि मृत्यु का भी कुछ आकर्षण होता है और वह हमेशा भयावह चीज़ नहीं होती। अपने स्वयं के विश्वासों और आस्था के लिए मरना, इस चेतना के साथ मौत को गले लगाना कि इस तरह से मरकर वह ईश्वर और राष्ट्र की सेवा कर रहा है, ऐसे ध्येय के लिए जिस के न्यायोचित और वैध होने का हमें ईमानदारी के साथ विश्वास होता है, मौत को स्वीकार करना या जान को उस समय जोखिम में डालना जबकि मौत की पूरी सम्भावना हो क्या यह कोई नैतिक प्रगति नहीं है?

यहाँ तक कि विपरीत परिस्थितियों और क्षणिक विफलताओं में भी अपने प्यारे आदर्श को नहीं छोड़ना – क्षणिक उत्तेजनाओं और किसी आकर्षक व्यक्तित्व के प्रकरतः उदात्त सिद्धान्तों के बहकावे में नहीं लम्बी क़ैद बा-मशक्क़त से विचलित नहीं होना, सालों-साल अपनी अन्तरात्मा के प्रति सच्चे बने रहना – यह उद्देश्य की दृढ़ता, चरित्र की यह मज़बूती उस सच्ची नैतिक प्रगति का सूचक नहीं है, जिसे भारत ने हासिल किया है? और क्या यह क्रान्तिकारी आदर्शों का स्पष्ट परिणाम नहीं है?

आपने क्रान्तिकारियों से कहा है, “हो सकता है कि आपको अपने जीवन की परवाह न हो लेकिन आप अपने उन देशवासियों की अनदेखी नहीं कर सकते जिनकी शहीद की मौत मरने की कोई इच्छा नहीं है।” अलबत्ता, क्रान्तिकारी इस वाक्य के अर्थ को समझने में दुखद रूप से विफल रहे हैं। क्या आपके कहने का मतलब यह है कि क्या क्रान्तिकारी उन 70 लोगों की मौत के लिए ज़िम्मेदार हैं जिन्हें कि चौरी-चौरा मुक़दमे में फाँसी की सज़ा सुनायी गयी? क्या आपके कहने का मतलब यह है कि जलियाँवाला बाग और गुजराँवाला में बमबारी और मासूमों की हत्या के लिए क्रान्तिकारी ज़िम्मेदार हैं? क्या क्रान्तिकारियों ने पिछले बीस वर्षों में अपने संघर्ष के दौरान या मौजूदा समय में भूखे-नंगे लोगों से कभी क्रान्तिकारी संघर्ष में भाग लेने के लिए कहा है? सम्भवतः अधिकतर वर्तमान नेताओं के मुक़ाबले क्रान्तिकारियों को जन-मनोविज्ञान का अधिक ज्ञान है। और यही वजह थी कि उन्होंने तब तक अवाम को अपने साथ कभी नहीं लेना चाहा जब तक वे अपनी स्वयं की शक्ति को लेकर आश्वस्त नहीं हो गये। उनका हमेशा से विश्वास रहा है कि उत्तर भारत की जनता किसी भी आपात स्थिति के लिए तैयार है और उनका यह सोचना भी सही है कि उत्तर भारत की जनता अत्यन्त घनीभूत विस्फोटक पदार्थ है जिसके साथ सँभालकर पेश आना चाहिए। जनता की भावनाओं का ग़लत आकलन तो आप और आपके सहयोगियों ने किया था जो उन्हें सत्याग्रह आन्दोलन में घसीट ले गये। भीतर और बाहर से हज़ारों उत्पीड़न झेल रहे लोगों का ग़ुस्सा भड़क उठना स्वाभाविक ही था, और आपको इसकी क़ीमत चुकानी ही थी। लेकिन क्या आप ऐसा कोई उदाहरण दे सकते हैं जहाँ क्रान्तिकारियों ने अनिच्छुक लोगों को मौत की घाटी में धकेला हो?

लेकिन अगर इस वाक्य से आपका यह मतलब है कि क्रान्तिकारियों की गतिविधियों के कारण निर्दोष लोगों को सताया, क़ैद किया और मारा जा रहा है, तो मैं बेहिचक और ईमानदारी से स्वीकार करूँगा कि जहाँ तक मेरी जानकारी है, ऐसे एक भी व्यक्ति को फाँसी नहीं दी गयी जो किसी क्रान्तिकारी कार्रवाई से निर्दोष था; और गिरफ्तारियों तथा यातनाओं के बारे में मैं कह सकता हूँ कि निर्दोष स्त्री-पुरुषों को वास्तव में क़ैद किया गया और यातनाएँ दी गयीं। लेकिन क्या विदेशी सरकार द्वारा किये गये अत्याचार के लिए क्रान्तिकारी पार्टी को दोषी ठहराया जा सकता है? विदेशी सरकार राष्ट्र में पौरुष की हर अभिव्यक्ति को कुचल देने पर आमादा है। लेकिन इस तरह कुचलने के दौरान सरकार भयंकर भूलें करेगी और वीरों के साथ ही कायरों को भी क़ैद में डालेगी और यातनाएँ देगी। लेकिन क्या कायरों के दुखों के लिए देश के वीर जन ज़िम्मेदार हैं? इतना ही नहीं, इन दुखों को शहीद की मौत नहीं कहा जा सकता।

