भगतसिंह – विशेष ट्रिब्यूनल की स्थापना पर

विशेष ट्रिब्यूनल की स्थापना पर

भगतसिंह और उनके साथी मुक़दमे के परिणाम से पूरी तरह परिचित थे और मिलने वाली सज़ाओं की ओर से बिल्कुल बेपरवाह। वे अपने विचार जनता तक ले जाने और लोगों को ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी के लिए तैयार करना चाहते थे, इसलिए यह भी इच्छा रखते थे कि मुक़दमे की कार्रवाई धीमी गति से आगे बढ़े, ताकि जनता तक उनके विचार पहुँच सकें। लेकिन सरकार खीझ रही थी। आख़िर 1 मई, 1930 को एक विशेष अध्यादेश द्वारा एक विशेष ट्रिब्यूनल स्थापित किया गया। उस अध्यादेश के बारे में बताये गये सरकारी बहाने का उत्तर भगतसिंह ने 2 मई, 1930 को प्रस्तुत निम्नलिखित दस्तावेज़ में दिया। – स.

गवर्नर जनरल, भारत, शिमला (पंजाब)

श्रीमान,

हमारे मुक़दमे को जल्द निबटाने के लिए जारी किये आर्डिनेंस की पूरी कॉपी पढ़कर सुनायी जा चुकी है। इसके लिए पंजाब हाईकोर्ट के अधिकार-क्षेत्र में एक ट्रिब्यूनल की नियुक्ति की गयी है। अगर इस सम्बन्ध में अपनाये गये व्यवहार का उल्लेख न किया होता और इसकी सारी जवाबदेही हमारे सिर पर न मढ़ी होती तो हम शायद अपनी जुबान बन्द रखते, परन्तु वर्तमान स्थितियों में इसके सम्बन्ध में हम अपना बयान देना आवश्यक समझते हैं।

हम आरम्भ से ही जानते हैं कि सरकार जान-बूझकर हमारे बारे में ग़लतफ़हमी पैदा कर रही है। आख़िरकार यह एक लड़ाई है और हम भली प्रकार जानते हैं कि अपने दुश्मनों का मुक़ाबला करने के लिए ग़लतफ़हमियों का जाल बनाना सरकार का सबसे बड़ा हथकण्डा है। इस घृणित कार्य को रोकने का हमारे पास कोई साधन नहीं, लेकिन कुछ ऐसी बातें हैं जिन्हें ध्यान में रखते हुए हम कुछ कहने के लिए मजबूर हैं।

आपने लाहौर साज़िश केस के बारे में जारी अध्यादेश में हमारी भूख हड़ताल के बारे में अपना स्पष्टीकरण शामिल किया है। आपने स्वयं स्वीकारा है कि हममें से दो ने इस मुक़दमे के सम्बन्ध में स्पेशल मजिस्ट्रेट पण्डित श्रीकृष्ण की अदालत में होने वाली जाँच-पड़ताल होने से पहले भूख हड़ताल शुरू कर दी थी। सामान्य समझ वाले साधारण व्यक्ति की समझ में भी यह बात आ सकती है कि इस मुक़दमे का भूख हड़ताल से कोई सम्बन्ध नहीं है। भूख हड़ताल आरम्भ करने के कुछ विशेष कारण थे, इस स्थिति में सरकार को उन कारणों के बारे में स्पष्टीकरण देना था जिसके आधार पर भूख हड़ताल की गयी थी। जब सरकार ने इस समस्या को सुलझाने के लिए कुछ प्रबन्ध करने की स्वीकृति दी और जेल जाँच कमेटी स्थापित की तब हमने भूख हड़ताल समाप्त की थी। लेकिन सबसे पहले हमें यह बताया गया था कि यह समस्या नवम्बर तक सुलझा दी जायेगी लेकिन उसमें दिसम्बर तक विलम्ब किया गया। जनवरी भी बीत गयी लेकिन इस बात का कोई संकेत नहीं मिल रहा कि सरकार वास्तव में इस सम्बन्ध में कुछ करेगी भी या नहीं। हमें लगा कि मामला समाप्त कर दिया गया है। इन स्थितियों में हमने पूरे एक हफ्ते का नोटिस देकर 4 फ़रवरी, 1930 से पुनः भूख हडताल आरम्भ कर दी। इसके बाद ही सरकार ने इस समस्या को अन्तिम रूप से हल करने के लिए कुछ क़दम उठाये।

इस आशय का एक विज्ञापन फिर सरकार ने समाचारपत्रों में जारी किया। तब हमने भूख हड़ताल समाप्त कर दी। यहाँ तक कि हमने इस बात का इन्तज़ार भी नहीं किया कि सरकार अपने अन्तिम निर्णय लागू करती भी है या नहीं? लेकिन आज ही हमने यह महसूस किया है कि अंग्रेज़ सरकार ऐसे साधारण मामलों में भी झूठ और फ़रेब का सहारा लेने से बाज़ नहीं आयी। वह विज्ञापन ख़ास निश्चित और निर्णय निकालने वाले आधार पर निर्धारित थे, लेकिन हमने देखा कि उस पर भी विपरीत अमल किया गया। जो भी हो, इस विषय पर बहस करने का यह उचित अवसर नहीं। अगर यह मामला पुनः कभी उठा तो हम इसका अवश्य निर्णय करेंगे। लेकिन हम पुरज़ोर कहना चाहते हैं कि भूख हड़ताल का उद्देश्य इस्तगासा की कार्यवाही के विरुद्ध कोई क़दम नहीं था, ऐसे साधारण कारणों से हमने इतनी यातनाएँ नहीं सही थीं। यतीन्द्रनाथ दास ने इतने सामान्य कारण के लिए अपने जीवन का बलिदान नहीं दिया, राजगुरु और सुखदेव ने भी इस बचाव के लिए ही अपने जीवन संकट में नहीं डाले थे।

आप स्वयं हमारे मुक़दमे के सन्दर्भ में यह अच्छी तरह जानते थे कि अध्यादेश जारी करने की वजह भूख हड़ताल नहीं थी। लेकिन असल कारण तो कुछ और हैं जिनके बारे में सोचकर आपकी सरकार के होश-हवास गुम हो गये। न तो वे इस मुक़दमे में विलम्ब के कारण हुए और न ही कोई ऐसी संकटमय स्थिति पैदा हुई, जिसके कारण इस बेक़ानून के क़ानून के ऊपर हस्ताक्षर किये। ज़रूर ही इसके पीछे कुछ और है।

लेकिन हम यह बता देना चाहते हैं कि उन अध्यादेशों से हमारी भावनाओं को कुचला नहीं जा सकता। भले ही आप कुछ इन्सानों को कुचल देने में सफलता हासिल कर लें, लेकिन याद रहे, आप इस राष्ट्र को नहीं कुचल सकते। जहाँ तक इस अध्यादेश का सन्दर्भ है, हम इसे अपनी शानदार सफलता मानते हैं। हम आरम्भ से ही यह बताने का प्रयास करते रहे हैं कि आपका यह क़ानून एक ख़ूबसूरत फ़रेब है। यह न्याय नहीं दे सकता। लेकिन अफ़सोस है कि जेल में जो सुविधाएँ क़ानूनन और इंसाफ़ करके अपराधियों को मिलती हैं और साधारण बन्दियों को भी दी जाती हैं, वे सुविधाएँ भी हम राजनीतिक बन्दियों को नहीं दी जातीं। हम चाहते थे कि सरकार पर्दे से बाहर आये और स्पष्ट कहे कि राजनीतिक बन्दियों को बचाव का कोई अवसर नहीं दिया जा सकता।

हमें लगता है कि सरकार ने यही बात स्पष्ट रूप से स्वीकारी है। हम आपको और आपकी सरकार को इस साफ़गोई के लिए धन्यवाद देते हैं और अध्यादेश का स्वागत करते हैं।

आपके प्रतिनिधि स्पेशल मजिस्ट्रेट और इस्तगासा के सरकारी वकील द्वारा लगातार हमारे उचित व्यवहार को साफ़-साफ़ स्वीकारने के बावजूद सिर्फ़ हमारे मुक़दमे के वजूद के बारे में सोचते ही आपके मस्तिष्क में भयंकर खलबली मची हुई है। हमारे इस संघर्ष की शानदार सफलता का इससे बढ़कर भरोसा और क्या हो सकता है?