अन्त में, मैं ब्रिटिश सरकार की शक्ति के बारे में आपकी टिप्पणियों के बारे कुछ कहना चाहूँगा। आपने क्रान्तिकारियों से कहा है, “आप जिन्हें गद्दी से हटाना चाहते हैं वे आपसे बेहतर ढंग से हथियारबन्द हैं और आपसे बहुत अधिक अच्छी तरह संगठित हैं।” लेकिन क्या यह शर्मनाक नहीं है कि मुट्ठीभर अंग्रेज़ हिन्दुस्तान पर राज कर रहे हैं, हिन्दुस्तानी जनता की स्वतन्त्र इच्छा से नहीं बल्कि तलवार के बल पर?और अगर अंग्रेज़ बेहतर ढंग से हथियारबन्द और संगठित हो सकते हैं तो हिन्दुस्तानी और भी बेहतर ढंग से हथियारबन्द और संगठित क्यों नहीं हो सकते – वे हिन्दुस्तानी जो उच्च आत्मिक भावना से ओत-प्रोत हैं? हिन्दुस्तानी भी उसी तरह मनुष्य हैं जिस तरह अंग्रेज़ हैं। फिर भला कौन-सा कारण हिन्दुस्तानियों को इतना लाचार बना देता है कि वे अपने अंग्रेज़ स्वामियों से बेहतर हथियारबन्द और संगठित नहीं हो सकते? किस तर्क से आप उन क्षमताओं की अनदेखी कर सकते हैं जिनमें क्रान्तिकारियों को पूरा भरोसा है? और इस लाचारगी तथा हताशा से जन्मी अहिंसा की भावना शक्तिशाली की अहिंसा, भारतीय ऋषियों की अहिंसा कभी नहीं हो सकती। यह सीधे-सीधे तमस है, और कुछ नहीं।

मुझे क्षमा करें महात्माजी, यदि मैंने आपके दर्शन और सिद्धान्तों की आलोचना करने में कुछ कड़े शब्दों का प्रयोग किया हो। आपने क्रान्तिकारियों की बहुत असहानुभूतिपूर्वक आलोचना की है और आप यहाँ तक चले गये कि उन्हें देश का शत्रु तक बता डाला। केवल इसलिए कि वे आपके विचारों और तरीक़ों से मतभेद रखते हैं। आप उन्हें सहिष्णुता की सीख देते हैं लेकिन क्रान्तिकारियों की आलोचना करने में आप स्वयं अत्यन्त असहिष्णु रहे हैं। क्रान्तिकारियों ने मातृभूमि की सेवा के लिए अपना सबकुछ दाँव पर लगा दिया है, और यदि आप उनकी सहायता नहीं कर सकते, तो कम से उनके प्रति असहिष्णु तो न बनें।


शहीद भगतसिंह व उनके साथियों के बाकी दस्तावेजों को यूनिकोड फॉर्मेट में आप इस लिंक से पढ़ सकते हैं। 


Bhagat-Singh-sampoorna-uplabhdha-dastavejये लेख राहुल फाउण्डेशन द्वारा प्रकाशित ‘भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़’ से लिया गया है। पुस्तक का परिचय वहीं से साभार – अपने देश और पूरी दुनिया के क्रान्तिकारी साहित्य की ऐतिहासिक विरासत को प्रस्तुत करने के क्रम में राहुल फाउण्डेशन ने भगतसिंह और उनके साथियों के महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ों को बड़े पैमाने पर जागरूक नागरिकों और प्रगतिकामी युवाओं तक पहुँचाया है और इसी सोच के तहत, अब भगतसिंह और उनके साथियों के अब तक उपलब्ध सभी दस्तावेज़ों को पहली बार एक साथ प्रकाशित किया गया है।
इक्कीसवीं शताब्दी में भगतसिंह को याद करना और उनके विचारों को जन-जन तक पहुँचाने का उपक्रम एक विस्मृत क्रान्तिकारी परम्परा का पुन:स्मरण मात्र ही नहीं है। भगतसिंह का चिन्तन परम्परा और परिवर्तन के द्वन्द्व का जीवन्त रूप है और आज, जब नयी क्रान्तिकारी शक्तियों को एक बार फिर नयी समाजवादी क्रान्ति की रणनीति और आम रणकौशल विकसित करना है तो भगतसिंह की विचार-प्रक्रिया और उसके निष्कर्षों से कुछ बहुमूल्य चीज़ें सीखने को मिलेंगी।
इन विचारों से देश की व्यापक जनता को, विशेषकर उन करोड़ों जागरूक, विद्रोही, सम्भावनासम्पन्न युवाओं को परिचित कराना आवश्यक है जिनके कन्धे पर भविष्य-निर्माण का कठिन ऐतिहासिक दायित्व है। इसी उदेश्य से भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़ों का यह संकलन प्रस्तुत है।
आयरिश क्रान्तिकारी डान ब्रीन की पुस्तक के भगतसिंह द्वारा किये गये अनुवाद और उनकी जेल नोटबुक के साथ ही, भगतसिंह और उनके साथियों और सभी 108 उपलब्ध दस्तावेज़ों को पहली बार एक साथ प्रकाशित किया गया है। इसके बावजूद ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ?’ जैसे कर्इ महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ों और जेल नोटबुक का जिस तरह आठवें-नवें दशक में पता चला, उसे देखते हुए, अभी भी कुछ सामग्री यहाँ-वहाँ पड़ी होगी, यह मानने के पर्याप्त कारण मौजूद हैं। इसीलिए इस संकलन को ‘सम्पूर्ण दस्तावेज़’ के बजाय ‘सम्पूर्ण उपलब्ध’ दस्तावेज़ नाम दिया गया है।

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