आपके आदि-आदि

भगतसिंह


शहीद भगतसिंह व उनके साथियों के बाकी दस्तावेजों को यूनिकोड फॉर्मेट में आप इस लिंक से पढ़ सकते हैं। 


Bhagat-Singh-sampoorna-uplabhdha-dastavejये लेख राहुल फाउण्डेशन द्वारा प्रकाशित ‘भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़’ से लिया गया है। पुस्तक का परिचय वहीं से साभार – अपने देश और पूरी दुनिया के क्रान्तिकारी साहित्य की ऐतिहासिक विरासत को प्रस्तुत करने के क्रम में राहुल फाउण्डेशन ने भगतसिंह और उनके साथियों के महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ों को बड़े पैमाने पर जागरूक नागरिकों और प्रगतिकामी युवाओं तक पहुँचाया है और इसी सोच के तहत, अब भगतसिंह और उनके साथियों के अब तक उपलब्ध सभी दस्तावेज़ों को पहली बार एक साथ प्रकाशित किया गया है।
इक्कीसवीं शताब्दी में भगतसिंह को याद करना और उनके विचारों को जन-जन तक पहुँचाने का उपक्रम एक विस्मृत क्रान्तिकारी परम्परा का पुन:स्मरण मात्र ही नहीं है। भगतसिंह का चिन्तन परम्परा और परिवर्तन के द्वन्द्व का जीवन्त रूप है और आज, जब नयी क्रान्तिकारी शक्तियों को एक बार फिर नयी समाजवादी क्रान्ति की रणनीति और आम रणकौशल विकसित करना है तो भगतसिंह की विचार-प्रक्रिया और उसके निष्कर्षों से कुछ बहुमूल्य चीज़ें सीखने को मिलेंगी।
इन विचारों से देश की व्यापक जनता को, विशेषकर उन करोड़ों जागरूक, विद्रोही, सम्भावनासम्पन्न युवाओं को परिचित कराना आवश्यक है जिनके कन्धे पर भविष्य-निर्माण का कठिन ऐतिहासिक दायित्व है। इसी उदेश्य से भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़ों का यह संकलन प्रस्तुत है।
आयरिश क्रान्तिकारी डान ब्रीन की पुस्तक के भगतसिंह द्वारा किये गये अनुवाद और उनकी जेल नोटबुक के साथ ही, भगतसिंह और उनके साथियों और सभी 108 उपलब्ध दस्तावेज़ों को पहली बार एक साथ प्रकाशित किया गया है। इसके बावजूद ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ?’ जैसे कर्इ महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ों और जेल नोटबुक का जिस तरह आठवें-नवें दशक में पता चला, उसे देखते हुए, अभी भी कुछ सामग्री यहाँ-वहाँ पड़ी होगी, यह मानने के पर्याप्त कारण मौजूद हैं। इसीलिए इस संकलन को ‘सम्पूर्ण दस्तावेज़’ के बजाय ‘सम्पूर्ण उपलब्ध’ दस्तावेज़ नाम दिया गया है।

व्यापक जनता तक पहूँचाने के लिए राहुल फाउण्डेशन ने इस पुस्तक का मुल्य बेहद कम रखा है (250 रू.)। अगर आप ये पुस्तक खरीदना चाहते हैं तो इस लिंक पर जायें या फिर नीचे दिये गये फोन/ईमेल पर सम्‍पर्क करें।

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